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Dinesh Dubey

Inspirational

3  

Dinesh Dubey

Inspirational

घमंड

घमंड

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एक हाथी अपने मार्ग से चला जा रहा था , उसके ऊपर एक मक्खी आकर बैठ गई।                  

हाथी को पता भी नहीं चला कि मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई, आवाज की,।

जब हाथी ने नहीं सुना तो कहा " देख भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना, या मेरा वजन अधिक लगे तो खबर कर देना, मैं उड़ जाऊंगी। तुझे तकलीफ नहीं होनी चाहिए।

लेकिन हाथी को कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा।

थोड़ी देर बाद हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा। बड़ी पहाड़ी नदी थी और भयंकर गहरा गड्ढा था, मक्खी ने कहा " देख भाई, हम दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए। अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना, मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।

हाथी के कान में थोड़ी सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान नहीं दिया।

फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया, उसने हाथी से कहा- यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रहे, हमारी मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं और कभी कोई काम हो तो मुझे कहना। संकोच मत करना।

तब मक्खी की थोड़ी सी आवाज हाथी को सुनाई पड़ी, उसने कहा- तू कौन है? कुछ पता नहीं कब तू आई, कब तू मेरे शरीर पर बैठी और कब तू उड़ गई, इसका मुझे कोई भी पता नहीं है।

लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी।

जगत में हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने और ना होने से कोई भी फर्क नहीं पड़ता है। हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है। हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है?

लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। वो शोरगुल किस लिए है? वो मक्खी क्या चाहती थी? वो चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, कि तू भी है और तेरा अस्तित्व भी है, वो अपने घमंड में थी।

हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जी सकता है। दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें और उपेक्षा न हो।

हम आकर्षक वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिए, सजते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें। धन इकट्ठा करते हैं या मकान बनाते हैं, तो दूसरों को दिखाने के लिए, ताकि दूसरे देखें और स्वीकार करें कि तुम कुछ विशिष्ट हो, ना की साधारण।

तुम्हारा शरीर मिट्टी से ही बना है और फिर मिट्टी में ही मिल जाएगा, और तुम अज्ञानता के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हो, ।

यह हमारा घमंड ही तो है , ।

अनूठा सभी तो मिट्टी के ही एक पुतले हैं और कुछ भी नहीं।

अहंकार सदा इस तलाश में है, कि वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें। अहंकार को छोड़ स्वमान में रहो।

स्मरण रहे, हमेशा स्वयं को अविनाशी आत्मा ही समझना, क्योंकि आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर से मिट्टी का बन जाएगा। सब सगे-संबंधी और धन-सम्पत्ति यहीं रह जाएंगे। इसलिए अपना झूठा अहंकार छोड़ दो और केवल एक ईश्वर के मार्ग पर चलो, तो सबका जीवन सफल हो जाएगा।

 राधे राधे हरे कृष्ण



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