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Vijay Erry

Classics Fantasy Inspirational

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Vijay Erry

Classics Fantasy Inspirational

यह कैसा प्यार

यह कैसा प्यार

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यह  कैसा प्यार

लेखक: विजय शर्मा एर्री

गाँव के किनारे बहती नदी के पास एक पुराना मंदिर था। उस मंदिर के पास दो घर थे। एक घर में रामलाल ठाकुर रहते थे और दूसरे में श्यामसिंह यादव। दोनों परिवार पीढ़ियों से दुश्मन थे। ज़मीन, पानी और इज़्ज़त के झगड़े ने दोनों घरों में खून की नदियाँ बहा दी थीं। गाँव वाले कहते थे कि ठाकुर और यादव कभी एक साथ नहीं बैठ सकते।

रामलाल के बेटे का नाम था अर्जुन। बीस साल का जवान, सीधा-सादा, लेकिन गुस्से में आग। श्यामसिंह की बेटी थी कविता। उन्नीस साल की, पढ़ी-लिखी, आँखों में सपने और दिल में हिम्मत। दोनों स्कूल में एक साथ पढ़ते थे, लेकिन घर पर दुश्मनी की दीवार इतनी ऊँची थी कि वे एक-दूसरे से बात तक नहीं करते थे।

एक दिन स्कूल की वार्षिक प्रतियोगिता में अर्जुन और कविता दोनों को एक ही टीम में डाल दिया गया। निबंध प्रतियोगिता थी—“गाँव का भविष्य”। अध्यापक ने कहा, “तुम दोनों मिलकर लिखोगे।” अर्जुन ने चेहरा फेर लिया। कविता ने चुपचाप पेन उठाया।

शुरुआत में दोनों चुप रहे। फिर कविता ने धीरे से कहा, “अगर हम न लिखें तो स्कूल का नाम खराब होगा।” अर्जुन ने झुँझलाते हुए जवाब दिया, “तुम्हारे बाप ने मेरे बाप का खून किया है, याद है?” कविता की आँखें भर आईं। “तुम्हारे बाप ने भी मेरे चाचा को नहीं छोड़ा। लेकिन हम बच्चे हैं। क्या हम भी वही करेंगे?”

अर्जुन चुप हो गया। पहली बार किसी ने उसे इस तरह जवाब दिया था। दोनों ने मिलकर निबंध लिखा। कविता के विचार साफ़ थे, अर्जुन की भाषा जोरदार। निबंध प्रथम आया। स्कूल में दोनों के नाम साथ-साथ पुकारे गए। गाँव में खलबली मच गई।

उस दिन से कुछ बदलने लगा। नदी किनारे जब अर्जुन भैंस चराने जाता, कविता भी कभी-कभी वहीं किताब लेकर बैठ जाती। पहले तो दोनों एक-दूसरे की तरफ देखकर मुँह फेर लेते। फिर एक दिन बरसात हो गई। कविता की किताबें भीगने लगीं। अर्जुन ने बिना कुछ कहे अपना झोला आगे बढ़ाया। कविता ने लिया। दोनों की उंगलियाँ छू गईं। एक पल के लिए समय थम सा गया।

रात को अर्जुन अपने कमरे में लेटा रहा। नींद नहीं आ रही थी। कविता की आँखें याद आ रही थीं—शांत, लेकिन कुछ कहती हुई। कविता भी छत पर बैठी चाँद देख रही थी। मन में एक सवाल घूम रहा था—क्या दुश्मनी हमेशा के लिए रहती है?

फिर शुरू हुआ गुप्त संदेशों का सिलसिला। अर्जुन नदी किनारे एक पेड़ की दरार में छोटी सी चिट्ठी रख देता। कविता सुबह उठाती। कविता जवाब में फूल की पंखुड़ी रख देती। कोई शब्द नहीं, सिर्फ संकेत। धीरे-धीरे शब्द आने लगे।

“आज तुम्हें गुस्सा क्यों आया?”

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे चाचा को गाली दी।”

“मैं तुम्हारे पिता नहीं हूँ।”

“मैं जानती हूँ।”

एक दिन अर्जुन ने लिखा—“क्या तुम मुझसे नफ़रत करती हो?”

कविता का जवाब आया—“नफ़रत तो घर सिखाते हैं। दिल कुछ और कहता है।”

गाँव में होली का त्योहार आया। रंगों के बीच दोनों परिवार भी आए। अर्जुन ने कविता पर गुलाल डाला। कविता ने मुस्कुराते हुए अर्जुन के माथे पर टीका लगाया। लोग देख रहे थे। रामलाल और श्यामसिंह की आँखें तरेरने लगीं।

रात को रामलाल ने अर्जुन को बुलाया। “तुम यादव की बेटी से बात करते हो?”

