STORYMIRROR

OJASWINI YADAV

Tragedy Inspirational

4.0  

OJASWINI YADAV

Tragedy Inspirational

ख्यालों का पिंजरा

ख्यालों का पिंजरा

4 mins
3

 शायद आज के दौर में तो हम सब ही ज्यादा सोच लेते हैं, वो भी जो नहीं हुआ है। मैं भी शुरू से ही ज्यादा सोचती थी मगर,मैं तब आठवीं कक्षा में थी, जब मुझे यह अधिक सोचने की आदत ने एक अँधेरे कमरे में बंद कर दिए था जहा सिर्फ मैं और मेरे दिमाग मे सिर्फ खुद को लेके शंका होती थी। कही उनको मेरी बात का, मेरी हरकतों का बुरा न लग जाये, कही मुझसे कोई गलती न हो जाये, कही मैं  अजीब तो नहीं लग रही हूँ... यह सब मुझे इतना सताने लगा था की मैं खुद को नापसंद करने लगी थी और तब ही मुझे साफ़- सफ़ाई से जुड़े ऐसे ख्याल भी आने लगे और उन सवालों का जब बस मन में किसी को न बताई जा सके ऐसी बेचैनी होती थी।  में केवल रोती रहती थी।  किसी को न कुछ बता पाई न खुद समझ पाई... अंत में मुझे मनोरोग चिकित्सक को दिखने पे उन्होंने मुझे ओ.सी.डी और एंग्जायटी की दवाइयां देना शुरू कर दिए जो अब तक चल रही हैं।  मेरा आत्मविश्वास बिक्लुल पानी में मिल चूका था और में खुद को अपने परिवार पैर बोझ समझने लगी थी मेरी मनोरोग चिकित्सक न केवल मुझे दवाई दी बल्कि हौसला और उम्मीद भी दी।  इस दौरान मेरे परिवार और परम सखी ने भी मेरा खूब साथ दिए और मुझे हौसला दिया, मेरी मदद करि,मेरी बातें सुनी और मुझे समझा परंतु सबका मेरे प्रति इतना प्यार मुझे और कमज़ोर कर रहा था।  में अंदर से खोखली हो चुकी थी पर मैंने यह सोच कर खुद को संभाला की मैंने जब कुछ जान कर गलत नहीं करा तो किसी को मेरी बात का बुरा लगे या अच्छ क्या फ़र्क़ पड़ता है।  मुझे यदि कोई गलती हो भी गयी तो क्या मैंने उसको सुधरूंगी, उससे सीखूंगी और रही बात ओ.स.डी. की तो मुझे मेरे माता और खासकर पिता जी ने बहुत समझाया की जीवन में कुछ न कुछ तो पीछे छूटता ही है और तुमसे यदि कोई चीज़ छूट गयी या ख़राब भी हो गयी तो क्या ? जीवन तो ख़तम नहीं होता न ऐसे। अभी तुमको बहुत कुछ करना है जीवन के कई पन्नो में रंगों को भरना है अभी हार मैंने का समय बभी नहीं है तुम्हारे पास और तब मैंने खुद को जाना, खुद को पहचाना, तब मैंने कविताओं के शब्दों में अपने दिल की घबराहट को उतारा!

 मैंने देखा की लोग मुझसे भी ज़ादा परेशान हो क्र भी लड़ रहे हैं  परिस्थितिओं से और अपने ख्यालों से और शायद अपनों से भी। हाँ , सबके पास अपनी बात समझने के लिए, सुनने वाला नहीं होता फिर भी वो जी रहे हैं तो मैं क्यों नहीं और अगर मैं जी सकती हु तो तुम क्यों नहीं बस यही सब सोच कर खुद को संभाला हर दिन, हर क्षण कठिन लगा मांगा समय गुज़र गया और अब सब ठीक है। आज बिल्कु ठीक हूँ परीक्षा में अचे अंक लती हूँ कवितायेँ, कहानी लिखती हहूँ हस्ती हूँ खेलती हूँ और सबको हसाती भी हूँ और तुम भी कर सकते हो। जानती हूँ अभी ये सुनकर ऐसा लगेगा की नामुमकिन है मगर ये मुमकिन है ज़रूर है पर सिर्फ अगर तुम चाहो तो।  में खुद को समझाया जितना हम सोच लेते हैं की हमें कोई बुरा समझेगा,पीठ-पीछे बुराई करेगा,दुखी होगा,मज़ाक बनाएगा या हम अजीब लगेंगे सबको असल में उतना कोई ध्यान भी नहीं देता।  तुम खुद दिन भर में कितने लोगों से मिलते हो क्या सबके बारे में इत्तना सोचते ह? नहीं ना...

फ़िर लोगो का तो काम ही है कहना, लोग क्या सोचेंगे यह भी तुम खुद सोच लोगे तो लोग करेंगे।  तुम्हारे पास जो ह उसके लिए भी बहुत लोग तैरते होंगे या कभी तरसे होंगे उसका शुक्र करो और दूसरों में ख़ुशी बाँटो उनकी दुख में साथी बनो मगर उनके तानो का शिकार नहीं और न तानो के बारे में सोचो ! 

आज मैं भी  दूसरों को जो मेरे जैसी स्तिथि में फसे हैं उनको सराहा देने की, उनको हौसला देनी की कोशिश करतीहूँ बिलकुल वइसे ही जैसे ज़रुरत के समय मेरे घर और बहार के लोगों ने दिया था जब मुझे उनकी सबसे ज्यादा ज़रुरत थी और मई यह भी जानती हु की सबको मदद नहीं मिलती इसीलिए मैं उनका सहारा बनने की पूरी कोशिश करती हु और करती रहूंगी। 

अतः मैं यही कहूँगी की मैंने अपने जीवन सीखा की हमारी तकलीफ वाक़ई मैं उतनी बड़ी नहीं होती जितनी उस समय लगती है, यकीन मनो अगर अच्छ समय गुज़र गया तो बुरा भी गुज़रेगए दिन के बाडी रात आती है मगर दिन लौटता है उस रात के समय रोने की नहीं दूसरों की मोमबत्ती या दिया बनो।  सूरज हो अगर तो चाँद की चांदनी बनो हार मत मनो क्युकी तुमसे भी ज्यादा परेशां कोई है जिसको तुम्हारी ज़रुरत है। 


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Tragedy