Arvind Kumar Srivastava

Inspirational


5.0  

Arvind Kumar Srivastava

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एक कदम आगे

एक कदम आगे

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कनिका के व्यवहार में अचानक से हुऐ परिवर्तन को अनामिका समझ नहीं सकी थी, वह कनिका को दस वर्षाे से जानती थी, एक चंचल किशोर बालिका जो अब युवा हो चुकी है, हमेशा मुस्कराती उछलती-कूदती, किन्तु कनिका न जाने क्यूँ गम्भीर हो गयी थी, न खाने की परवाह न पहनने की, गुम-सुम, स्वंय में कहीं खोई हुई सी, कुछ विचार करती या स्वंय से ही कुछ कहती हुई, अनामिका उसकी मदद करना चाहती थी किन्तु कुछ इस प्रकार कि कनिका को इस बात का कोई आभास भी न हो कि उसकी मदद की जा रही है, या उसे भावनात्मक रूप से कहीं कुरेदा जा रहा है, कनिका वैसे तो काफी समझदार थी अपने माता-पिता की अकेली संतान। अनामिका ने अनुमान लगा लिया था कि कनिका अपने माता-पिता तथा उसके सामने काफी सहज रहने का प्रयास करती है किन्तु उसकी प्रौढ़ हो चुकी आँखो से कनिका की उदासी और गम्भीरता छिप नहीं पायी थी। एक विशेष बात कनिका कि जो अनामिका ने नोटिस की थी वह भी उसका अकेलापन जिसे वह सभी से छिपा रही थी, दोस्तों के साथ घूमने जाना, माता पिता से फ़रमाइशें करना, उसके साथ भी उठना बैठना उसने कम कर दिया था।

कनिका दस वर्ष की थी जब अनामिका शादी के बाद उसके पड़ोस में आयी थी। बीस-इक्कीस वर्ष की अनामिका का कनिका के साथ एक आत्मीय सम्बन्ध हो गया था। अनामिका के सास-ससुर तथा कनिका के माता-पिता एक दूसरे के पड़ोसी थे तथा आपस में धनिष्ट, अनामिका का पति भारतीय वायु सेना में पायलट था, वह चार माह का अवकाश लेकर शादी के लिये आया था किन्तु एक माह तो शादी से पूर्व ही व्यतीत हो गये थे। आकाश और अनामिका का साथ केवल तीन माह ही रहा था, अवकाश समाप्त होते ही आकाश वापस चला गया और केवल दो माह के बाद ही फाइटर विमान के क्रेश होने पर विमान के मुख्य पायलेट ‘विभाष‘ और आकाश की मृत्यु हो गयी थी। पुत्र की मृत्यु के दो वर्ष के अन्दर ही आकाश के माता-पिता का भी देहान्त हो गया था, वे पुत्र की मृत्यु से अत्यन्त आहत हो गये थे।

 सास-ससुर की मृत्यु के बाद अनामिका एम दम अकेली हो, गयी थी ऐसे में उसका साथ कनिका ही देती जो अब चंचल उन्मुक्त किशोर बालिका हो गयी थी, उसकी हँसी बिल्कुल निश्छल थी जिससे अनामिका को वह बहुत भाती, वह अपनी प्रत्येक बात स्कूल की, मित्रों की अनामिका को उन्मुक्त भाव से बताती रहती जिससे अनामिका को अपना अकेलापन कभी नहीं अखरता था, अनामिका की आर्थिक स्थित ठीक थी, पति तथा ससुर की मृत्यु के बाद उसे काफी अच्छी रकम मिली थी जिसके व्याज से उसका काम ठीक तरह से चल जाता था, कोई अभाव नहीं था। अनामिका कनिका की पढ़ाई में सहयोग करती तो कनिका अनामिका के दैनिक कार्यो में, उन दोनो के रिश्तों से कनिका के माता-पिता को भी कोई शिकायत नहीं थी और जहां भी आवश्यक हो सहयोग करने को हमेशा तैयार रहते।

