जिंदगी का एक दिया
जिंदगी का एक दिया
संदीप राजदान — राजदान परिवार का एकमात्र उत्तराधिकारी, लख्ते-जिगर। शहर से गाँव तक फैला विशाल साम्राज्य। पिता मनदीप राजदान की एक ही इच्छा थी कि उनका इकलौता बेटा खानदानी विरासत संभाले। संदीप, वर्तमान और भारतीय पुरातन धार्मिक-मार्मिक संवेदनाओं का सुंदर समन्वय था। आधुनिक युग वाले उसे अपने जैसा समझते, तो पुरातनपंथी अपने जैसा। परिवार भरा-पूरा था — माता-पिता, दादा-दादी, बहनें सिया और मान्या, जो विवाहोपरांत अपने ससुराल में थीं, पर समय-समय पर मायके आती-जाती रहतीं। खुशहाल परिवार, जिसे देख कुछ प्रेरित होते, तो कुछ ईर्ष्या रखते। मनदीप राजदान और पत्नी शिवानी ईश्वर के प्रति कृतज्ञ, सदैव दान-पुण्य में लीन। पर कहते हैं, ईश्वर अपने भक्तों की परीक्षा लेता है। और परीक्षा की वह रात आई — एक दिन संदीप अपने गाँव, खूबसूरत पहाड़ों के बीच बसे लोहा-दरगा (काल्पनिक नाम) गया था। लौटते समय शाम ढल गई। उसने कार स्थानीय बाजार तमलूक (काल्पनिक) में रोकी। चाय वाले से चाय बनाने को कहकर वह लघुशंका हेतु गया। चाय बन गई, पर संदीप नहीं लौटा। दुकान मालिक शिवराम दहेल को शंका हुई। उसने वॉशरूम और आसपास खोजा, पर संदीप का कहीं पता नहीं। अंततः उसने निकट थाने में हुलिया के आधार पर रिपोर्ट दर्ज कराई। थानाध्यक्ष जसवीर नौटियाल हुलिया सुनते ही शिवराम के साथ दुकान पर आए। संदीप की खड़ी कार देखते ही उनका शक यकीन में बदल गया — अपहरण हो गया है। जसवीर क्या, क्षेत्र के सभी अधिकारी मनदीप राजदान परिवार को जानते थे। सूचना मिलते ही पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई। राजदान परिवार में मातम छा गया। मनदीप राजदान ने अपने ऊँचे संबंधों को सूचित किया। पूरा प्रशासन हरकत में आ गया। गले की हड्डी — जब पुलिस ने अपहरण को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, तो अपहरणकर्ताओं के लिए संदीप गले की हड्डी बन गया। संदीप ने उन्हें पहचान लिया था — वे चारों, सैफुद्दीन, नसरुल्लाह, खैरू और रहमत, कभी राजदान परिवार के वफादार नौकर थे, जो अब बदला लेना चाहते थे। पुलिस के दबाव में उन्होंने संदीप को मारने से बेहतर उसे गहरे जल-स्रोत में फेंकना समझा। सोचा — इसे तैरना नहीं आता, स्वयं डूब मरेगा या जलीय जीव निवाला बना लेंगे। गंगा की तेज धारा में वह इतनी दूर बह जाएगा कि खोजना असंभव होगा। संदीप को फेंककर चारों नेपाल की ओर भाग गए। गंगा में एक दिया — इधर संदीप गंगा की तेज धारा में बहता, ईश्वर और गंगा मैया से जीवन की याचना कर रहा था। तभी वह एक बहते झुरमुट में फंस गया। बहने की गति धीमी हुई, पर जलीय जीवों का भय और बढ़ गया। तभी उसने देखा — उस झुरमुट के मध्य एक दिया अपनी लौ में बेबाक, अनवरत जल रहा था, जैसे किसी तांत्रिक ने साधना हेतु जलाया हो। गंगा की गहराई और उठते-गिरते प्रवाह में उस दिए का जलते रहना, संकट में सुकून बन गया। संदीप एकटक दिए को निहारता रहा, निर्भय हो धारा में बहता रहा, प्रभात की आश में। कब प्रभात की पहली किरण फूटी, उसे पता ही नहीं चला। सुबह मछुआरे नाव लेकर निकले तो उन्हें बहता झुरमुट, उसमें जलता दिया और फंसा युवक दिखा। उन्होंने तुरंत संदीप को निकाला — रात भर संघर्ष से भय और ठंड से कांपता हुआ। संदीप ने पहला काम किया — मछुआरों से कहा, "वह दिया ले आओ।" मछुआरे ने दिया उठाकर दिया। संदीप ने जलता हुआ दिया हाथ में लिया उसे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि दिया मिट्टी का था और कुम्हार ने उसे बनाने के बाद पकाया भी नहीं था अर्थात कच्ची मिट्टी का दिया जो पानी के प्रवाह मे गला नहीं आश्चर्य जनक था ही बुझा भी नहीं संदीप राजदान ने ईश्वर द्वारा उसके जीवन का अनमोल भेट कच्ची मिट्टी का दिया अपने जीवन का दिया मान ईश्वर के प्रति कृतज्ञाता भाव के साथ निकट थाने जाकर सारी आप बीती बताया और माता-पिता से बात की। संदीप के जीवित होने की खबर जंगल में आग की तरह फैली। मीडिया आ धमकी। जो भी उसकी भयावह आपबीती पर प्रश्न पूछता, संदीप बस अपने हाथ में जलते हुए उस दिए की ओर इशारा कर देता — क्योंकि जिंदगी का वह एक दिया ही उसका उत्तर था, उसका ईश्वर था। नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर* गोरखपुर, उत्तर प्रदेश!!
