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Yahya Khan Yusufzai

Comedy Classics


2.0  

Yahya Khan Yusufzai

Comedy Classics


क्या फर्क पड़ता है

क्या फर्क पड़ता है

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वह मई की एक आम सी सुबह थी, मैं ने दिनचर्या की आवश्यकताओं से विमुक्त
 हो कर नाश्ते की मेज का रुख किया, नाश्ता करने के हकीमी फ़ायदों अलावा एक फ़ायदा यह भी है कि आप को अखबार पढ़ने मिल जाता है, दरअसल अखबार पढ़ने का वास्तविक आनंद तो नाश्ते की मेज पर ही आता है। मेरे प्रिय मित्र जुम्मन खान के कथन अनुसार पूर्व में अखबार पढ़ने की सही जगह नाश्ते की मेज है और पश्चिम में कमोड, वे कहते हैं कि यह विरोधाभास भी इस लिए है कि जिस तरह की खबरें इन दिनों अखबारों में होती हैं उन से हमारे मुंह की बंदिश खुल जाती है और उनके पेट की। (नोट: जुम्मन के शब्दों में "पेट" शामिल नहीं था)।

बात अखबार से शुरू होकर, कमोड से होती हुई न जाने कहां पहुंच जाए, खैर मुझे लगा कि आज भी अखबार की सिर्फ तारीख बदली होगी, लेकिन देखा तो इतिहास ही बदलने जा रहा था। शीर्षक देख कर अपनी आँखों पर विश्वास करना मुश्किल था, इसलिए कई बार खबर देखी, फिर जब तसल्ली हो गई कि आँखें धोखा नहीं दे रहीं तब भी दुविधा में पड़ा रहा। खबर थी कि भारत की नई सरकार ने बाकायदा देश को "हिंदू राष्ट्र" बनाने की घोषणा की थी। परेशानी इस बात की नहीं थी कि यह क्यों हो रहा था, लेकिन यह कि अचानक यह क्यों हो गया। 

पत्नी को यह खबर सुनाई तो उसने जरा देर चुप रहकर कहा "तो क्या फर्क पड़ता है"। 

में गड़बड़ा गया "मुझे क्या?" मैंने मन ही मन कहा।

इतने में बेल बजी, यह हमारे दूधवाले "रामू" के आने का समय था। वह करीब के एक गांव से शहर में दूध बेचने आता था, बहुत गरीब था, दो महीने पहले उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी, तब से बेचारे रामू की जिम्मेदारियों और बढ़ गई थीं। खैर, रामू एक किसान था और किसानों में गरीबी, ऋण, और आत्महत्या आम बात हैं। मैंने सोचा चलो शायद देश के हिंदू राष्ट्र बन जाने से रामू या ऐसे किसानों की मुश्किलें कम हो जाएं। रामू से दूध लेकर फ्रिज में रखा और बेगम को अलविदा कह के कार्यालय के लिए चल दिया।

पार्किंग में गुप्ता जी से मुलाकात हो गयी जो संयोग से मेरे पड़ोसी थे और मेरे कार्यालय में ही काम भी करते थे, इस प्रकार हम एक दूसरे की सब "खूबियों" से परिचित थे। इधर उधर की बातों से शुरुआत हुई तो मैंने धीरे से उन्हें हिंदू राष्ट्र वाली खबर पर बात की, बोले "हूँ"। उनकी "हूँ" पर हैरान रह गया लेकिन शायद उनके मुंह में पान था। मैं ने फिर छेड़ना उचित न समझा। गुप्ता जी पान के शौक़ीन थे, ख़ैर उत्तर भारत के अधिकतर लोग पान के शौक़ीन हैं लेकिन गुप्ता जी हैदराबादी पान के शौक़ीन थे। उन्हें यह चस्का लगाने वाला भी मेरा प्रिय मित्र जुम्मन खान था, जिस ने गुप्ता जी को हैदराबाद पलंग तोड़ पान के "निज़ामी " किस्से सुना सुनाकर पान का भक्त बना दिया था, अब गुप्ता जी को कौन समझाए कि लखनऊ में भी कुछ वाजिद अली शाह पेटेंट नवाबी नुस्ख़े मौजूद हैं जिनसे वे लाभ उठा सकते थे।

