क्यूंकि तुम हो....भाग 1
क्यूंकि तुम हो....भाग 1
आखिर मन की ढेर सारी उथल पुथल,दुविधा और डगमगाते हुए कदम घर की दहलीज़ के बाहर निकल पड़े,... हाँ, पहली बार अपने लिए शायद कुछ खुशियां मुट्ठी में समेट लेने के लिए, नहीं पता था कि क्या होने वाला था, क्यूँ बेबस सी, बावरी सी होकर सपना देख चली थी दूर क्षितिज के पार कि हाँ कुछ तो है वो, कोई तो अस्तित्व है ही उसका ,.... बेमानी ही सही, पर इन आँखों ने सपना देखने की ख्वाहिश की पहली बार,....
किसी ने इन 6 महीनों में उसको रोना, हंसना, खुद को शायद इंसान मानना सिखाया था थोड़ा सा,... कि वो अकेली नहीं है इस संसार में अपने एकलौते सहारे अपनी माँ पर कोरोना के ज़बरदस्त प्रहार के बाद पूरी तरह अस्वस्थ होने के कारण,.... उसको सिखाया था जीना, जो शायद वो कब से भूल गयी थी, उसको रुलाया भी माँ के जाने के बाद , शायद डर था कि कहीं पत्थर न हो जाये वो, मर ही न जाये,....
पर ज़िंदा क्यूँ रखना था उसको, ये समझ नहीं आया उसको,क्यूंकि कभी उसकी परवाह किसी ने की ही नहीं, बस अपने अपने हिस्से का रिश्ता निभाया सभी ने सुगंधा से हाँ सुगंधा,... बड़े प्यार से नाम रखा था उसकी उसकी माँ ने उस राजकुमारी सरीखी लड़की का,.. राजकुमारी इसलिए कहा कि हाँ उसका जन्म हुआ तो राजा के यहाँ ही था न, ऊँचा खानदान, बड़े लोग, बेहिसाब पैसा, इतना कि समेटा भी न जाए, पर अक्सर अधिक पैसे वाले लोगों में दुर्गुण भी बड़े बड़े ही होते हैँ, समय ने करवट ली और रातों रात पिता को शराब और जुए की बुरी लत लग गयी... राजा को रंक बनने में समय न लगा, पूरा परिवार बर्बादी के कगार पर आ खड़ा हुआ, पिता तो शराब के नशे में धुत्त रहते, सारा व्यापार ठप्प हो गया,... रह गए तो बस सुगंधा, उसका सौतेला भाई (पिता की पहली पत्नी का बेटा ), कुटिल दादी ,और माँ,.. कुटिल इसलिए बोला, इतनी धनवान होने के बावजूद भी उन्होंने अपने बेटे की खराब हालत के बाद न बच्चों का साथ दिया न ही अपनी बहू का..... दुःख में जैसे अपनी परछाई भी साथ छोड़ देती है,सारे रिश्तेदारों ने बिलकुल ऐसे ही अपना पीछा छुड़ा लिया.....कुल मिलाकर सुःख शब्द का मतलब भी नहीं पता था उस बच्ची को, न बचपन के खेल खिलौने, न ही कोई गुड़िया का ब्याह,....बस एक धुन थी कि खुद को काबिल बनाना है,....
जैसे तैसे माँ ने नौकरी कर ले अपने दोनों बच्चों को पढ़ाया, पाला पोसा, पर समाज के भेड़ियों से खुद को और अपनी बेटी को बच्चा बड़ा ही चुनौतीपूर्ण रहा,... अगर हम सुगंधा की बात करें तो सोलह कलाओं से युक्त रही वो, पढ़ने में अव्वल,... उस समय जो कुछ भी उपलब्द था उस छोटे से गाँव में, वो सब कुछ सीखा, कोई काम ऐसा नहीं था जो उसको न आता हो,... सारे अध्यापको की जान बसती थी उस में, जो कोई उसको देखता तो बस यही कहता कि यूँ ही कोई मांग कर ले जाएगा इसको तो .... माँ को बड़ी ख़ुशी और गुरूर होता अपनी सुगंधा पर,...
