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surbhi agrawal

Romance

4  

surbhi agrawal

Romance

क्यूंकि तुम हो

क्यूंकि तुम हो

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एकदम नाम के ही अनुरूप,.....एकदम अनोखे से इंद्रधनुष के जैसे, सातों रंगों के सारे गुण देखे उनके व्यक्तित्व में, कभी बैगनी रंग जैसे चमकदार कि आँखें में चमक आ जाये,नी ले रंग जैसे धीर गंभीर, शांत, विवेकपूर्ण,... तो कभी आसमानी रंग के जैसे स्वच्छन्द और उत्साही जैसे आकाश छू लेंगे,.. कभी हरे रंग के समान हर ओर खुशियां बिखेरते दिखते, तो कभी पीले रंग के समान शुभ और विलक्षण,... कभी नारंगी रंग जैसे, वो जिस तरह नए उजाले का पर्याय है, उसी तरह उसके जीवन को एक नई दिशा दी,.

तो कभी लाल रंग के जैसे गुस्सैल, खड़ूस और बेहद प्यारे ,.....जितना उन्हें जानती , उतना ही उसको अपनी किस्मत पर नाज़ होता,.... कई बार उसके कदम ठिठके, पीछे हुए,... पर हर बार रोक लिया उसके मन और अनुपम के अनुपम से प्रयासों ने कि शायद यही उसकी मंज़िल है, या यूँ कहूं हो सकती है.....

तभी तो लगभग 4 महीनों के बाद जो अनोखे से एहसास ( शायद प्रेम ही था )वो महसूस कर पा रही थी, वो कैसे कर पाती क्यूंकि बचपन कब बीता, समझ ही नहीं आया, समय ने समझदार बना दिया था, जवानी की कोई उमंग छू भी न पायी, उसके किसी एहसास का पता ही न चला,...अनुपम के रूप में पिता सा संरक्षण था और भाई जैसी सुरक्षा भी..... कभी माँ जैसी ममता तो कभी बहन जैसा साथ,....प्रेमी सुगंधा ने माना क्यूंकि ये उसके लिए शायद जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी थी, क्यूंकि प्रेम तो कभी उसने किया ही नहीं....

प्रेमी कहना शायद उचित न हो उनके लिए, क्यूंकि कुछ भावनाएं, कुछ रिश्ते शब्दों की मोहताज़ नहीं हुआ करते ......


अनुपम का जीवन में आना ऐसे हुआ, जैसे मानो किसी सीपी को स्वाति नक्षत्र की बूँद का इंतज़ार हो, जैसे बरसों के सूखे के कारण इंतज़ार के बाद बारिश की शीतल बूँदें गिर रही हों,.... या किसी मरते हुए व्यक्ति को कुछ साँसे मिल जाएँ, ठीक वैसे ही......

जो सारे के सारे एहसास अछूते से थे, क्यूंकि किसी का संरक्षण, स्नेह, अपनापन और सही मार्गदर्शन.... किसी ने कभी सोचा ही नहीं कुछ बेहतर करने का, बस अपने अपने अधिकारों का प्रयोग किया,... न मानसिक सम्बल न शारीरिक स्वास्थ्य....सूनी सी आँखों में कुछ तारे से टिमटिमाने लगे थे अब,... कुछ बेगाने से सपने अपने बन कर पलने लगे थे,... कुछ ऐसी आशाएं मन में हिलोरे ले रही थीं, जिनका शायद अस्तित्व भी बस कल्पना में ही रहा होगा कभी .... लेकिन नहीं, सब कुछ सपना नहीं था, सच था क्यूंकि हाँ एक हमदम मिल गया था, जिसको फ़र्क पड़ता था उसके रोने से, ख़ुशी हुआ करती थी उसके हँसने से, जिसको दुःख भी होता था उसको उदास देखकर, ऐसा नहीं है कि झट से मान लिया हो इस सब को सच, बड़ी हिम्मत करके लगभग 6 महीनों बाद शायद मन ये स्वीकार कर पाया था कि हाँ शायद ये सच है, उसके जीवन में भी कोई ख़ुशी दस्तक दे सकती है....


