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Vijay Erry

Classics Fantasy Others

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Vijay Erry

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खामोश गली मुहल्ले

खामोश गली मुहल्ले

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खामोश गली मुहल्ले 

(एक हिंदी कहानी – लगभग 2000 शब्द)

लेखक: विजय शर्मा एरी

प्रस्तावना

कुछ गलियाँ सिर्फ ईंट-पत्थर और दीवारों का नाम नहीं होतीं। वे साँस लेती हैं, यादें समेटती हैं और जब सुनसान हो जाती हैं तो दिल के किसी कोने में गहरी चुभन छोड़ जाती हैं। यह कहानी उसी सुनसान गली की है—जहाँ कभी हल्ला-गुल्ला था, बच्चों की किलकारियाँ थीं, चाय की दुकान पर बहसें थीं और अब सन्नाटा छाया हुआ है। यह कहानी उस सन्नाटे के बीच छिपे इंसानियत के स्वर की भी है।

पहला अध्याय: पुरानी गली का जादू

अमृतसर के किनारे बसे छोटे से मुहल्ले “गणेश गली” में मेरा बचपन बीता। संकरी कच्ची सड़क, दोनों तरफ पुराने मकान, बीच में नीम का बड़ा पेड़ और उसके नीचे रमेश काई की छोटी सी चाय की दुकान—यही हमारी दुनिया थी।

सुबह होते ही फेरीवालों की आवाजें गूँज उठतीं—“सब्जी ले लो… ताज़ी सब्जी!” शाम को बच्चे गली में क्रिकेट खेलते, बुजुर्ग चारपाई पर बैठकर पुरानी बातें करते और औरतें आँगन में बैठकर सब्जी काटतीं। हर घर में अपनापन था। कोई बीमार पड़ता तो पूरा मुहल्ला साथ खड़ा हो जाता।

मैं—अरुण—उसी गली का लड़का था। पिता जी छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे। माँ घर संभालतीं। हम तीन भाई-बहन। गली हमारे लिए सिर्फ रास्ता नहीं थी, वह परिवार थी।

फिर समय बदला।

दूसरा अध्याय: शहर की चमक और गली का सन्नाटा

पढ़ाई पूरी करके मैं दिल्ली चला गया। नौकरी मिली, शादी हुई, बच्चे हुए। सालों बीत गए। कभी-कभी फोन पर माँ कहतीं, “बेटा, गली अब वैसी नहीं रही। लोग शहर चले गए। दुकानें बंद हो गईं। सन्नाटा छा गया है।”

मैं हँसकर टाल देता—“माँ, प्रगति तो होनी ही है।”

फिर एक दिन फोन आया। पिता जी का स्वास्थ्य खराब था। मैं छुट्टी लेकर घर पहुँचा।

स्टेशन से रिक्शा लेकर जब गली में घुसा तो दिल बैठ गया।

नीम का पेड़ अब सूखा पड़ गया था। रमेश काई की दुकान बंद पड़ी थी। दीवारों पर पोस्टर फटे पड़े थे। घरों के दरवाजे बंद, खिड़कियाँ अँधेरी। सड़क पर धूल उड़ रही थी। कोई बच्चा नहीं खेल रहा था। कोई आवाज़ नहीं। सिर्फ हवा का शोर और दूर कहीं कुत्ते का भौंकना।

माँ ने दरवाज़ा खोला। आँखों में आँसू थे। “बेटा, अब ये गली सुनसान हो गई है। जो लोग थे, वे शहर चले गए। जो रह गए, वे बुजुर्ग हैं या बीमार।”

पिता जी बिस्तर पर लेटे थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, “अरुण, गली मर रही है… लेकिन यादें अभी जिंदा हैं।”

तीसरा अध्याय: यादों का दरिया

उस रात मैं छत पर बैठा। नीचे गली अँधेरी पड़ी थी। मन में पुरानी तस्वीरें घूमने लगीं।

याद आया—जब दस साल का था तो रमेश काई रोज मुफ्त में चाय पिलाते थे और कहते, “पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना, लेकिन गली को मत भूलना।”

याद आया—जब पड़ोसी शर्मा जी की बेटी की शादी हुई तो पूरा मुहल्ला रात भर जागा। गाने, ढोल, मिठाई… सब कुछ साझा था।

याद आया—जब बाढ़ आई थी तो सबने मिलकर एक-दूसरे के घरों से सामान निकाला। कोई अकेला नहीं था।

अब सब बिखर चुके थे। कुछ विदेश, कुछ मेट्रो शहरों में। गली खाली पड़ गई थी।

सुबह मैं गली में घूमने निकला। एक बुजुर्ग महिला बैठी थीं—शांता चाची। उन्होंने मुझे पहचाना। “अरुण बेटा! कितने साल बाद आए हो। अब यहाँ कौन रहता है? सब चले गए। मैं अकेली रह गई हूँ। बेटा विदेश में है, बेटी शहर में। कभी-कभी फोन आ जाता है।”

