किशोरी भक्त अब्दुल
किशोरी भक्त अब्दुल
राधा रानी के मंदिर के पुराने शहनाई वादक स्वर्ग सिधार गए थे ,इस कारण वहां कुछ दिनों से शहनाई की धुन नही सुनाई पड़ रही थी जो शहनाई वादक इन्हे चाहिए था वह मिल ही नही पा रहा था,। मंदिर के पुजारी गोस्वामी जी भी परेशान थे तभी उन्हे याद आई अब्दुल की ।
अब्दुल खानदानी शहनाई वादक था... ।
उसके शहनाई वादन की चर्चा दूर-दूर तक थी... बजाता भी तो बहुत अच्छा था... और हृदय से बजाता था ।
गोस्वामी जी ने एक बार जाकर अब्दुल से कहा था... वैसे गोसाईं जी और अब्दुल बरसाने में साथ-साथ बचपन में खेले और पढ़े थे ।
लेकिन अब स्थिति बदल गई थी , अलग ही बात हो गयी... गोसाईं जी… मन्दिर के प्रमुख थे... पर अब्दुल गरीब और उसके बाद मुसलमान भी था । उस दौर में उसके हाथ का तो पानी पीना भी अपने धर्म को भ्रष्ट करना ही था ।
गोसाईं जी ने विनती की थी... "आज से अब्दुल भाई ! आप राधारानी मन्दिर में शहनाई बजाओगे ।"
अब्दुल ख़ुशी से झूम उठा था... अपनी बीबी को भी खुश होकर बताया था अब्दुल ने.." देखा ! अब मैं श्री किशोरी जी के महल में शहनाई बजाऊंगा ।"
उसकी बीवी ने आश्चर्य से देखा था एक मुसलमान मंदिर में शहनाई वादन करेगा?
अब्दुल तो अपनी रौ में कहता है, "कितना अच्छा होगा ना !...कि इसी करम के चलते हमारी कोई सन्तान हो जाए... उस ऊपर वाले ने हमें सन्तान ही नही दिए ।"
उसकी बीवी ने उसे हैरत से देखा था,!
अब्दुल ने कहा "अरे ! देखना अब किशोरी जी हमारी भी सुनेंगी । "
आप सबको क्या लगता है .ये मुसलमान लोग अरब से आये हैं ! नही हमारे बृज में तो जो गूजर थे ... उन सब का ही धर्म परिवर्तन करके या कहें जबरदस्ती डरा धमकाकर मुसलमान बनाये गये है ।
रोज मन्दिर में जाना... और रात्रि के शयन भोग के समय शहनाई बजाकर श्री किशोरी जी को सुलाना।… ऐसी दिव्य सेवा क्या किशोरी जी की इच्छा के बिना किसी को मिल सकती है !
एक दिन वह खुशखबरी भी अब्दुल की बीवी ने दे ही दी ।
धाय ने आकर कहा ," सुनो अब्दुल मिया बेटी हुई है...।"
अब्दुल खुश होकर उदगार निकालता है " ओह ! ऊपर वाले ने सुन ली हमारी !"
पत्नी ने पूछा " नाम क्या रखेंगे ?"
अब्दुल के मुखार बिंदु से निकला ""किशोरी" !
बीवी आश्चर्य से देख बोली "पर ये नाम मुसलमान का नही है... ।"
अब्दुल बोला "किशोरी सबकी हैं...
वो समस्त चराचर की हैं... सबके प्रति उनका वात्सल्य झरता रहता है... ।" अश्रु गिराते हुये अब्दुल बोल गया था ।
अब्दुल बेटी को मन्दिर लाया... और तुलसी की माला गोसाई जी के हाथों पहनवाई... गोसाई जी पूछे "नाम ! "
उसने कहा "किशोरी" ।
धीरे धीरे 3 वर्ष की बेटी हो गई... अब्दुल शहनाई बजाता था... और उसके साथ शहनाई की धुन पर वो किशोरी मन्दिर में ठुमुक-ठुमुक नाचती थी… नाचती भी इतना सुंदर कि देखने वाले बस मन्त्र मुग्ध होकर देखते रहते ।
किशोरी सुंदर इतनी थी कि 14 वर्ष की उम्र में रिश्ते आने शुरू हो गये ।
पर अपने बाबा के साथ मन्दिर जाना... बाबा की शहनाई में नाचना... और मन्दिर का ही भोग
लेकर अपने बाबा अब्दुल का हाथ पकड़ कर घर ले आना यह रोज का नियम था,।
प्रसाद पाते हुये अब्दुल से उसकी बीबी ने कहा " यहां से दूर एक गांव डींग से रिश्ता आया है किशोरी के लिए... "
अब्दुल चौंक गया *" क्या?
