Sony Kumari

Tragedy


2.7  

Sony Kumari

Tragedy


हाँ.... स्त्री हू मैं ​​

हाँ.... स्त्री हू मैं ​​

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'समाजों में परिवर्तन की बेड़ी हूँ मैं

स्वाभिमान नहीं, जैसे हथकड़ी हूँ मैं, 

सारे दर्द दबाये मैंने अंदर ही अंदर, 

हर ख्वाब खुद मिटाने वाली नारी हूँ मैं! 


छोटी सी शुरुआत, 'स्त्री जन्म की कहानी स्त्री से ही सुनते हैं! 

जब किसी घर में बच्ची का जन्म होता है तो पता है क्या होता है? 

छोटी सी बच्ची जिसके भविष्य का कोई आता - पता नहीं होता है, वो आगे क्या करेगी, कैसी बनेगी कैसा संस्कार होगा ना कुछ अज्ञान-अबोध बच्ची की संघर्ष की कहनी वही से शुरू हो जाती है? बच्ची का भविष्य जन्म से ही आंकने लगते हैं समाज! 

हाँ अगर बच्ची की माँ का स्वभाव नहीं, लक्षण कहते हैं गांव मे, वो ठीक हुआ तो थोड़ा सा ठीक आंका जाएगा, अगर बच्ची के माँ के घर यानी बच्ची के नाना- नानी का खानदान दहेज मे अच्छी वस्तुएँ, पैसे देते हैं तो उनका सम्मान बहुत ही अच्छे ढंग से होता है, वही हम मध्यम वर्ग की बात कहें तो चाहे बच्ची की माँ का लक्षण अच्छे ही क्यों ना हो उसे नीचे की दृष्टि से ही देखते हैं अपने! 

हाँ, अगर घर वाले को लड़का चाहिए होता है और लड़की पैदा हो जाती है तो वहां अलग ही लांछन लगाया जाता है! 

उस वक़्त माँ की ममता की परख नहीं करते हैं लोग, कि वो जब पैदा हुए होंगे तो कैसा व्यवहार हुआ होगा उनके माँ के साथ, जरा अच्छी सी सोच नहीं गढ़ सकते हैं उसे और बेहतर नहीं बदतर बनाने लगते हैं! वही अगर बेटा जन्म ले तो घर में दादा - दादी, गांव समाज सभी खुशी मनाते हैं... नया भोज जग जाता है, चारो तरफ बधाइयां बजती है मानो कोई त्योहार हो! 

वही जब एक माँ का सवाल आता है तो माँ कभी भी अपने बच्चों मे फर्क़ नहीं रखना चाहती है, लेकिन समाज के तानों, से वो उभरने का सोच भी नहीं सकती है, उनके मन में भी भेद गढ़ दिए जाते हैं, लड़का- लड़की का फर्क़ समझाते रहते हैं! 

खैर कोई नहीं आखिर माँ है जैसे भी हो वो अपने बच्चे की खुशी ही चाहती है! बेटी हुआ तो नाराजगी देखिए समाज की.... पहला सवाल, ओह बेटी हुई है कोई बात नहीं इस बार भोज नहीं मिलने वाला? कोई बात नहीं थोड़ा बहुत रस्म रिवाज कर दिया जाय! फिर घर में ढोल और ताशे के जगह चार औरतें आयी एक- दो मंगल गीत हुए रस्मे खत्म! थोड़ा बहुत पूजा - पाठ और अगले ही दिन रसोई में कदम रखवा देते हैं! 

वही अगर बेटा हुआ है तो हर जगह तार, संदेश मिठाईयों से सबका मुह मीठा कराया जाता है, ढोल- ताशे सुबह से शाम तक और मंगल गीत पूरे नियम धर्म से पांच देवी गीत, शौहर और ढ़ेर सारे मनोरंजन गीत होते हैं मानों की चारों तरफ खुशियां ही खुशियां! वही खुदा ना खास्ता अगर बेटी पैदा हो गयी और जच्चा (माँ) को कुछ हो गया, तो सारे पाप के भागीदार नन्ही सी जान बन जाती है, जिस नन्ही जान को अपना भविष्य पता ना हो वो माँ को खाने वाली (यानि माँ को मौत के घाट उतारने वाली कुल्टा कहायी जाती है! आसान नहीं है एक स्त्री का संघर्ष का कहानी कहना! 

