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Nirupama Roy

Drama


4.2  

Nirupama Roy

Drama


जिंदगी के भंवर में

जिंदगी के भंवर में

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प्रिय समीर

शुभाशीष!

सुमन से मिलकर अभी ही लौटी हूं ,तुम्हारा आग्रह टाल नहीं सकी।पर जिस सुमन से मिलकर पहले जीवन के स्पंदन से भर उठती थी ,आज उससे मिलकर दुख के अगाध सागर में डूब सी गई।लगा एक साहसी और उन्नति शील लड़की जिसने हमेशा अपनी शर्तों पर जीवन जीने की ठानी थी आज अपने ही चुने पिंजरे में कैद होकर कसमसा रही है। हां ! तुमने ठीक सुना था उम्र के इस पड़ाव पर अपने से 20 वर्ष बड़े व्यक्ति से उसने सचमुच विवाह कर लिया है। कारण जानते हो ? नहीं ना.. बस उसे ही मूर्ख ..सनकी ..मतलबी ..और न जाने क्या क्या कहा था तुमने। तुम ही ने कहा था ना ,सुमन ने उस व्यक्ति के वैभव से विवाह किया होगा।उसका भव्य बंगला और होंडा सिटी गाड़ी उसे भा गई होगी ,पर ऐसा कुछ नहीं है वह तो एक ऐसे भंवर में फंस गई है जहां से निकलने का प्रयास उसे कई विडंबनाओं से साक्षात्कार करने पर विवश कर देगा। समीर तुम तो सुमन से प्रेम करते थे ना ?...फिर ऐसी एकांगी सोच क्यों ? क्या हर विपरीत परिस्थिति के लिए स्त्री ही दोषी होती है? तुम यही सोच रहे हो ना तुम से विवाह करने से इनकार करने वाली और आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लेने वाली सुमन ने ऐसा क्यों किया ? कभी-कभी इंसान ना चाहते हुए भी ऐसा बहुत कुछ कर जाता है जो उसके जीवन का मर्म ही पलट कर रख देता है।सुमन से मैं भी बहुत प्यार करती हूं भैया ! आज मुझे सामने पाकर उसकी संचित पीड़ा का बांध टूट सा गया... मैं मौन रह गई सांत्वना के शब्द आत्मा में ही दफन हो गए.. एक शहर में रहते हुए भी मैं उससे 10 साल बाद मिल रही थी। तुम्हारी शादी में ही मिली थी फिर सब अपने आप में व्यस्त हो गए थे। और फिर अचानक उसकी शादी की सूचना ....सोचा मिलकर आशीष दे दूं पर जा नहीं सकी। मैं उसके विवाह को भी एक आम विवाह जो समझ रही थी। तुम्हारे कहने पर आज नहीं जाती तो स्त्री पीड़ा का एक दुखद अध्याय कैसे खुलता ..एक कटु सत्य पिघल कर कैसे बहता...!

" दीदी आप!" सुमन ने आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी से मुझे गले लगा लिया था।

"झूठा प्यार मत कर सुमन ,इतना ही प्यार था तो तेरी शादी की खबर मुझे किसी और से क्यों मिली?"

"दीदी सब कुछ इतना अचानक हुआ कि ....!" न जाने क्यों वह असहज सी लगने लगी थी।

"तू खुश तो है ना ?"

"नहीं!"

उसने दो टूक जवाब दिया तो मैंने स्नेह से उसका हाथ पकड़कर पूछा," फिर शादी क्यों की?"

