डायरी जुलाई : बहुत नाइंसाफी है
डायरी जुलाई : बहुत नाइंसाफी है
डायरी सखि,
एक बच्चा वो भी कट्टर ईमानदार, अगर बाहर घूमने जाना चाहता है तो इसमें क्या हर्ज है ? आखिर वह चाहता क्या है ? इतना ही ना कि उसका बनाया हुआ मॉडल सब देखें। तो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए सखि। मगर उसके अभिभावक उसे जाने की इजाजत नहीं दे रहे हैं। यह तो बहुत नाइंसाफी है न सखि।
क्या कहा ? वह बहुत जिद्दी है, उपद्रवी है, अराजक है, असभ्य है, झूठा है। पड़ोसी उसे धूर्त, मक्कार भी कहते हैं। पड़ोसी तो जलते हैं ऐसे होनहार नौनिहालों से। और कौन कह रहा है ये सब ? वही बेईमान लोग तो कह रहे हैं ना ? अरे, जो लोग हिटलर की संतान, सावरकर की औलाद, साइकोपैंथ हैं और खून की दलाली में लिप्त पाए जाते हैं, वे तो कुछ भी कह सकते हैं। मगर ये बच्चा तो खुद को भगत सिंह की औलाद है। क्रांतिकारी अति क्रांतिकारी है। खैराती लोग इसका गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं।
तो ऐसे होनहार बच्चे मुकद्दर वालों को ही मिलते हैं सखि। ये अलग बात है कि इस प्रकार के बच्चे अपने मां बाप की "आंख" में उंगली करते रहते हैं। अपने बाप के बजाय पड़ोसी को बाप बताते फिरते हैं। पर बड़ों को बच्चों को बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए ना सखि। बच्चे तो गलती करते ही रहते हैं। पर क्या बड़ों को बड़प्पन नहीं दिखाना चाहिए ?
और वह अपना मॉडल ही तो दिखाना चाहता है ? तो दिखाने दो उसे अपने मॉडल को। आखिर है क्या उस मॉडल में ? झूठ का पुलिंदा, ख्वाबों की दुकान, रेत का महल, सपनों का संसार, सुनहरे सब्जबाग ! यही ना ? माना कि उसकी मार्केटिंग बड़ी शानदार है। वह गंजों को भी कंघी बेचने में बड़ा माहिर है। उसके जैसा शातिर और कोई नहीं है आज की दुनिया में। फिर भी घर का चिराग तो है ही ना। और घर के चिराग की तो सारी ख्वाहिशें पूरी की ही जाती हैं। सारे अपराध क्षम्य हैं उसके। लो बोलो, मना कर दिया उसे, यह भी कोई बात हुई भला ?
मना कर दिया कोई बात नहीं। पर उनके पीछे सी बी आई, ई डी और ना जाने क्या क्या लगाने की क्या आवश्यकता थी ? ? भला ऐसे भी कोई करता है क्या अपने बच्चों के साथ ? और वो भी कट्टर ईमानदार बच्चों के साथ। उनकी ईमानदारी पर शक करना सबसे बड़ा पाप है सखि। उनकी ईमानदारी ऐसी है सखि जैसे कि काजल की कोठरी। उनकी ईमानदारी, सत्यता तो सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र से भी दो पायदान ऊपर है। उन जैसा सत्यवादी, ईमानदार तो ना भूतो ना भविष्यति। और फिर भी उनको जाने की अनुमति नहीं ? बहुत नाइंसाफी है सखि बहुत नाइंसाफी। इसकी सजा तो मिलनी चाहिए ना अभिभावकों को। देगा, ऊपरवाला जरूर देगा। क्योंकि अब उसी का आसरा है। जनता में तो कलई खुल चुकी है इस बच्चे की।
आज के लिए इतना ही काफी है सखि। कल फिर मिलते हैं।