गुप्ता जी की "हूँ" के बाद हम दोनों साथ साथ कार्यालय हो लिए। मैं सोच रहा था कि आज कार्यालय में, होटल में, हर जगह इसी खबर के के सन्दर्भ में बातें होंगी, यह बड़ा बोर कर देने वाला एहसास था। गुप्ता जी मेरे बगल वाली सीट पर बैठे बदस्तूर पान चबा रहे थे और मैं विंड स्क्रीन के पार अंतरिक्ष में "हिंदू राष्ट्र" के बाद होने वाली किसी बदलाव को ढूंढने की कोशिश कर रहा था, लेकिन जब तेज हार्न की आवाज ने जादू तोड़ दिया तो याद आया कि यह शहर की एकमात्र और बहुत व्यस्त सड़क थी, जिस पर यातायात अक्सर जाम रहता था। मैंने सोचा कि शायद देश के हिंदू राष्ट्र बन जाने के बाद यातायात की समस्या का भी समाधान हो सकता है?

कार्यालय पहुंचकर पहले बॉस को सलाम किया, कंप्यूटर ऑन किया और हमारे ऑफिस बॉय (कार्यालय संयंत्र) सावंत को चाय के लिए आवाज़ दी। यह शब्द ऑफिस बॉय भी अजीब है। अब सावंत को देख लें, उम्र 55 साल थी, सेवानिवृत्ति बिल्कुल करीब है, लेकिन भला हो अंग्रेजी भाषा का जिसने इस बूढ़े चपरासी को ऑफिस बॉय बना दिया। सावंत यूं तो हमारे कार्यालय का सबसे बुजुर्ग कार्यकर्ता था, लेकिन हम लोग आनंदपूर्ण स्वभाव की वजह से उसके साथ अक्सर मजाक करते रहते थे। उसने कभी किसी के छेड़ने का बुरा नहीं मनाया। दरअसल उसने कभी इन बातों के गंभीरता से लिया ही नहीं, उसे बस चिंता थी तो अपनी तीन बेटियों। दो बेटियों ब्याही जा चुकी थीं, तीसरी के दहेज की राशि पूरी होनी थी, रिश्ता तय हो चुका था, तब उसकी भी शादी हो जाती। सावंत ने अपने जीवन भर की मेहनत और कमाई अपनी बेटियों पर ही खर्च कर दी थी। मैंने सोचा चलो देखते हैं, हिंदू राष्ट्र बनने का अगर सावंत जैसे लोगों को कुछ फ़ायदा हो तब भी ठीक है। सावंत की चाय हमेशा की तरह सुखदायक था।

लंच से ठीक पहले हमारे कार्यालय की महिला क्लर्क "मिसेज़ जाधव" आयीं, वह रोज़ाना उसी समय आती थीं, गुप्ता जी के कथनानुसार यह उनके चुगली करने का समय था, और अगर किसी दिन उनका यह नियमित कार्यक्रम
बदल जाए तो उनका पाचन खराब हो जाता था। उनकी इस आदत से अलबत्ता उन को फ़ायदा ज़रूर होता था जो किसी मजबूरी के कारण अखबार नहीं पढ़ते या उनका कोई पसंदीदा डेली सोप टेलीविजन कार्यक्रम छूट जाता। मिसेज़ जाधव की बातें कार्यालय के मामलों से शुरू होकर, स्थानीय खबरों से होती हुई, डेली सोप नाटकों तक पहुंच जातीं और फिर आलू भिंडी के बढ़ते दामों पर समाप्त होती। मुझे लगा कि मिसेज़ जाधव आज की सबसे बड़ी खबर पर बात जरूर करेंगी लेकिन उन्होंने दुनिया जहान की बातें करने के बाद बढ़ती महंगाई पर एक शॉर्ट स्पीच दी और लंच के लिए चल दीं। लंच करते हुए मैं सोच रहा था कि अगर हिंदू राष्ट्र बनने से महंगाई ही कम हो जाए तब भी ठीक है।

लंच में गुप्ता जी के साथ टिफिन शेयर करना मेरी आदत थी, हालांकि वह ब्राह्मण थे लेकिन गहरे संबंध होने से उन्हें कभी मेरे मांसाहारी होने से कोई प्रॉब्लम नहीं थी। यूं तो मैं कार्यालय में सदा शाकाहारी ही बना रहता था लेकिन गुप्ता जी खुद खुले आम हर रविवार दिल्ली दरबार होटल में दोस्तों के साथ बिरयानी खाने नेक काम समझते थे। कभी कभी ऐसा होता है कि मैं कोई बहाना कर लेता लेकिन गुप्ता जी अपने दिनचर्या में परिवर्तन कभी नहीं करते, उनका मानना था कि रविवार को वह सब काम जिन से मना किया गया है, कर लेने से हफ्ते भर का तनाव कम हो जाता है।