"मां की इच्छा का पालन किया ..वह चाहती थी मेरा भी घर बस जाए ..वह बहुत बीमार रहने लगी है ..जब तक पापा थे ,सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। उनके जाने के बाद में एक स्कूल में पढ़ाने लगी ,ट्यूशन करने लगी ..किसी तरह दोनों भाइयों को पढ़ाया फिर वही हुआ जो होता है दोनों अच्छी नौकरी पा गए विवाह किया और पत्नियों के साथ अलग-अलग घर बसा लिया मैं और मां सूने न घर में नितांत एक आधी रह गए मां बार-बार शादी के लिए लड़के देखते मैं खूब झगड़ते डालती जाती नहीं नहीं करनी है मुझे शादी 35 वर्ष गुजार चुकी हूं आगे भी हम दोनों मां बेटी गुजार लेंगे।

मां कहती, बेटा मेरे बाद कैसे रहेगी ? तेरे भाई मेरे रहने पर तुझे नहीं पूछते तो बाद में क्या पूछेंगे।

"मत पूछें ! मैं कह तो देती , पर मां के बाद अपने एकाकी प्रयोजन हीन नीरस जीवन की कल्पना मुझे भी सिहराने लगी थी।

मैं चुपचाप सुन रही थी वह चाय बनाने अंदर गई तो मैं ध्यान से उसका घर देखने लगी। भव्य बड़े से बंगले में संपूर्ण वैभव विद्यमान था ..शायद सुमन बेहद आरामदायक शांत और संतुष्ट जीवन जी रही है ,मैं सोच रही थी ..और मेरे मन में उसका कहा एक शब्द भी चुभ रहा था , "नहीं!"

"दीदी चाय लीजिए।" उसने चाय का कप देते हुए कहा तो मैं वर्तमान में लौटीक्ष।

"घर तो बड़ा सुंदर है सुमन.. तुम्हारे पति कैसे हैं ..पहली पत्नी को गुजरे कितना समय हुआ.. बच्चे कितने हैं उनके? मैंने एक साथ कई प्रश्न कर डाले।

"तीन साल हुआ है उन्हें गुजरे। एक बेटा है जो पत्नी के साथ कनाडा में रहता है!"

" क्या ? मैं तो सोच रही थी छोटे-छोटे बच्चों के लिए दूसरी शादी की होगी.. बहू भी है और इस उम्र में दूसरा विवाह ?"

"हां ! यही कटु सत्य है।उन्होंने सिर्फ घर का बना खाना खाने के लिए ,घर व्यवस्थित करने के लिए और कभी-कभार अपनी शारीरिक जरूरतें पूरी करने के लिए मुझ से शादी की है ...यह मैं नहीं, वह कहते हैं। प्रतिदिन इसी अहसास के साथ मेरी सुबह होती है कि मैं इस बड़े से बंगले में केयरटेकर हूं किसी की पत्नी नही..!"

"मतलब..?"

वह फूट-फूट कर रो पड़ी '"जानती हैं दीदी! कल उन्होंने मुझसे कहा कि मैं 15 दिनों के लिए मां के पास चली जाऊं..क्योंकि एक हफ्ते बाद उनका बेटा कनाडा से घर आ रहा है और ...और वह मेरी सूरत भी देखना नहीं चाहता। मैं सन्न रह गई आखिरकार मैं उनकी विवाहिता पत्नी हूं..पूरे समाज के सामने उन्होंने मेरा साथ देने का वचन दिया है।सिंदूर भरा है मेरी मांग में ...यह क्या अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं ? मैं जोर से चीख पड़ी थी।

यह प्रलाप नहीं सच है मेरा बेटा तुमसे मिलना नहीं चाहता और मैं नहीं चाहता कि वह अपने पिता के घर से दुखी होकर लौटे, मेरे पति ने सपाट स्वर में कहा तो मैं संज्ञाशून्य सी खड़ी रह गई।आत्मा में जैसे बहुत कुछ टूट कर चुभने लगा था।मैंने पूछा ,मेरी क्या हैसियत है आपकी जिंदगी में जरा यह भी तो समझा दीजिए?

