करती क्या हैं सारा दिन
करती क्या हैं सारा दिन
अरे हमारे जमाने में तो साँस लेने की फुरसत नहीं होती थी ! पूरा दिन काम और परिवार तो इतना बड़ा होता था फिर भी हम सब काम खुद कर लेते थे ! आज कल नौकरानी है फिर भी दो कमरे के घर में भी काम न होता है ! सुशीला जी अपनी पड़ोसिन रिमा आंटी से बातें कर रही थी।
रिमा आंटी बहुत सुलझी और बहुत समझदार थी आजकल के भागदौड़ वाली जीवन को अच्छे से समझती थी।
नहीं सुशीला पहले और अभी के काम में बहुत फर्क है ! हम और तुम कहां बाहर जाकर काम करते थे ! और काम तो था पर यहाँ जैसे घड़ी की सुईयों के हिसाब से नहीं ! हम अपने हिसाब से करते थे ! यहाँ तो दिनभर में जितने आदमी हैं,उतनी बार सबके समय के हिसाब से खाना। हम तो सुबह एक बार बनाकर रखते थे फिर रात को बस बीच में सिर्फ चाय फिर उपर के काम सब मिलकर भी तो करते थे। यहाँ अकेले सब करना पड़ता है रिमा आंटी ने सुशीला जी से कहा।
"क्या काम रहता है सिर्फ कलछी ही तो चलाना होता है" सुशीला जी ने मुँह बनाते हुऐ कहा।
शोभना सुशीला जी की बहु चाय बना रही थी और सब सुन भी रही थी, वो हमेशा अपनी सास से रोज यही सुनती आ रही थी "क्या काम होता है सिर्फ कलछी ही तो चलाना होता है"। उसने मन ही मन कुछ सोचा और चाय समोसे लेकर आ गई।
"लिजिए आंटी चाय और समोसे" घर के ही हैं।
"घर के हैं तो जरूर खाउंगी" ! और बता शोभना कैसा चल रहा है तेरा काम ! तु भी सुबह तो ऑफिस जाती है रोहित के साथरिमा आंटी ने पूछा।
हाँ आंटी सुबह जाती हूँ रोहित को थोड़ी मदद हो जाती है। अपना काम है तो देखना तो पड़ता ही है ! रोहित के न होने पर सब मुझे ही देखना रहता है इसलिए काम की जानकारी भी हो जाती है और रोहित को मदद भी ।
फिर भी तु इतना काम कर लेती है और समोसे भी बना लिए वाह ! सुबह तो बच्चे भी स्कूल जाते हैं कैसे कर लेती है तु ?रिमा आंटी ने पूछा।
आंटी करना क्या होता है कुछ नहीं बस छह बजे उठती हूँ बड़ी बेटी को नास्ता टिफिन देकर स्कूल छोड़ती हूँ, फिर सात बजे सबका नास्ता और खाना बनाती हूँ ! छोटी बेटी को उठा कर तैयार कर नास्ता कराती हूँ ! फिर सबको नास्ता देकर खुद तैयार होती हूँ ! अगर समय रहा तो नास्ता करती हूँ नहीं तो ऑफिस जाकर ही करती हूँ ! फिर बारह बजे घर आती हूँ और छोटी बेटी को स्कूल के लिए तैयार करती हूँ ! उसका टिफिन बनाकर स्कूल छोड़ती हूँ ! और बड़ी बेटी को लेकर आती हूँ।
दो बज जाते हैं ! खाना खाकर एक घंटे आराम करती हूँ फिर मशीन लगाना कपड़े फैलाना,आयरन करना शाम का नास्ता सब में पाँच बज जाते हैं, तब तक छोटी बेटी को लाने का समय हो जाता है उसे लेने चली जाती हूँ ! आते आते छह बज जाते हैं चाय बनाती हूँ छोटी को नास्ता देती हूँ कपड़ें बदलती हूँ,तब तक सात बज जाते हैं फिर रात के खाने की तैयारी और कुछ नहीं आंटी बस इतना ही काम होता है।
सुशीला जी अपनी बहू का मुँह ताकती ही रह गई और रिमा आंटी सब समझ गई थी।
चलो आंटी आप बातें करो और चाय पियो मैं थोड़े काम निपटा लूं शोभना फिर किचन में आकर अपने काम निपटाने लगी और इंतजार करने लगी जो तीर उसने फेका है वो निशाने पर लगा या नहीं।
सुशीला तु भी कैसी बात करती है पुरा दिन काम करती है बहू फिर भी तु बोलती है कलछी चलाती है सिर्फ ! कामवाली है तो भी इतने काम कम हैं क्या ? हम कब इतने भागदोड़ कर काम करते थे। आज कल के काम अलग हैं पुरा दिन थकान वाले समझी।
अपनी बहू को समझ, जितना वो करती है हम नहीं करते थे हमारे काम और इनके काम में बहुत फर्क है,घर बाहर सब देखना पड़ता है और बच्चे भी हम तो सिर्फ घर के काम में थक जाते थे ।
एक दिन घड़ी की सुइयों पर काम कर के देख फिर पता चले अभी के काम और हमारे जमाने के काम मेंऔर कलछी चलाना क्या होता है ये भी मालूम हो जाएगा रिमा आंटी ने कहा।
शोभना किचन में मंद मंद मुस्कुरा रही थी उसका "तीर निशाने पर जो लगा था"।
शोभना जैसे ही सारे काम निपटा कर आई देखा सासू मां गहरी चिंतन में थी। सब रात को खाना खाकर सोने चले गयें। शोभना के लिए सुबह कुछ बदला बदला लगा। कमरे से बाहर निकली तो बहुत सारे ऊपरी काम सासुमां ने करके रखे थे। सोफे ,डायनिंग टेबल सब साफ किये हुए।
माँ में आ ही रही थी आपने क्यों किया ?
नहीं बेटा मैंने कभी तेरे कामों को समझा ही नहीं यहाँ छोटे छोटे बहुत काम हैं। सचमुच मैं तो अंधी होकर बैठी थी कल शाम आँख खुली मेरी क्या करूं बुढापा आ गया है इतना कहकर वो खुद हँस पड़ी और साथ में शोभना भी। शोभना मन ही मन बोली "सुबह का भुला शाम को वापस आ जाए तो उसे सचमुच भुला नहीं कहते" और फिर से मंद मंद मुस्कुरा पड़ी।