 कनिका स्कूल से काँलेज पहुंच गयी थी, उसने स्नातक की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी और अब परास्नातक कर रही थी, पिछले दस वर्षो से कोई आर्थिक समस्या न होते हुए भी अनामिका का सामाजिक संघर्ष कम नहीं था, कनिका धीरे-धीरे अपनी पढ़ाई और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त होती गयी और अनामिका अपने अकेलेपन तथा आस-पास की धूरती हुई आँखो से स्वयं को त्रस्त पाती, यद्यपि उसने इग्नोर करना अच्छी तरह सीख लिया था, अपने अकेलेपन और अपनी ऊब को दूर करने के लिये कुछ और करने का मन बना रही थी, अनामिका विवाह के बाद जब ससुराल आयी थी तो पहले दिन से ही कनिका ने उसे आँटी कहना शुरू कर दिया था और वह कनिका को अनायास ही बेटा कहने लगी थी, इस प्रकार के दोनो सहज और सरल रूप में एक आत्मीय बन्धन या डोर में बंध गय थे।

‘‘आँटी मैं देख रही हूँ कि आप इस समय स्वयं को काफी अकेला महसूस करती है।‘‘ कनिका ने बड़ी सहजता से कहा

‘‘हो बेटा! सोच रही हूँ कुछ करूँ इससे समय भी आसानी से कट जायेगा और थोड़ी आय भी हो जायेगी।‘‘ अनामिका ने काफी गंभीरता से उत्तर दिया।

 ‘‘आँटी मेरा विचार है कि आप कम्प्युटर सीख लें, इससे आप को शहर में कही भी कोई अच्छी सी नौकरी मिल जायेगी, आप का समय भी बीत जायेगा और आमदनी भी होगी।‘‘

‘‘बेटा तुम्हारी राय मुझे ठीक लगती है, मुझे अपना अकेलापन अब बहुत भारी लगने लगा है।‘‘ अनामिका के चेहरे पर विश्वास की चमक उभर आयी थी जिसे कनिका ने स्पष्टता से देखा और लिया था।

‘‘ठीक है आँटी कल आप मेरे साथ चलें, मैं आप का एडमीशन एक कम्प्यूटर इन्सट्यूट में करवाती हूँ।‘‘

अनामिका और कनिका अपने-अपने कार्यो में व्यस्त हो गयी, उन दोनो का आपस में मिलना, धुल मिल कर एक साथ बैठना, देर तक बिना किसी बात या विषय के बातें करना काफी कम हो गया था, इस प्रकार छः माह का समय कब निकल गया अनामिका को कुछ पता नहीं चला।

अचानक से एक दिन अनामिका ने अनुभव किया कि कनिका काफी शान्त हो गयी है और चुप-चाप सी रहने लगी है, प्रारम्भ में अनामिका ने सोचा कि शायद पढ़ाई के दबाव के कारण है, अनामिका ने कनिका पर अपनी दृष्टि रखना प्रारम्भ कर दिया, धीरे-धीरे करके इस प्रकार तीन माह का और समय निकल गया, कनिका घर के सामने पार्क में एक बेंच पर देर तक चुप-चाप गुम-सुम सी बैठने लगी थी, कनिका काफी औपचारिक हो रही थी, हर बात का एक छोटा सा ही जवाब देकर चुप हो जाती, कनिका ऐसी तो कदापि नहीं थी अनामिका ने मन ही मन सोचा, कुछ तो है जिसे कनिका छुपा रही है, अनामिका ने दुनिया देखी थी उसकी आँखो ने कानिका के चेहरे और मन की भाषा पढ़ने की कोशिश करने लगी थी, ऐसे ही कनिका एक दिन जब चुप-चाप पार्क में बेंच पर बैठी थी अनामिका धीरे से जा कर उसके बगल में खाली रही जगह पर बैठ गयी थोड़ी देर तक तो कनिका को पता ही नहीं चला कि कोई उसके बगल में कोई बैठ गया है, सहसा कनिका ने देखा और चौक कर पूछा ‘‘अरे! आँटी आप कब आयी।‘‘

