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DivyaRavindra Gupta

Drama


2.5  

DivyaRavindra Gupta

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कोचिंग जीवन का पहला दिन

कोचिंग जीवन का पहला दिन

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नवोदय स्कूल से बारहवीं के एग्जाम देने के बाद रिजल्ट आ चुका था । अपेक्षानुरूप सभी विषयों में अंक श्रेष्ठता की कसौटी पर थे जो कि हमारे उत्कृष्ट बुद्धित्व को एक बार पुनः प्रमाणीकृत करने के लिए साक्ष्य भी थे । परिवारजन सब प्रफुल्लित थे । कुछ दिनों के उत्सत्व के तत्व को ग्रहण कर अब उज्ज्वलभविष्य के पट खोलने हेतु कोटा कोचिंग में दाखिला लेना तय हुआ । हमें तो सिर्फ तय कर पापा को अपने निर्णय से रूबरू कराना मात्र था बाकी आर्थिक फण्ड आदि की व्यवस्था तो उनके ही चिंतापुस्तक का अध्याय था जिससे हमें दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था । खैर पापा ने ननिहाल व मौसिहाल से आवश्यक फंड की व्यवस्था कर हमें कोटा के प्रतिष्ठित कोचिंग में दाखिला करवा दिया । प्रवेश होते ही मन में अहसास होने लग गया कि अब हम निकट भविष्य के इंजीनयर हो चुके हैं । बड़े होने का अहसास होने लगा था ।

प्रवेश के साथ ही रूम व मेस व्यवस्था करने की अगली चुनौती के निवारण हेतु प्रयासरत हो चुके थे । जिसका कोचिंग के बाह्यतम गेट पर आते-आते एजेंट के तौर पर समाधान भी हो गया । एजेंट ने हमें उसके व्यवसाय क्षेत्र के अनेकों रूम दिखाए और साथ ही वह इस बात पर भी हमें विश्वास दिलाने में कामयाब हो गया कि वह कोटा नगरी के सर्वाधिक बेहतरीन जगह व मकान में ही हमें रूम्स बता रहा है । मन ही मन हम उसको अनजान नगरी में ईश्वर का फरिश्ता के आदर भाव से सुशोभित करने लगे । खैर अंततः हमने रूम के चयन को अंतिम रूप दे दिया साथ ही पड़ोस में चलने वाले मेस का भी निर्धारण कर लिया गया । मेस वाले महानुभाव ने पापा और मुझे पहले दिन बहुत ही आतिथ्य भाव से निशुल्क स्वादिष्ट भोजन करवाया । पापा इस बात से संतुष्ट थे कि मुझे घर जैसा ही भोजन उपलब्ध रहेगा, खैर यह उनका और मेरा भ्रम मात्र था जो शने- शने समय के साथ समझ में आने लगा ।

एजेंट ने मकान मालिक व मेस इंचार्ज को एडवांस दिलवा कर और स्वयं का सेवा शुल्क लेकर हमसे विदा ली ।

पापा ने रूम में स्वयं से कइयों बार झाड़ू पोछा और दीवारों पंखों की धूल झाड़ी शायद वो स्वयं को यह सुनिश्चित कर देना चाहते थे कि अब जब तक वो पुनः मिलने नहीं आये तब तक रूम साफ सुथरा ही बना रहे । सभी आवश्यक सामग्री बेड, कुर्सी टेबल, किताबें, कपड़े आदि करीने से सुव्यस्थित कर हम समय सारणी के अनुसार कोचिंग पहुँच चुके थे जहाँ एक बहुत ही बेहतरीन, रोंगटे खड़े कर देने वाला, मनोमस्तिष्क में सिर्फ पढ़ाई और लक्ष्य को हासिल कर देने वाले भाव भर देने वाला सेमिनार हमने अटेंड किया । पापा और मेरा यह दृढ़ विश्वास बन चुका था कि हाँ अब मैं निश्चय ही निकट भविष्य में आईआईटीयन बनने ही वाला हूँ । खैर मेरी काबिलियत और लगन पर पापा को कभी लेश मात्र भी संकोच रहा नहीं या यों कहें कि मैंने अभी तक असफलता का कड़वा स्वाद चखा भी नहीं था ।

पापा मेरी आवश्यकताओं की सम्पूर्ण व्यवस्था कर स्वयं से पूर्ण आश्वस्त होने के बाद सन्ध्या समय मोपेड एम80 से गाँव लौटने की तैयारी करने लगे थे । चूंकि गाँव कोटा से लगभग 100 किलोमीटर का सफर था तो वैसे भी उन्हें पहुँचते-पहुँचते रात्रि हो ही जाना था । सुबह से दाखिल, रूम मेस का चयन, सेमिनार अटेंड करने की व्यस्तताओं ने यह सोचने का समय ही नहीं दिया कि पापा अब पुनः लौट भी जायेंगे और मुझे एकल ही कल से यह कोचिंग जीवन का सफर भी तय करना है । नई जगह पर हम पुनः उतने ही मासूम हो जाते हैं जैसे जीवन परीक्षाकक्ष का पहला दिन ही हो ।

