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Shyam Hardaha

Tragedy


4.2  

Shyam Hardaha

Tragedy


डोंडियाखेड़ा

डोंडियाखेड़ा

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डोंडियाखेड़ा

अब तक

मुझे लग रहा था

मेरा भारत

अंधश्रद्धा/आलस्य

अवैज्ञानिकता की

गहरी नींद से जागकर

विकास की राह पकड़

बढ़ रहा है उज्ज्वल भविष्य की ओर;

अब नहीं देखेगा


आलस्य की रजाई ओढ़कर

अतीत के बेतुके सपने

अगर कोई सुनाएगा

ऐसे बकवास सपने

तो सुनने से कर देगा इंकार

लेकिन

‘डोंडियाखेड़ा’

मेरी इस उम्मीद के खिलाफ

एक ऐलान की तरह लगा मुझे !


जो कल तक

एक अनजाना गांव

अपरिचित नाम

वैसे भी

‘ग्लोबलाइजेशन’ के

इस जमाने में

कौन जानना चाहता है

किसी गांव का नाम ?


आज यही छोटा गांव

आमिर खान की ‘पीपली लाइव’

बना हुआ है-

जिस पर लगी हैं

सारे देश की नजरें

मीडिया का जमावड़ा

बना है उनके टीआरपी का जरिया

‘पीपली लाइव’-


मतलब बेरहम सिस्टम और

मीडिया के बीच फंसे

बेचारे किसान की करुण-गाथा

लेकिन ‘डोंडियाखेड़ा’

मतलब मूरख सरकारों और

हमारी अवैज्ञानिक चेतना/छल

की सामूहिक महागाथा

-जो सदियों से

हम अपने आप से/ अपनों से

करते/कहते आए हैं.


इंतजार में

खुली-व्यग्र आंखें

और रुकी सांसों के बीच

एक खस्ताहाल मंदिर के पास

चलती सरकारी खुरपी-कुदालों

का बेजोड़ नजारा

यह नया कुछ नहीं

भारत के भूत-भविष्य का

विमूढ़तापूर्ण त्रासद नजारा


यह देख

हम जान सकते हैं

कि हम जो हैं-

वह क्यों हैं?

एक्चुली

यह नजारा है

हमारी अवैज्ञानिक सोच

भाग्यवाद और

निकम्मेपन का-


जिसने गढ़ा है

अब तक के भारत का इतिहास

जिसे बता-बताकर

हम थपथपाते हैं,

खुद ही अपनी पीठ

हालांकि-

कहने के लिए

तर्क-वितर्कों के रहे हैं

हमारे अनेकानेक ग्रंथ

लेकिन वैज्ञानिक थिंकिंग में

हम तब भी थे पीछे


मिथकों-भाग्यवाद

और देववाद ने

हमें जकड़ रखा था

बहुत ताकत से

हमारे मन:पटल पर

छाया था सिर्फ

छद्म आध्यात्मिकता का

गहन अंधकर.


सच ही कहा है

किसी ‘कूटनीतिज्ञ’ ने

किसी व्यक्ति /समाज/देश को

पतन-खाई में गिराना है तो

पिला दो उसे

भाग्यवाद के भांग की घुट्टी

फिर समझिए

उसकी हो गई छुट्टी


भाग्यवाद

हमें कर्मों/वैज्ञानिक सोच

तार्किक जीवनशैली से

कर देता है विलग

तब फिर

‘डोंडियाखेड़ा’ वालों की तरह

जमींदोज दौलत के ऊपर

अपने घुटनों पर अपना सिर रखकर

हम देखते हैं सपने


चोरी/डकैती

दहेज की चाहत हो

या हो

मंदिरों में जाकर

मांगे जाने वाली

हमारी मन्नत की फितरत

यह क्या है?

शॉर्टकट सबसे आगे

बढ़ जाने की चाहत

मित्रों ! जब हम


देखते हैं सपने

तब ठहर जाता है वक्त

तब अतीत ही हमारा

वर्तमान और भविष्य

बन जाता है

हममें से बहुत जानते भी हैं


कि हमारे देश की दुर्दशा

का इतिहास क्या है

‘डोंडियाखेड़ा’ भी

हमें यही बताता है

इस तकनीकी युग में भी

हम देख रहे हैं

बेतुके सपने

‘भाग्यवाद’ और ‘देववाद’पर

हमारी आस्था है अब भी

इतनी गहरी कि किसी ने

जरा भी सुनाई देवगाथा

या फेंका अंधविश्वास का पांसा


कि हम तत्काल

सस्पेंड कर देते हैं-वैज्ञानिक सोच

है न कितना बड़ा अफसोस!!

‘क्या पता..कहीं कुछ निकल…’ और

‘कुछ तो है’ का मंत्र जपते हुए

इस उम्मीद में रहते हैं

कि ‘सोने की चिड़िया’

के पंजों के नीचे

फूट पड़ेगा-

‘सोने का ज्वालामुखी’


मेरे मित्रों

तरक्की/ऐश्वर्य/धन-संपदा

नींद/सपनों से

बाहर हासिल करनेवाली चीजें हैं

उसी व्यक्ति/समाज/देश के

हिस्से आती हैं

जो अपने

अपने पुरुषार्थ/वैज्ञानिक सोच

और बेहतर नियोजन

पर रखता है प्रगाढ़ यकीन

हालांकि-

‘डोंडियाखेड़ा’ को हम समझें


एक सीधी टक्कर

नींद और चेतना के बीच

अतीत और भविष्य के बीच.

उम्मीद है-

यह जगह साबित होगी

तरक्की/बदलाव/वैज्ञानिक सोच

का अहम पड़ाव

वैसे भी अब तक


होती आई है

प्रगति के खिलाफ

षड्यंत्र करनेवाली

ताकतों की हार बार-बार

भले ही-

बीच-बीच में वे

क्यों न सिर उठाती रहें.

‘डोंडयाखेड़ा’ का सोना

हमें सुलाएगा नहीं

मित्रों ! जगाएगा।


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