Vinay Sengar

Inspirational


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Vinay Sengar

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कर्म ही पूजा है।

कर्म ही पूजा है।

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ये कहानी एक आम व्यापारी की है जो लॉक डाउन में अपने परिवार के भरण पोषण के लिए अपना व्यापार बदलने में गुरेज नहीं करना है। बिना किसी बहाने के या किसी को कोसे आप जीवकोपार्जन कर सकते है।

हुकुमचंद ने अभी अभी स्नातक किया था, उसका एक मित्र चरणदास के पिता शहर के मशहूर व्यापारी थे, हुकुमचंद जब अपने मित्र के घर जाता तो उसके पिता के ठाठ देखकर उसने भविष्य में स्वर्णकार बनने के बारे में सोचता। स्नातक करने के उपरांत हुकुमचंद अपने मित्र के साथ उसके पिता से स्वर्णकार की बारीकियां सीखने लगा, तकरीबन एक वर्ष हुकुमचंद अपने मित्र के यहां से सीखे गए हुनर के दम पर एक छोटी सी स्वर्णाभूषण की दुकान खोल पाया जिसमे वो कानों की बाली, पायल आदि छोटे स्वर्णाभूषण को बेच और उनकी मरम्मत कर रहा था। पर अभी भी समस्याएं कम नहीं थी क्योंकि स्वर्णकार को पैसे की सख़्त आवश्यकता होती है जो कि हुकुमचंद के पास था नहीं कम पूंजी पर भी हुकुमचंद अपना व्यापार जमाने में सफल रहा। तभी एकाएक टीवी चैनलों पर खबर प्रसारित की गई की सम्पूर्ण भारत में लॉक डाउन घोषित कर दिया गया है, जो कि 21 दिन का था। लॉक डाउन की वजह से हुकुमचंद की काफी उधारी बाजार में फँस गई थी, और बाकी एक बड़ी रकम उसने सोने और चाँदी की एडवांस डिलीवरी के लिए भी जमा किया था। पर जैसे तैसे 21 दिन का लॉक डाउन भी कट गया। पर हुकुमचंद जैसे छोटे स्वर्णकार पर अभी गाज गिरना बाकी था, उन्हे झटका तब लगा जब लॉक डाउन दोबारा 3 मई तक के लिए बड़ा दिया गया। अब हुकुमचंद ये समझ गया था कि कोरोना जैसे महामारी की वजह से लॉक डाउन जल्दी नहीं खुलेगा।और हुकुमचंद के सामने अपने परिवार के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी थी जिसमे उसकी माँ छोटे भाई बहन थे क्योंकि उसके पिता का साया पहले ही उठ गया था।

हुकुमचंद चाहता तो अपने मित्र से मदद मांग सकता था पर उसने यह सही नहीं समझा और उसने जो निर्णय लिया वो उसके लिए काफी कठिन था परन्तु उसे यही सही लगा उसने सरकारी कार्यालय जाकर सब्जी बेचने का पास बनवाया फिर सुबह सुबह मंडी जाकर सब्ज़ियाँ खरीदी और उसे एक टेंपो में लाकर बेचना शुरू किया अब उसकी दैनिक आमदनी इतनी हो गई थी कि वो अपने परिवार का भरण पोषण कर पा रहा था ।



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