वैसे तो बचपन आवासीय नवोदय स्कूल में परिवार से दूर गुजरा परन्तु विगत 7 वर्षों में नवोदय अपने मे ही एक परिवार बन चुका होता है जो पापा मम्मी भाई बहन की कमी नहीं खलने देता और बारहवी तक आते-आते वहाँ पर हम सीनियर मोस्ट की पदवी से भी सुशोभित हो चुके होते हैं जिससे स्वयं में ही जूनियर्स के लिए अभिभावक भाव अनुभूत होने लगता है । परन्तु अब अनजान कोटा की यह अनजानी गलियाँ, महज घर के रसोई के आकार का आकृतिनुमा यह रूम, कोचिंग में छात्रों की भीड़ परन्तु भीड़ में भी स्वयं को अकेला पाने का अहसास क्योंकि अभी किसी से कोई परिचय नहीं था ।

ऐसा लग रहा था कि मनोमस्तिष्क में महाभारत का युध्द अपने चरम पर था और मैं स्वयं को उस सैनिक की भांति महसूस कर रहा था जो अपनी सेना से कहीं दूर भटक कर विपक्षी खेमे में त्रुटिवश पहुँच चुका था । इसमें पुनः पापा के घर लौट जाने की तैयारी ने मन मे ऐसे भाव जगा दिए कि अब वो सैनिक निहत्था भी हो चुका है, जिसका कत्लेआम विपक्षी खेमे के रहमोकरम से निर्धारित होगा।

मन वाकई अत्यंत ही चलगामी होता है, आज एक ही दिन में कई भावों ने आकर तत्क्षण दस्तक दी और अगले ही पल नए भाव प्रवेश कर गए । अब पापा के जाने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी उन्होंने हमेशा की तरह मुझे तमाम सावधानियों से, भोजन सही समय पर करने, स्वास्थ्य का ध्यान रखने, एसटीडी फोन से प्रतिदिन बात करने आदि आदि से पुनः जांचबिन्दुओं से पुनरावर्त्ति करवा दी । क्योंकि इस बिछोह के समय में चुप्पी खतरनाक साबित हो सकती थी । उनकी सावधानियों की फेहरिस्त में कभी भी मन लगाकर पढ़ाई करने का दिशा निर्देश शामिल नहीं होता था क्योंकि वो अपने बेटे पर सीमा से परे विश्वास रखते थे ।

मेरा मन भावुक हो चुका था । पापा अपनी आँखों की झिलमिलाई आँसुओं की परत को साफ करने के लिए बाथरूम में मुँह धोने के लिए प्रवेश कर चुके थे । मेरे लिए भी यही समय था जब मैं मन को हल्का करने और पापा को अहसास भी ना होने देने की द्विशर्त पूरी कर सकता था । एक जोर की रुलावट ने सफेद सूखे साफ रुमाल को गीला कर दिया । पापा लगभग 2 मिनट में जब तक बाहर आये तब तक मैं भी पुनः सम्भल चुका था उन्हें विदाई देने के लिए ।

हाँ ....अब मैं तैयार हो चुका था अपना युध्द स्वयं से लड़ने के लिए ।

पापा सीढ़ियों से नीचे उतरे । पुनः एक बार गले से लगाया पर अब हाथ साथ नहीं दे रहे थे ना उनके ना मेरे । हमेशा की तरह उन्होंने अपनी पॉकेट में रखे रुपयों में से अधिकांश निकाल कर मेरी शर्ट की ऊपर वाली पॉकेट में रख दिये । हाँ...मैंने कभी इसका प्रतिकार भी नहीं किया क्योंकि यह मेरे लिए आशीर्वाद स्वरूप होता था और उनके लिए संतुष्टि कारक । (वैसे आवश्यक धनराशि पहले से ही दी चुकी होती थी )

पापा ने एम80 को किक दिया, मोपेड स्टार्ट हो चुकी थी । जड़वत शरीर से मैं उनके पैरों में आशीर्वाद हेतु झुक चुका था । उनका सर पर वो हाथ फेरना आज भी स्वयं को सुरक्षित महसूस कराता है । धीरे धीरे गालों पर बहती आँसुओं की अनुशासित धारा के मध्य उन्होंने मोपेड को आगे बढ़ा दिया और मैं यथावत यंत्रवत निस्तब्ध खड़ा भबुक मन से बोझिल हाथों को हिलाने में भी स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा था ।


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