खैर,  जुम्मन खान के कथनानुसार गुप्ता जी सावन के अंधे थे और उनका यह "दृष्टिदोष " कोई ठीक नहीं कर सकता था। मैंने सोचा कि हिंदू राष्ट्र बन जाने से क्या गुप्ता जी जैसे मांसाहारी हिंदू शाकाहारी हो जाएँगे ?

लंच के बाद मेरी आमतौर पर बॉस के साथ बैठक हुआ करती थी, वह व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक को बुलाकर आवश्यक निर्देश जारी करते। अल्लाह का शुक्र था कि यह बैठक लंच के बाद हुआ करती थीं, अगर यह लंच से पहले होती तो पेट भर के बॉस की डांट खाने के बाद किस कम्बख्त को भूख लग सकती थी वैसे बॉस एक नेक इंसान थे, 90 के दशक के आई आईटी स्नातक थे, बीस साल अमेरिका में सेवा करने के बाद वापस लौट कर यहीं सेट हो गए थे। उनका एक बेटा भी था जो लंदन में पढ़ाई कर रहा था, और एक बेटी जो ऑस्ट्रेलिया से स्नातक होने के बाद एक एनआरआई से शादी कर के वहीं बस गई थी। मुझे अक्सर आश्चर्य होता है कि हमारे देश के बुद्धिमान व्यक्ति उच्च शिक्षा लेकर विदेश क्यों भाग जाते हैं, यह बात कितनी विरोधाभासी है कि हमारे देश में जहां उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध हैं वहां की प्रतिभा का अन्य देश "अपहरण" कर लेते हैं, और जहां प्रतिभा पर्याप्त मात्रा में मौजूद है वहां उच्च शिक्षा के संसाधन उपलब्ध नहीं। मेरे एकमात्र बैरोज़गारदोस्त जुम्मन खान के कथन के अनुसार जिस देश के डॉक्टर, इंजीनियर, और वैज्ञानिक देश से बाहर अपना भविष्य ढूंढ़ते हों, जहां मैट्रिक से लेकर सिविल सर्विसेज तक के पर्चे लीक होते हूँ उसे बर्बाद करने के लिए दुश्मनों की कतई जरूरत नहीं । यह शायद हमारी शिक्षा प्रणाली और सेवा क्षेत्र की खामियां थीं लेकिन खैर, मैंने सोचा कि शायद देश के हिंदू राष्ट्र होने के बाद हमारी शिक्षा प्रणाली और सेवा क्षेत्र में कुछ सुधार आ जाए?

बॉस के साथ बैठक के बाद कुछ जरूरी काम निपटा दिए और काम होते ही अपने दोस्त जुम्मन को फोन किया। मेरा और गुप्ता जी का सामान्य था कि रोज़ाना कार्यालय से वापसी में जुम्मन से जरूर मिलते, वह मेरा बचपन का दोस्त था, और अपनी मुर्ख स्वाभाव के चलते मेरे अन्य परिचितों में भी लोकप्रिय था, जान ए महफ़िल टाइप बंदा था, बुद्धि से खाली , लेकिन दिल का राजा। रोज़ाना शाम को हम जानू भाई के धाबे पर मिलते, गपशप होती, सगरेटें जलतीं और चाय के प्याले छलकते। जानू भाई का नाम भी अजीब था। माँ बाप ने जुनैद नाम रखा था जो बिगड़कर जूनो फिर जानू हो गया। परंतु एक साथ जानू और भाई होना भी बहरहाल इमोशनल अत्याचार ही कहा जा सकता था।