अर्जुन चुप रहा।

“अगर फिर देखा तो घर से निकाल दूँगा।”

उधर श्यामसिंह ने कविता को डराया। “ठाकुर के लड़के से नज़र मिलाई तो शादी कहीं और कर दूँगा।”

दोनों चुप हो गए। लेकिन दिल नहीं माने। एक रात अर्जुन नदी किनारे गया। कविता भी वहीं थी। चाँदनी रात में दोनों आमने-सामने खड़े थे।

अर्जुन ने कहा, “हम दुश्मन हैं।”

कविता ने जवाब दिया, “दुश्मनी हमारे बाप-दादा की है। हमारा क्या कसूर?”

अर्जुन ने कविता का हाथ थाम लिया। “मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

कविता की आँखों से आँसू बह निकले। “मैं भी।”

उस रात उन्होंने फैसला किया—वे भाग जाएँगे। शहर में पढ़ाई करेंगे, अपनी दुनिया बनाएँगे। लेकिन भागने से पहले एक आखिरी कोशिश। दोनों ने मिलकर एक पत्र लिखा और गाँव के सरपंच को दिया। पत्र में लिखा था—दोनों परिवारों की दुश्मनी बंद होनी चाहिए। जवान पीढ़ी आगे बढ़ना चाहती है।

सरपंच ने गाँव की पंचायत बुलाई। रामलाल और श्यामसिंह आमने-सामने बैठे। हवा में तनाव था। अर्जुन और कविता भी वहाँ खड़े थे।

अर्जुन ने साफ़ आवाज़ में कहा, “पिताजी, आपकी दुश्मनी ने काफी खून बहाया। अब और नहीं। मैं कविता से शादी करना चाहता हूँ।”

कविता ने कहा, “मैं अर्जुन से शादी करना चाहती हूँ। अगर आप मना करेंगे तो हम दोनों गाँव छोड़ देंगे।”

रामलाल गुस्से से काँप उठा। श्यामसिंह ने लाठी उठा ली। लेकिन सरपंच ने हस्तक्षेप किया। “अगर बच्चे प्यार करते हैं तो तुम क्या कर सकते हो? दुनिया बदल रही है।”

रात भर बहस चली। सुबह रामलाल ने कहा, “अगर यादव माफी माँगे तो बात हो सकती है।” श्यामसिंह ने जवाब दिया, “ठाकुर भी माफी माँगे।” दोनों एक-दूसरे को घूर रहे थे।

तब अर्जुन ने आगे बढ़कर अपने पिता के पैर छुए। “पिताजी, माफी माँगिए। कविता के लिए।” कविता ने भी अपने पिता के पैर छुए। “बाबा, माफी माँगिए। अर्जुन के लिए।”

दोनों बुजुर्गों की आँखें भर आईं। सालों की नफ़रत के बोझ तले दबे दिल कुछ नरम पड़े। रामलाल ने श्यामसिंह की ओर हाथ बढ़ाया। “माफ करो भाई।” श्यामसिंह ने हाथ पकड़ लिया। “तुम भी माफ करो।”

गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। दोनों परिवारों की दुश्मनी खत्म हो गई। अर्जुन और कविता की शादी तय हुई। मंदिर में फूलों की वर्षा हुई। नदी किनारे जहाँ कभी सिर्फ नफ़रत की बातें होती थीं, अब हँसी की आवाज़ें गूँजने लगीं।

शादी के बाद अर्जुन और कविता ने गाँव में एक छोटी स्कूल खोली। जहाँ दोनों परिवारों के बच्चे एक साथ पढ़ते। पुरानी दुश्मनी की कहानियाँ अब सिर्फ कहानियाँ रह गईं।

साल बीत गए। अर्जुन और कविता के दो बच्चे हुए—एक बेटा, एक बेटी। बच्चे नदी किनारे खेलते। कभी-कभी बूढ़े रामलाल और श्यामसिंह भी वहीं बैठकर बात करते। दोनों अब दोस्त थे।

एक दिन कविता ने अर्जुन से पूछा, “अगर हमने हिम्मत न दिखाई होती तो क्या होता?”

अर्जुन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “तो दुश्मनी और बढ़ती। लेकिन प्यार ने दीवार तोड़ दी।”

कविता ने सिर अर्जुन के कंधे पर रखा। “प्यार सबसे बड़ा हथियार है।”

अर्जुन ने कविता का हाथ थाम लिया। “और सबसे बड़ी जीत भी।”

गाँव वाले अब कहते हैं—ठाकुर और यादव कभी दुश्मन थे। अब वे एक परिवार हैं। नदी अब भी बहती है। मंदिर अब भी खड़ा है। लेकिन दीवारें गिर चुकी हैं। दो दुश्मनों का प्यार गाँव की सबसे बड़ी कहानी बन गया।

अर्जुन और कविता अक्सर नदी किनारे बैठते। सूरज डूबता। पानी सोने जैसा चमकता। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देखते और मुस्कुराते। नफ़रत की राख पर प्यार का फूल खिल चुका था। और वह फूल कभी मुरझाने वाला नहीं था।

(लगभग 2000 शब्द)


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