प्रेम, प्रेम कहना उचित हो या न हो, शायद नैतिकता के पैमाने पर भी खरा न हो ये सब,... शायद समाज या खुद उसका अंतर्मन ये स्वीकार न करे, पर भावनाओं के आवेग को रोकना भी कहाँ उचित था, क्यूंकि अनुपम ने ही तो कहा था एक दिन बातों बातों में कि हर व्यक्ति को जीवन में एक बार प्यार अवश्य करना चाहिए,... और दूसरी तरफ सुगंधा जो कभी प्यार करने की. हिम्मत ही न जुटा सकी,... पहले तो परिस्थितियां, समाज और उसकी माँ की स्थिति उसे कोई भी ऐसा कदम उठाने से रोक लेते थे, या नहीं यूँ कहेंगे कि वो कभी सोच ही नहीं पायी किसी के लिए ऐसा, क्यूंकि कोई इतना विश्वसनीय लगा ही नहीं.... इस संसार में कोई भी व्यक्ति बिना स्वार्थ के कुछ कहाँ करता है, और सबसे पहले अपने अस्तित्व को एकदम सुरक्षित रखना प्राथमिकता थी उसकी....


पर अनुपम, उसके साथ क्या ऐसा नाता था कि बस ऐसा लगा कि जैसे जीवन में सब कुछ मिल गया हो....तो प्यार मानना भी आसान तो नहीं था, पूरे मन के साथ माना... हाँ ये प्यार ही था,... कोई आपके मन की सारी बातें अक्षरशह:बिन कुछ कहे समझ पा रहा है,... कोई आपकी बेतुकी बातें भी बड़े मन से सुन रहा हो, कोई आपके दुःख में दुःखी हो जाये, और आपकी ख़ुशी में ख़ुश,.... आपको एक अच्छे दोस्त की तरह से सही रास्ता भी दिखाए और एक प्रेमी की तरह कन्धा भी दे दे सुकून के लिए,... जीवन लगभग बाहें पसारे इंतज़ार में था और बस इस एहसास को प्रेम ही कहना उचित लगा सुगंधा को......


कभी देखा है किसी पौधे में नई नई कोपले आते हुए, वो नाज़ुक से पत्ते सबसे खूबसूरत लगते हैँ,....

दुनिया के सबसे सुंदर रंगों का समायोजन तितली में ही मिल जाता है, नाजुक सी प्यारी सी तितली,...


लेकिन सुगंधा के लिए तो जैसे ये सारे रंग बेरंग से ही थे,... लगभग वो

जीना भूल ही गयी थी,... बस कैसे भी ज़िद थी खुद की सांसें चलाने की,... लगभग डेड लाइन....

अचानक से अनुपम के मिल जाने से सारा संसार ही बदल गया उसके लिए तो,.... जैसे मरते हुए व्यक्ति को थोड़ी सी सांसें मिल जाती हैं, एकदम वैसे ही.... उसे संवारने का तो कभी किसी ने सोचा ही नहीं, उन्होंने सोचा,... उसको लगता था कि अब कुछ नहीं हो सकता मेरा, लेकिन अनुपम को लगता था कि बहुत कुछ हो सकता है,...जिन चीज़ों को वो संसार की सबसे खराब चीज़ें मानती थी उनकी खूबसूरती अनुपम की नज़रों से देखीं उसने ,.... उसकी सारी कल्पनाओं को जैसे मूर्त रूप मिल गया हो, जैसे वो चाहती थी प्रेम करना और जैसे व्यक्ति से चाहती थी, एकदम वैसा ही तो है अनुपम,.... जिसकी कोई उपमा ही न दी जा सके....


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