बीवी बोली "अपनी बेटी को कुँवारी रखोगे क्या ?"
उस समय कुछ नही बोला था अब्दुल ।
बात चली… लड़के वालों के मना करने का प्रश्न ही नही था...वह तो पहले से ही तैयार थे , किशोरी सुन्दरी ही इतनी थी ।
निकाह में गोसाईं जी ने ख़ूब पैसे से मदद की... अन्य बरसाने के लोगों ने भी ख़ूब उत्साह दिखाया… विदा हो गयी किशोरी ।
अब्दुल आज बिना किशोरी के बजाने गया था मन्दिर में… राधा रानी के सामने नित्य की तरह... पर आज किशोरी नही थी... नाचती थी... और वो बजाता था ।
पर…
आज वो किशोरी जी के मन्दिर में शहनाई बजा ही नही पाया था... वो बार-बार अपने आँसू पोंछता… फिर हाथ में शहनाई लेकर बजाने की कोशिश करता... पर नही... ।
"गोसाईं जी क्षमा करो… आज नही बजा पाऊँगा ।"
बरसाने राधारानी मन्दिर के गोसाईं जी भी जानते हैं… कि ये आज बजा ही नही पायेगा... इसलिए अब्दुल को प्रसादी माला और मन्दिर में बना श्री किशोरी जी का निज प्रसाद... और इत्र लेकर वह चला था... ।
अब्दुल जान गया की उस से अब कभी शहनाई नही बज पाएगी।
अब्दुल ये कहते हुये वो गहवर वन के एक झुरमुट में बैठ गया... और जोर से चिल्ला पड़ा "मेरी किशोरी" मेरी किशोरी,!
पशु पक्षियों ने सुनी थी... उस पुकार के साथ हृदय से निकली , आह !
हिचकी लेते हुए रो पड़ा था अब्दुल ।
गहवर वन में बैठ कर रोये जा रहा था ।उसकी रट एक ही थी... मेरी किशोरी... तेरा बाबा अकेला हो गया है... आजा ना !
तभी किसी ने कहा ,"बाबा ! "
पीछे से किसी ने अब्दुल को छूआ ।
"कौन ?" अब्दुल ने पीछे मुड़कर देखा तो उसकी बेटी किशोरी ।
अब्दुल खुश होकर बोला ," ओह ! किशोरी ! कैसी है तू ? "
वह बोली,*"अच्छी नही हूँ बाबा... तुम्हारी याद आती है...!बाबा ! बजाओ ना... शहनाई... बहुत दिन हो गये हैं... तुम्हारी शहनाई में नाची नही हूँ… न सुनी है... बाबा ! "
अब्दुल बोला *"हाँ... अपनी बेटी को नही सुनाऊंगा तो किसे सुनाऊंगा , चल सुन...! "
उसकी शहनाई बज उठी... आँखों से अश्रु बहते रहे अब्दुल के... और किशोरी नाचती रहीं ।
कब तक नाचीं अब्दुल को भी कहाँ पता चला ।वह तो देहातीत हो ही चुका था ।
सुबह अब्दुल उठा... उसे तो ऐसा लग रहा था कि जैसे रात को कोई स्वप्न देखा है... जब गहवर वन से वापस जाने लगा... तो उसने देखा... पायल गिर गयी है किसी की !
वह विचार करने लगा *"ये पायल ? रात में मैंने जो देखा था... वो सपना था या सच !
यही पायल तो पहनी थी मेरी किशोरी... और नाची, ख़ूब नाची थी ।
अब्दुल दौड़े-दौड़े मन्दिर में गये...
गोसाईं जी ने पूछा "अब्दुल क्या हुआ ?"
अब्दुल हड़बड़ी में पूछा "राधा रानी की पायल है या नही ?"
गोसाईं जी ने उसे देख कहा... "बात क्या है अब्दुल ? "
अब्दुल ने कहा "पहले बताओ ना गोसाई जी ? श्री राधा जी के विग्रह में पायल है या नही !"
गोसाईं जी गये... लौट के आये...और कहा "अब्दुल ! नही है।"
अब्दुल ने अपने हाथो में लिए पायल को दिखाया "ये है क्या ?"
गोसाई आश्चर्य से देखा और कहा "हाँ... यही है।"
अब्दुल पायल लेकर दौड़ा...और गहवर में उसी जगह पर गया...जहां रात में शहनाई बजाई थी और शहनाई बजाने लगा... बजाते-बजाते... वहीं उसने शरीर छोड़ दिया...! यह कहते हुए "मेरी किशोरी"... यही अंतिम शब्द थे उस अब्दुल के ।
यह था अब्दुल किशोरी जी का परम भक्त अब्दुल ,जिसकी समाधि आज भी बरसाना के गहवर में है ।