बच्ची अगर सही सलामत बड़ी होती थोड़ा होश संभालती है तो घर में उसको उसको अच्छी शिक्षा नहीं देके घर के काम और यही सिखाया जाता है कि औरत घर के कामों और कुशल गृहणी बनने के लिए होती है और शिक्षा से उसे दूर रखा जाता है! थोड़ा दिन और रह गयी तो फिर घर वाले के अलग ताने माँ तो नहीं रहीं कुल्टा को छोड़ गयी किसके सर पर, वही अगर माँ भी है तो यहि चिंता रहती है बेटी है क्या करेगी बिना दहेज घर कैसे बसेगा? 

उसे अपने ही घर में परायों सा व्यवहार का सामना करना पड़ता है! मानो तो सबका समाज में यहि कहना है "बेटी पराया धन होती है "! फिर लड़की को होश नहीं होता है सच - झूठ और उम्र लिहाज का और उनका विवाह भी करवा देते हैं! जिसे किसी अन्य व्यवहारिक ज्ञान नहीं है, तो वो ससुराल को समझ सकेगी क्या? फिर भी लड़की जैसे भी हो घर वाले के मार हो प्यार हो किसी भी तरह से सारे चीज़ें सीखती है ताकि वो अपना और अपने परिवार का नाम समाज में डूबने ना दे! वहां भी उसे कोई अपनापन देने वाला नहीं मिलता है! सच कहें तो 'लड़की का कोई अपना घर नहीं होता है'! 

पत्नि को रहते अगर पति को कुछ हो जाय तो अलग विवाद खड़ें हो जाय, कमियां अगर पुरुष मे हो तो भी औरतों को ही दोषी माना जाता है!

औरत सुहागन मरे तो कहीं ना कहीं से उसे इज़्ज़त भरी निगाहों से देखा जाएगा, वही अगर पत्नि से पहले पति मर गया तो औरत इंसान खाने वाली डायन कहलाती है, बचपन से ही वो इंसान खाने वाली डायन हो जाती है, ये घटना नहीं माना जायगा सारा दोष औरत पर मढ़ दिया जाता है! 

फिर औरत को विधवा के तरह जीवन बिताना है, किसी से कोई शिकायत नहीं, रूखा सूखा - खाना है समाज के अलग ही नियम से बंधे रहना है, यहां भी औरत को बिना पुरुष के अस्तित्वहीन बताया जाता है! पति है तो सौलह श्रृंगार बिना पति के काजल भी लगाना पाप माना जाता है! वही अगर पति से पहले पत्नी मर जाती है तो उनके लिए कोई भी कार्य मे मनाही नहीं पत्नि के अंतिम संस्कार के बाद वो कुछ भी कर सकता है जैसे वो नया लड़का है, वो शादी हसी- ठिठोली सब कर सकता है आम इंसान के तरह! लेकिन औरत के लिए ऐसा कोई नियम लागू नहीं आखिर क्यों? 

औरत पकवान बनाए तरह - तरह के व्यंजन बनाए लेकिन सबसे पहले अधिकार पुरुष को ही मिलता है कभी सोचा है क्यों? 

हमारा समाज सब दिन से ल़डकियों को नीचे दबाते आये है, फिर भी कहते हैं ना बदलाव चाहिए तो अपने एक कदम बढ़ना जरूरी हो जाता है! गांव है तो वहाँ तक परिवर्तन को खबर और अच्छी सोच को फैलाने मे थोड़ी देर लगेगी लेकिन परिवर्तन एक दिन आएगा जरूर! 

अब ऐसा नहीं है कि परिवर्तन नहीं आया है, आया है लेकिन थोड़ा बहुत! 

एक भी दिन ऐसा ना गया हो कि अखबार के पन्नों पर ऐसी घटनाओं को नहीं दर्शाया गया हो, हर दिन छोटी-छोटी सोच को उबारने का प्रयास किया जाता है लेकिन कुछ ना समझ के वजह से आए दिन, दहेज के लिए स्त्री जलायी जाती है तो कहीं स्कूल या कॉलेज जाती लड़की तो कहीं चलती बस में औरत की आबरू को नोच लिया जाता है, क्यों? क्या इन गंदी सोच से बाहर निकला जा सकता है, हाँ तो कैसे? औरत न्याय मांगने जाय तो बदचलन हो जाती है क्यों? औरत ही मर्द को संवारे और मर्द ही औरत को बदचलन बनने पर मजबूर कर दे तो क्यों समाज ये दर्पन नहीं दिखा पाता है? 


चलो सारे ग़म छुपा लूं, 

माँ के तरह फर्ज निभा लूं, 

बहन, बहु, पत्नी का धर्म

सारे रिश्ते को मैं संवार लूं, 

फिर भी नासमझ, बगैरत, 

चलो खुदगर्ज मैं ही कहा लूं! 

क्यों, क्योंकि....हाँ मैं स्त्री हूँँ.....!!


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