"ठीक है ! तुम मेरी पत्नी हो मैं जीवन भर रोटी कपड़ा और छत तो दूंगा ही ..तुम्हें रोड पर तो नहीं छोड़ रहा ना ?रवि को अपनी मां से बहुत लगाव था वह उसे कभी भूल नहीं पाएगा और ना ही किसी दूसरी औरत को मां का दर्जा दे सकेगा मैं अच्छी तरह जानता हूं।"

"पर सच्चाई तो यही है ना कि अब मैं ही उसकी मां हूं ..उसे घर आने तो दीजिए मैं इतना स्नेह और अपनापन दूंगी कि वह मुझे मां ही समझ कर वापस लौटेगा.. मैंने मन की सभी आशाओं को समेटकर पति से विनती की। पर जानती हो दीदी, उनका स्पष्ट उत्तर था ऐसा कभी नहीं होगा वह तुमसे नफरत करता है।

नफरत ? ऐसा क्या किया है मैंने..? मैं अवाक रह गई थी।उन्होंने कहा ,उसे लगता है कि तुमने मुझसे नहीं, मेरी संपत्ति से विवाह किया है।

"पर यह तो सच नहीं है ,आप जानते हैं।"

"पर वह यही मानता है"

"लेकिन' आप उसे सच बता तो सकते हैं ना?"

"मैं किसी की सोच नहीं बदल सकता ...मेरे पति ने कहा तो मैं जड़ हो गई दीदी ...सच कहूं तो, इस विवाह से मुझे केवल दर्द मिला है और कुछ नहीं।

वह बताती गई रोती गई। मैं चुपचाप सुनती रही ऐक चलचित्र सा सामने चलता चला जा रहा था......

मां के लाख समझाने से और भाइयों के कहने पर सुमन जब सिविल इंजीनियर सुबोध से मिली तो उसके कुंवारे मन में भी अभिलाषा के अंकुर फूटने लगे थे।

सच कहती हैं मां अकेलापन भविष्य में मेरे जीवन को दंश से भर देगा और सुबोध मुझे एक सुदृढ़ भविष्य दे सकते हैं। एक छोटा बेटा है उसे इतना प्यार दूंगी की मां की कमी महसूस ही नहीं होगी। पर इंसान का अपना सोचा कब होता है नियति के पत्तों पर तो दुनिया चलती है और नियति ने जब पहला पत्ता फेंका तो सुमन के पांव तले की जमीन ही खिसक गई।

एक सादे समारोह में विवाह संपन्न हुआ। सुमन घर पहुंची तो ड्राइंग रूम में सजी खूबसूरत फ्रेम में जड़ी एक युवक की तस्वीर देखकर उसने पूछा, यह कौन है ?और उत्तर सुनकर सन्न रह गयी , फिर तेज शब्दों से कहा ,पर आपने तो कहा था आपका बेटा छोटा सा है।

"यह कितना भी बड़ा हो जाए मेरे लिए तो बच्चा ही रहेगा ना ....वैसे मेरी बहू भी बहुत सुंदर है ..जल्द ही दादा बनूंगा मैं ..!" उसका पति बताता जा रहा था और वह अपनी किस्मत की विद्रूपता पर दंग थी। स्त्री का सहज गुण है , समझौता ..सुमन ने भी वही किया , सोचा अपनेप्रेम से सहनशीलता से वह अपना घर सहेज लेगी पर यहां भी एक दुष्कर सत्य मुंह बाए खड़ा था। सुमन का यह प्रथम विवाह था उसके अरमान उड़ान पर थे।जीवन का हर सुख मुट्ठी में सहेजने की इच्छा लिए वह आशा भरी स्निग्ध दृष्टि से जीवन को निहार रही थी और सुबोध 30 वर्ष का संपूर्ण वैवाहिक जीवन जीकर निर्लिप्त सा हो गया था। सुमन के समर्पण में जहां सौहार्द मनोहर अनुराग समर्पण और मादकता थी वही सुबोध की मनोगत प्रेमिल संवेदनाएं जड सी हो गई थी। दांपत्य के अंतरंग क्षणों में जब सुमन की भावनाएं आनंद के अतिरेक में मग्न होकर संपूर्ण नारीत्व की अनुभूति करना चाहतीं,.... सुबोध का ठंडा उष्मा रहित स्पर्श जो प्रेम का नहीं केवल कर्तव्य का बोध कराता था ,उसे भी बिरत सा बना डालता था। ऊपर से सुबोध का एहसास दिलाना कि उसने पत्नी सुख के लिए नहीं बल्कि घर व्यवस्थित करने के लिए विवाह किया है सुमन के रहे सहे विश्वास को भी लीलता जा रहा था।

