तंत्र की किताब
तंत्र की किताब
वैष्णवी की आँख खुली और उसने अपनी माँ को अपने बगल में पाया। ये देख उसे लगा जैसे कोई जादू ही हो गया। इतने में उसने आवाज़ सुनी - "माँ, मैं ईशा के घर जा रही हूँ।" उसने देखा कि ये वही दिन है और सब कुछ वैसे ही हो रहा है जैसे उसकी माँ की मृत्यु वाले दिन हुआ था। वो निकल रही थी। उसने देखा कि उसके जाने के बाद उसके चाचा और चाची, जो कि उसके पिताजी की धन, दौलत और विद्या से बहुत जलते थे, वो घर आए और उन्होंने ना क्या किया वो यह जान पति उस से पहले ही उसकी आँख खुल गई और वो असल दुनिया में वापस लौट आई।
वैष्णवी अपनी माँ की तस्वीर को अक्सर गले से लगाकर रोया करती थी और कहती थी - "माँ देखना, तुम्हारी बेटी एक दिन तुमहे बहुत गर्व महसूस कराएगी। इतने में जोए से चिल्लाने की आवाज़ आयी वैष्णवी... काम पे नहीं जाना। हम तुम्हे मुफ्त की रोटियां नहीं देते खाना चाहिए तो काम पे जाना होगा उसके चाचा जी ने कहा। वैष्णवी काम पे चली तो गयी मगर पूरा दिन वैष्णवी उसी सपने की सोच में डूबी हुई थी कि क्या ये सपना था या कुछ और। और तभी अचानक काम करते-करते उसने फिर से अपने आप को उसी समय में पाया। अब उसकी माँ की मृत्यु हो चुकी थी और उसको दिख रहा था कि सब उसी दिन की तरह उसकी माँ को ले जा रहे हैं देहसंस्कार के लिए। वो ये देखकर खुद हैरान थी और समझ नहीं पा रही थी हो क्या रहा है। तभी उसे आवाज़ आई बेटा वैषणवी...उसने देखा उसके पिता उसके पीछे खड़े हैं और बोल रहे हैं - "वैष्णवी, ये सपना नहीं। उठो। देखो क्या हुआ तुम्हें। सच्चाई की तह तक पहुँचना है, उठो।"
२० वर्ष पहले वैष्णवी के पिता एक बहुत ही घनी और विद्वान व्यक्ति थे। जब तक वे थे,तब तक वैष्णवी और उसकी माता सुधा की स्थिति बहुत थी पर उनके जाने के बाद उनका जीवन उथल-पुथल हो गया था। वैष्णवी के पिता तंत्र विद्या और समय म आगे या पीछे जाने के रहस्य को जानना चाहते थे। वे तंत्र विद्या पे किताबे लिखा करते थे। एक दिन रुद्रशंकर जी रात में अचानक चिल्लाये "वो आ गए... वो आ गए! वैष्णवी, सुधा अपना ध्यान रखना। नहीं उन्हें छोड़ दो, छोड़ दो उन्हें। ऐसा कहकर चिल्लाते-चिल्लाते बिना कुछ कहे बगीचे में चले गए और एकदम से सबकी आँखों से ओझल हो गए।
उस रात
वैषणवी अपने मात और पिता दोनों की ही मृत्यु का पता लगाने की और समय में पीछे जाने की कोशिश करती रहती है। उसकी आँखों मैं माता और पिता से मिलने की छह की चमक साफ़ दिखती है। अगले दिन वैष्णवी ने पिता जी की कताब में पढ़े हुए तरीके से समय में पीछे जाने की कोशिश करी। रुद्रशंक की किताब म लिखा था की समय छठा तत्व है जिसेपर नियंत्रण पाने के लिए अन्य पांच तत्वों को मन होगा और रक्त की आहुति देनी होगी। वैष्णवी ने नमक का घेरा बना कर कुछ मन्त्रों के उच्चारण और जल, वायु, कुछ पत्थर और मिटटी को अग्नि म दाल थोड़ा सा अपना खून ऊँगली से काट कर दाल दिया और वो अपने पिता के गायब होने के समय म पहुंच गयी और उसको पता चला की उसके पिता गायब नहीं हुए थी यद्यपि समय चक्र में से कोई आ कर उनको ले गया था और अब वो भी समय के उसी चक्र म फास चुकी थी। उसकी रात वैषणवी की चाची और चाचा की रहसयमई तरीके से मौत हो गयी।उस रात के बाद वैष्णवी का नाम सब भूल गए। पुलिस की फाइल में "लापता" लिख दिया गया। पर आज भी जब बारिश होती है, उस पुराने बगीचे से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आती है। और जिस भी हाथ में उसकी तंत्र की किताब आती है... उसके पन्ने अपने आप खुल जाते हैं। उसी पन्ने पर जिसमें लिखा है - _"समय को नहीं बदला जा सकता। सिर्फ उसमें खोया जा सकता है।"_ उस पन्ने पर हमेशा 4 निशान होते हैं - _नींबू। चीनी। नमक। काली मिर्च।_
कहते हैं वैष्णवी अब भी ढूंढ रही है... ना माँ को, ना पिता को... खुद को।