‘‘बस अभी।‘‘ अनामिका ने छोटा सा उत्तर दिया। कनिका कहीं दूर देखने लगी थी, आकाश में उड़ती हुई पंतग को अनामिका जानती थी कि कनिका को दूर गगन में उड़ती हुई पतंगे देखना अच्छा लगता है, थोड़ी देर दोनो एक दूसरे के पास यूँ हो बैठी रही, बिना कुछ बोले।

‘‘कनिका! तुम देख रही हो न ये दो पतंगे आपस में पेंच लड़ा रही है।‘‘

‘‘आँटी पतंगे पेंच नहीं लड़ाती इनकी डोर जिन हाथों में है उनके अंहकार ही आपस में पेंच लड़ाते है।‘‘ अनामिका ने सोचा कनिका की बात तो सही है किन्तु उनके मन में उठ रहे भावों से अनामिका व्यथित हो गयी थी । उसने बात-चीत के वातावरण को बनाने के उद्देश्य से कहा ’’कनिका देखना इन में से एक पतंग अभी कट जायेगी।’’

‘‘आँटी पतंगों और लड़कियों का क्या है एक दिन कट हो जाना है।’’

अनामिका को कनिका के हृदय में छिपे हुए दर्द का कारण कुछ -कुछ समझ आने लगा था किन्तु कनिका को समझाने के लिये कहा’’

‘‘कनिका लड़कियाँ पंतग नहीं है जो कट जाती है।’’

’’क्यूँ क्या आप नहीं है, आकाश में रह गयी उस एक अकेली पंतग की तरह इधर-उधर डोलती हुई।’’

अनामिका ने आकाश की ओर देखा जहाँ एक पतंग कट चुकी थी और बिना किसी सहारे या आसरे के छत्ताते हुऐ धीरे-धीरे क्रमशः नीचे की ओर जा रही थी, उनके मन में तूफान उठा इसे अभी लूटा भी जायेगा, उसका ह्रदय कांप कर रह गया किन्तु अपने आप को व्यक्त करने स्वंय को बचाये रखने की कोशिश की क्योंकि उसे कनिका की मदद करनी थी। कनिका के चेहरे के भाव काफी कठोर हो गये थे, वह उसी की ओर देख रही थी एक टक बिना पलकें झपकायें अनामिका ने मुस्कराने की कोशिश की, किन्तु पुरी सफलता नहीं मिली परन्तु अपने आप को संयमित रखते हुऐ अनामिका ने कहा,

’’कनिका में काफी दिनों से देख रहो हूँ कि तुम अचानक से काफी गंभीर हो गयी हो मेरा अनुभव और अनुमान कह रहा है कि तुम को कोई बात अन्दर ही अन्दर बेचैन कर रही है।‘‘

’’आँटी में सोचती हूँ ’निमिष‘ को भूल ही जाँऊ, अगर आप कम्प्यूटर सीख कर एक नया जीवन शुरू कर सकती है तो मैं क्यूँ नहीं ।‘‘

अनामिका अपलक कनिका की ओर देखती रही, कई प्रकार के भाव उसके चेहरे पर आ जा रहे थे किन्तु वह स्वयं को सहज रखने का प्रयास कर रही थी।

‘‘कनिका मैं समझती हूं जीवन हमेशा आगे चलता है।‘‘

‘‘आप का मतलब है कटी हुई पतंग में फिर से नई डोर बांधी जा सकती है।‘‘ कनिका के चेहरे पर एक विश्वास उभर आया था।

‘‘अवश्य आंधी जा सकती है।‘‘ और बांधनी चाहिये भी यही उचित है।‘‘

‘‘जो पुराना टूट चुका है या खो चुका है उसकी याद में जीवन व्यर्थ करना कोई अच्छी बात नहीं है आँटी।‘‘

‘‘बेटा कभी-कभी हमारे निर्णय गलत हो जाते है, जितनी जल्दी हो सके हमे बाहर निकल आना चाहिए।‘‘

काफी देर तक दोनो पार्क की बेंच पर बैठी रही उन्मुक्त और प्रफुल्लित,

पार्क में बच्चों की उपस्थित बढ़ने लगी थी आकाश में चाँद पूरा निकल आया था चारों ओर चांदनी छिटकी हुई थी दोनो ने एक दूसरे की ओर देखा और खिल खिला कर हँस दी।



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