उनकी आँखों में अकेलापन साफ दिख रहा था।

मैंने सोचा—क्या यही प्रगति है? शहर की ऊँची इमारतों में रहने वाले लोग गली के रिश्तों को भूल जाते हैं।

चौथा अध्याय: एक छोटी सी कोशिश

मैंने कुछ दिन और ठहरने का फैसला किया। पिता जी की देखभाल के साथ-साथ गली के बचे-खुचे लोगों से मिलने लगा।

एक दिन रमेश काई के बेटे से मुलाकात हुई। वह शहर से आया था। “अरुण भैया, दुकान बंद कर दी। यहाँ कोई नहीं आता। किराए का घर शहर में ले लिया।”

मैंने कहा, “क्यों न फिर से खोलो? थोड़ी मेहनत करो।”

वह हँसा, “कौन आएगा?”

मैंने सोचा। फिर एक योजना बनाई।

मैंने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली—“गणेश गली के पुराने वासी, आइए एक बार अपनी गली में। सुनसान गली को फिर से आबाद करें।”

कुछ लोगों ने लाइक किए, कुछ ने कमेंट किए। एक हफ्ते बाद कुछ पुराने दोस्त पहुँचे। फिर कुछ और।

हमने नीम के पेड़ के नीचे बैठक रखी। चाय पी, पुरानी बातें कीं। बच्चों को गली में खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। रमेश काई की दुकान दोबारा खोली गई—सिर्फ शनिवार-रविवार के लिए।

धीरे-धीरे गली में फिर हलचल शुरू हुई। बुजुर्ग चारपाई पर बैठने लगे। महिलाएँ आँगन में बैठकर बातें करने लगीं। बच्चे शाम को क्रिकेट खेलने लगे।

एक दिन शांता चाची ने कहा, “बेटा, तुमने गली को फिर से साँस दी है।”

पाँचवाँ अध्याय: सन्नाटे से सबक

पिता जी की तबीयत सुधरने लगी। एक शाम उन्होंने मुझे बुलाया।

“अरुण, तुमने जो किया वह बहुत बड़ा काम है। शहर की चमक अच्छी है, लेकिन जड़ें भी जरूरी हैं। गली सुनसान हो जाए तो इंसानियत भी सुनसान हो जाती है।”

मैंने सिर झुका लिया। सच में, हम सब इतने व्यस्त हो गए थे कि अपने मूल को भूल गए थे।

मैंने फैसला किया—हर तीन महीने में कम से कम एक हफ्ता गली में बिताऊँगा। बच्चों को भी लाऊँगा। उन्हें बताऊँगा कि रिश्ते सिर्फ व्हाट्सऐप पर नहीं होते, वे गली की धूल में, नीम की छाँव में और पड़ोसी की मुस्कान में बसते हैं।

अंतिम अध्याय: गली फिर जिंदा हुई

एक साल बाद जब मैं फिर आया तो गली बदल चुकी थी।

नीम के पेड़ पर नई पत्तियाँ आ गई थीं। रमेश काई की दुकान रोज खुलती थी। बच्चे खेलते थे। शाम को लोग इकट्ठा होते थे। कोई बीमार पड़ता तो सब मदद को दौड़ पड़ते थे।

एक छोटी सी शुरुआत ने पूरे मुहल्ले को फिर से जोड़ दिया था।

मैं छत पर खड़ा था। नीचे गली में हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं—हँसी, बातें, बच्चों का शोर। सन्नाटा टूट चुका था।

मन में एक बात गूँज रही थी—

“सुनसान गली सिर्फ जगह नहीं होती।

वह उन रिश्तों की याद होती है जिन्हें हम भूल जाते हैं।

अगर थोड़ी सी मेहनत करें, थोड़ा सा प्यार दें,

तो सुनसान गली भी फिर से मुस्कुरा सकती है।”

लेखक का संदेश

मेरे प्यारे पाठकों,

हम सब किसी न किसी गली, मुहल्ले या गाँव से जुड़े हैं। प्रगति आवश्यक है, शहर आवश्यक है, लेकिन जड़ों को मत काटो।

जब गली सुनसान हो जाती है तो सिर्फ दीवारें खाली नहीं होतीं—दिल भी खाली हो जाते हैं।

कभी-कभी लौटकर आओ। अपनी गली में बैठो। बुजुर्गों से बात करो। बच्चों के साथ खेलो। पड़ोसियों को याद करो।

क्योंकि असली खुशी ऊँची इमारतों में नहीं, उन संकरी गलियों में बसती है जहाँ इंसानियत अभी भी साँस लेती है।

सुनसान गली को फिर से आबाद करना—यही सबसे बड़ा पुण्य है।

✍️ विजय शर्मा एरी

(अजनाला, अमृतसर)



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