पर शायद अभी परीक्षा बाकी थी, बड़ी ही मुश्किलों के बाद सुगंधा का विवाह एक अच्छे परिवार में हुआ ,.. कहते तो सब यही हैँ कि बेटी बनाकर रखेंगे, पर न जाने क्यूँ मुझे लगता है कि ये वक्तव्य न कहकर अगर हम बस रिश्तों को ही वरीयता दे दें तो भी शायद परस्पर प्रेम बना रह सकता है,.... कि कम से कम हम बहू को बहू ही मान लें, लेकिन सारे मापदंड तब बदल जाते हैँ, ज़ब आप एक दहेज़लोलुप परिवार का हिस्सा बनते हैँ जहाँ आपके किसी भी गुण का कोई महत्व ही नहीं, वहां महत्व है उस निर्जीव वस्तु (पैसे ),.. जो एक माध्यमवर्गीय परिवार शायद नहीं कर पाता है दूसरों की अपेक्षा के अनुरूप या यूँ कहूं बस जीवनयापन ही पहला उद्देश्य होता है ....
सुगंधा जिस माहौल और स्वाभिमानी वातावरण में पली बढ़ी थी, तो बड़े सधे हुए विचार और सिद्धांतवादी विचारधारा की स्वामिनी थी, बड़ों का भरपूर सम्मान और छोटों को असीमित स्नेह उसकी रग रग में बसा था,....उसको शायद आदर्श बनने की धुन थी हर क्षेत्र में... उसको हर मापदंड पर खरा उतरना था उस परिवार में,...
पर अफ़सोस ये हो न पाया,.. भयंकर मानसिक प्रताड़ना और हर तरह के अत्याचारों के बाद उसका शरीर बीमारियों का घर बन गया, क्यूंकि वहां कोई भी नहीं था, जिसको उससे कोई सरोकार हो, नतीजन उसको अनवरत बुखार ही रहा शरीर में, जिसका इलाज कभी कोई डॉक्टर कर ही न पाया क्यूंकि किसी को कुछ भी समझ न आया, पति उसको संसार के लगभग हर शहर के डॉक्टर के पास तो गए लेकिन कभी कारण जानने की कोशिश नहीं की,... शरीर और मन बेहद कमज़ोर हो गया था, किसी से आँखें मिलाने में भी डर लगता था उसको, ... दर्द इतना कि कोई छू भी ले तो कराह उठे, पैर के नाखून से सर के बाल तक दर्द में बिधे थे, शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था, जहाँ दर्द न हो ,... बहुत से डॉक्टर्स को दिखाया लेकिन किसी को भी मर्ज़ समझ ही न आया....वो अभी हार मान चुकी थी लगभग,...
लेकिन ये वो किसको समझाती कि ये दर्द तन का नहीं मन का है,....
पर कहते हैँ न कि ईश्वर किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य ही करते हैँ, ऐसा ही हुआ उसके साथ भी कुछ...लगभग आधे से अधिक जीवन यूँ ही बेमानी सा बीत ही चुका था,......
बस कुछ ऐसा ही चमत्कार हुआ, कोई ऐसा मिला जिसे शायद ईश्वर से उसी के लिए बनाया हो,....जिस तरह से उन्होंने साथ दिया शायद ही कोई किसी का दे पाता है, जिंदगी हौले से मुस्कुराने लगी हो जैसे,... धीमे धीमे मन के दरवाज़े पर दस्तक दी थी किसी ने,... कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है, जीवन के इतने खराब अनुभवों के बीच कोई एक साया शीतलता का एहसास करा रहा था,... वर्षों की रिकत्ता जैसे सम्पूर्ण होने को हो ... कौन है वो?? आज के समय में जब ख़ुशी में भी लोग मन से साथ नहीं होते तब इतने विषमतम समय में किसी ने अपना हाथ दिया था सम्भलने के लिए..... किसी ने एक कटती हुई पतंग की डोर थाम ली थी,... कि नहीं अभी उड़ना है तुम्हें, देखना है खुला आकाश, संजोने हैँ कुछ अपने हिस्से के सपने,थोड़ा सा जीना है खुद के लिए ,.......
अनुपम नाम है उनका,......
क्या आप अनुपम के विषय में और अधिक जानना चाहेंगे..... तो इंतज़ार कीजिये अगले भाग का,... क्यूंकि तुम हो....