जानू भाई का धाबा  दो कारणों से प्रसिद्ध था। एक, इसका स्वादिष् खाना और दूसरी, वहाँ बजने वाले पुराने गीत । जानों भाई का धाबा दुपहर के बाद खुलता और रात भर आबाद रहता। वहाँ शहर का हर व्यक्ति मिल जाता था, फर्क सिर्फ समय का था। और इसी कार्यक्रम की तुलना से गीतों का चुनाव होता। शाम से रात तक 80 और 90 के दशक के गीत बजते और दर्शकों में अधेड़ उम्र के भूतपूर्व प्रेमियों की ज़्यादा संख्या होती जिन्हें मोहम्मद अज़ीज़ या कुमार सानु के गीत अपनी हाथ से निकलती जवानी की पीड़ा का एहसास दिलाते। इसके बाद आधी रात तक रफी, मुकेश और लता आशा के सदाबहार गाने गूंजते और दर्शकों की संख्या शहर के वर्तमान प्रेमियों की होती। फिर सुबह तक जानू भाई चयनित एक विशिष्ट प्लेलिस्ट बजाई जाती जिस में सिर्फ वही गाने शामिल होते जो ट्रक ड्राइवरों को पसंद हों, उनका धाबा शहर के एकमात्र राजमार्ग के मोड़ पर था और सुबह से पहले वहां से गुजरने वाले अक्सर यात्री धाबे पर रुक जाते थे। जुम्मन प्रतिपक्ष में ही सिगरेट का धुआं उड़ाता हमारा इंतजार था। हमेशा की तरह तपाक से मिला और अपना सिगरेट का खाली पैकेट गुप्ता जी के पैकेट से बदल दिया। गुप्ता जी इस अन्याय पर "पान के घूंट" पी गए जो हमेशा की तरह उनके मुंह में मौजूद था। उनकी पान खाने की आदत भी गजब थी, चाहे कोई उन्हें भला बुरा कह दे, जब तक पान अच्छी तरह चबा कर थूक नहीं देंगे जवाब नहीं देंगे, तब तक विरोधी को यह एहसास जरूर हो जाता कि भला आदमी है, अहिंसा वादी है, जाने दो। जुम्मन भी उनकी इसी आदत का फायदा उठाता । लेकिन जुम्मन के व्यक्तित्व में जो मूर्खता भरी मासूमियत शामिल थी उसके  चलते कोई उसकी किसी भी हरकत का बुरा नहीं मानता। मेरी और उसकी बचपन की दोस्ती थी, पारिवारिक व्यक्ति था, दिल का हातिम ताई, सदाबहार हंसमुख लेकिन बैरोज़गार था। इतनी योग्यता नहीं थी कि आसानी से जॉब मिल जाती, न तो मन ही था कि कुछ "जुगाड़" कर काम चला लेता। मैं ने सोचा  क्या "हिंदू राष्ट्र" में बेरोजगारी खत्म हो जाएगी?

जुम्मन के साथ इधर उधर की बातें हुईं, चाय के प्याले छलके, सिगरेट का धुआं जमा होने लगा। धाबे में मोहम्मद अज़ीज़ का गीत "दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है" बज रहा था। मैं ने सुबह वाली खबर पर चर्चा छेड दी। जुम्मन ने एक आलोचनात्मक नजर मुझ पर डाली, फिर अपने अंदाज में मुस्कराने लगा (जुम्मन जब मुस्कुराता तो बिल्कुल ऐसे लगता मानो दिल ही दिल में भला बुरा कह रहा हो)। और कहा "अबे यार क्या फर्क पड़ता है"

 गुप्ता जी जो अब तक चुप चाप पान चबा रहे थे, फिर बोले "हूँ" . 

मैं झल्ला गया "तो क्या वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं ही मूर्ख हूँ जिसे दुनिया भर की चिंता है"। 

जुम्मन बोला "फर्क पड़ता है भाई, लेकिन किसे फर्क पड़ता है यह महत्वपूर्ण है, ए  छोटे इधर आ" उस ने एक नौकर को बुलाया जिसे सब छोटे कहते थे। 

छोटे दौड़ कर आया और पूछा "क्या लाऊं साब"। 

जुम्मन ने पूछा "यह बता तू हिंदू है या मुसलमान, तेरा नाम क्या है" 

छोटे ने दांत निकाल दिए "मैं गरीब हूं साब, और मेरा नाम छोटे है"। 

मैं ने सिगरेट का सारा धुआं एकबारगी छोड़ दिया, छोटे बदस्तूर दांत निकाले खड़ा था, गुप्ता जी फिर चुप हो गए और जुम्मन फिर मेरी ओर देखकर मुस्कराने लगा। बैक ग्राउंड में मोहम्मद अज़ीज़ का गीत गूंज रहा था।


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