Pankaj Prabhat

Inspirational


4.8  

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दहेज एक अभिशाप

दहेज एक अभिशाप

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बाबू लक्ष्मीदास अपने कमरे में एक कोने पर अपनी चारपाई पर बैठे बैठे अपनी गति पर व्यथित हो रहे थे, आज उन्हें अपने किये हुए हर अच्छे बुरे कर्म दृष्टिगोचर हो रहे थे। बाबू लक्ष्मीदास को ब्लड कैंसर है, वो ठीक भी हो सकते हैं, पर उन्हें बोन-मेरो की जरूरत है।


अचानक उन्होंने देखा की दरवाजे पर उनकी बहू खड़ी है, वो बहु जिसे उन्होंने कभी अपने धन और ऐश्वर्या के मद में कोई सम्मान नही दिया, अपितु हर पल हर घड़ी अपने तीखे शब्दो से उसका अपमान ही किया। पूरे 5 लाख रुपये अपनी बहू के माँ-बाप के प्राण पर चढ़ कर लिए थे। फिर भी प्रतिदिन उलाहना देते रहे।


एक दिन अपनी पत्नी का पक्ष लेने पर उन्होंने अपने बेटे को भी खूब खरी खोटी सुनाई। धनवान होते हुए भी अपनी बहू के माँ की बीमारी में एक रुपए की भी सहायता नही की, उन्ही का धन जो उनके प्राण पर चढ़ कर लिए थे उनके सहायता के लिए देने से इनकार कर दिया।


बेटे ने कहा “ कि वो धन उसके नाम पर लिया गया था तो उस पर उसका अधिकार है, और उस अधिकार से वो वह धन अपनी पत्नी की माता की सहायता के लिए चाहता है।”


बाबू लक्ष्मीदास ने बड़े घमंड से कहा “ उस धन पर सिर्फ उनका अधिकार है, उन्होंने अपने बेटे को उस कुल से सांझ किया, अपने अधिकार को अन्य लोगो के साथ बाँटा है, और ये धन उसी का मूल्य है। इस धन पर और किसी का कोई अधिकार नहीं


बाबू लक्ष्मीदास के इस कथनी और करनी के कारण उनकी बहू की माँ का निधन हो गया, और उसी दिन से उनके बहु और बेटे, उनका घर छोड़ अलग हो गए। पर बाबू लक्ष्मीदास ने उन्हें नही रोका, अपने धन के दम्भ में उन्हें जाने दिया और समय बढ़ता रहा।


पर आज वो खुद उसी दशा में हैं, जिस दशा में अपनी बहू की माँ की उपेक्षा की थी और उनकी सहायता न कर उन्हें काल के गाल में समाने दिया। आज उनके पास न धन है और ना ही स्वस्थ, आज उनका दम्भ उनके रक्त में मिल कर उनके प्राण का संकट हो रखा है।


अचानक अपनी बहू और पोते को देख कर उन्हें अचरज हुआ, बहु की आंखों में मर्म तो था पर कहीं एक व्यथित मन की पीड़ा भी थी। बहु ने उन्हें नमन करते हुए कहा कि उनकी बीमारी के बारे में जान कर उनके बेटे ने बॉन-मेरो की खोज की और एक बॉन-मेरो मिल भी गया है। ये बॉन-मेरो उनके अपने पोते का है, जो उन्हें मिल सकता है पर उसके लिए उसे 10 लाख रुपए चाहिए।


बहु की बात सुन कर लक्ष्मीदास के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने कहा “ मुझे मेरे ही पोते के बॉन-मेरो के लिए पैसे देने होंगे ये कैसी बात है। तुम रिश्ते में व्यापार ला रही ही। वो मेरा पोता है उसपर मेरा भी अधिकार है।”


बहु बोली “ हाँ अधिकार है, पर सिर्फ आधा, आपने ही कहा था कि आपने अपने बेटे का आधा अधिकार मुझे बेचा था 5 लाख में। तो उसी गणित से आपके पोते पर आपका सिर्फ आधा अधिकार है। अगर अपने प्राण बचाने के लिए आपको उसका बॉन-मेरो चाहिए तो आधा अधिकार आपको 10 लाख में खरीदना होगा। प्राण के बदले ये सौदा बिल्कुल सस्ता है।"


बाबू लक्ष्मीदास के आँखों से अश्रु धारा फूट पड़ी, आज उन्हें अपने दम्भ और लालच पर पश्चताप हो रहा था। आज उनका किया उनके सामने काल बन कर खड़ा था, और जिसे उसने कभी सम्मान नही दिया, वो ही उनके अभयदान का निमित बन उनके सामने खड़ी थी। वो लज्जा से गड़े जा रहे थे और अपनी भूल के लिए हाँथ जोड़े खड़े थे। उन्हें अपने भूल का एहसास था, की दहेज से एक नही दोनो घर बर्बाद हो जाते हैं।


बहु ने उनके पश्चाताप का सम्मान करते हुए, उनके चरण छुए और अपने व्यवहार पर क्षमा मांगी और उन्हें अस्पताल ले गयी।


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