कुछ ही दिनों में वह जान गई थी कि यह विशाल बंगला जिसकी साज संभाल करते-करते वह सुबह से देर रात तक हलकान हो जाती है ,उसके सौतेले बेटे के नाम पर है। चलो कोई बात नहीं सुबोध ने उसके बारे में भी तो जरूर कुछ सोचा होगा ,वह मन को बहलाती रहती।

धीरे-धीरे मात्र 1 वर्ष में वह अच्छी तरह समझ गई कि उसकी दशा पिंजरे में बंद पक्षी की तरह है जिसे ना तो मनपसंद आहार मिलता है और ना उन्मुक्त गगन में उड़ान का मौका ही।प्राय: वह सोच के गहरे सागर में उतर जाती, तब उसे याद आता समीर ....उसका पहला प्यार ...बचपन से एक साथ खेलते -झगड़ते बड़े हुए थे दोनों। समीर उसे बेइंतहा प्यार करता था कई बार शादी करने की जिद पकड़ लेता था पर वो थी कि उसका मर्म समझने का प्रयास ही नहीं करती थी। तब आदर्श बेटी ..आदर्श बहन का लबादा ओढ़े किस दुनिया में ना जाने विचरण करती रहती थी। तब जिन भाइयों की शिक्षा के लिए उसने क्या-क्या जतन नहीं किए आज उन्हीं की एहसान फरामोशी का दंड झेलने पर विवश है। समीर ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की पर वह अपने परिवार की समस्या लेकर हमेशा मना करती रही। आखिरकार समीर ने भी मां-बाप की अपेक्षा को ध्यान में रखते हुए विवाह कर लिया।समीर के विवाह में सुमन ने खुशी-खुशी हर वह काम निपटाया जो उससे कहा गया एक बूंद आंसू भी आंख में आने नहीं दिया पर मन तो जैसे हजारों खंडों में टूट रहा था।समीर ने विवाह के 2 दिन पहले भी उससे कहा था तुम अगर अभी भी हां कह दो तो मैं इस विवाह से मना कर दूंगा।पर उसने मना कर के जैसे स्वयं के ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली थी।सच है आज जो झेल रही है उसका कारण एक सच्चे प्यार की अवहेलना ही तो है। शादी के बाद उसे पता चला कि उसका पति उससे 20 वर्ष बड़ा है वह भी तब जब एक रात उसने ठंडी सांस भरकर कहा था , "घर मेरे नाम नहीं... रुपया मेरे पास नहीं... सब कुछ आपके बेटे का है तो मेरा भविष्य क्या है?"

"मैं हूं ना !"

"और आपके बाद ...?"

"तुम मेरी मृत्यु की कामना करती हो?"

नहीं ....पर ऐसा हुआ तो?"

"मुझे मेरी जिम्मेदारियां पता है !"सुबोध ने कहा तो वह गुस्से से तेज स्वर में बोली " मुझे अपनी संतान चाहिए.. कोई तो हो जिसे मैं अपना कह सकूं ..जो मेरे सुख दुख का हिस्सेदार हो..।"

"ऐसा नहीं हो सकता , और लोग क्या कहेंगे ..पचपन का हो चला हूं इस उम्र में बच्चा ..ऐसा सोचना भी मत ...रिटायरमेंट की उम्र है मेरी।"

"पचपन..?..आपने तो पैंतालीस बताया था ना, उसने हतप्रभ होकर पूछा था।

"हां शादी ब्याह में इतना झूठ- सच चलता ही है"

"पर मैं तो पचपन की नहीं हूं ना ...मेरे भी कुछ अरमान है ..मुझे अपनी संतान चाहिए ..आप इतनी एकांगी सोच क्यों रखते हैं ?रिटायरमेंट की उम्र में शादी क्यों की?"

"तुम कितना तर्क -वितर्क करती हो.. एक वह थी ,कभी तेज स्वर में एक शब्द नहीं कहा, जो कहता था मान लेती थी।"

"हां! उन्हें मेरी जैसी स्थिति में रहना पड़ता ना तब देखते तर्क -वितर्क और कुतर्क!"

ऐसे विवाद अब रोज का किस्सा बन गए थे।दांपत्य में कटुता बढ़ती जा रही थी। हद तो तब हो गई जब एक राज और खुला।उस दिन सुमन ने ठान लिया था कि वह इस रोज-रोज के झगड़े को खत्म करके रहेगी उसने शांत भाव से पति से बात की समझाने का एक अंतिम प्रयास किया।

"आप मेरी बात और ,मुझे समझने की कोशिश तो कीजिए ...एक स्त्री की संपूर्णता मां बनने में ही है ..एक संतान स्त्री को मातृत्व की अनमोल थाती ही नहीं देती ,बल्कि उसे पाकर उसका नारित्व धन्य हो जाता है। क्या आपको नहीं लगता हम दोनों की भी एक संतान हो?"

"ऐसा नहीं हो सकता ...अब मैं तुम्हें क्या बताऊं ..देखो..!.. मैं तुम्हें डालिमा में नहीं रखूंगा ,जब रवि पैदा हुआ था तब विभा की हालत बहुत खराब हो गई थी दूसरे बच्चे के कारण उसकी जान भी जा सकती थी इसलिए...!"

"इसलिए..?"

"मैंने तभी अपना ऑपरेशन....!!!"

क्या ? सुमन सन्न रह गई थी। मूक बधिर सी बैठी रह गई थी ...पाषाण प्रतिमा में बदल गई थी। अब कहने सुनने को शेष क्या बचा था ? वह पागलों की तरह चीख चीखकर पूछना चाहती थी मेरा जीवन सूली पर क्यों चढ़ाया ? पर चुप रही उत्तर तो उसकी आत्मा में ध्वनित तो हो ही रहा था ,घर संभालने के लिए तुमसे शादी की है...

अब तुम क्या करोगी सुमन ?"पूरी कथा सुनकर मैं उसकी दशा पर मर्माहत थी।

"वही जो मुझे करना चाहिए दीदी !उसकी आवाज में एक दृढ़ निश्चय झलक रहा था।

"मैं किसी कीमत पर घर छोड़कर मां के पास नहीं जा रही। रवि को यहां आना है, तो स्वागत है ,नहीं तो जहां रहना हो रहे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मैंने जीवन पर्यंत केवल दूसरों के बारे में ही सोचा है भाई-बहन माता-पिता रिश्ते नाते निभा कर थक गई हूं ...टूट गई हूं..अब मुझे केवल अपने लिए जीना है.. केवल अपने लिए ...!" वह बिलख-बिलख कर रो रही थी और मैं संज्ञा शून्य सी बैठी थी। धीरे धीरे वह थोड़ी शांत हुई और उसने कहा , "वह सुमन जो वक्त की तेज रफ्तार में न जाने कहां भागती जा रही थी आज वह स्थिर होकर केवल अपने बारे में सोचेगी ..माना जिंदगी ने दुश्वारियां और वेदनाओं के भंवर में डालकर मेरी भावनाओं को चुनौती दी है ...पर मैं भी हिम्मत नहीं हारुंगी.. जिंदगी के भंवर से कैसे बाहर निकलना है वह रास्ता मैंने ढूंढ लिया है..एक पत्नी होने के नाते मैं अपने अधिकारों के लिए जरूर लडूंगी और यह मेरा वादा है आपसे ,मैं जीतूंगी दीदी! मैं जरूर जीतूंगी,...!"

वह कहती जा रही थी और मैं वर्षों पहले की दृढ़ निश्चयी साहसी सुमन को सामने पाकर अभिभूत थी। वेदना का अहसास न जाने कहां खो गया था ,बस एक एहसास जीवंत हो उठा था ,...काश !यह तेरी पत्नी होती समीर ..काश ! तूने उसकी प्रतीक्षा की होती ..काश ! तुमने उसकी भावनाओं को समझा होता।

तुम्हारी दीदी

सुधा।


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