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Vandana Kumari

Drama

4.3  

Vandana Kumari

Drama

चिंता

चिंता

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प्रकाश बाबू की नींद उड गई थी। वे आराम कुर्सी पर बैठे थे पर आराम नहीं, चिंता उन्हें खाए जा रही थी,पल पल यह बढ़ती जा रही थी, आज महीना की ईक्कीस तारीख हीं थी और जेब में थे केवल दो सौ रूपये। अभी दस दिन घर चलाना है ,बड़े बेटे को कॉलेज में आवेदन के लिए रूपये चाहिए तो बेटी को स्कूल की फिस भरनी है। छोटा बेटा साईकिल की जिद कर रहा है, कई महीनों से पत्नी के लिए कोई साड़ी नहीं खरीदी सोचा था इस माह रत्ना के लिए एक सूती साड़ी ही खरीद देंगें। पर कुछ भी नहीं हो पाया , इन दो सौ रुपयों में वे इतनी इच्छाएं कैसे पूरी करें, कुछ समझ नहीं आ रहा था।

इन्हीं चिंताओं में खोए थे कि आवाज आई -यूं ही बैठे क्या सोच रहे हैं ? दफ्तर नहीं जाना क्या ? शाम को लौटते वक्त यह सब लेते आइएगा , आवाज उनकी पत्नी रत्ना की थी जो उन्हें एक पुर्जा थमाने पहुँची थी , उनकी चिंता और बढ गई , उन्होने रत्ना से कहा कि ये सारी चीजें तो नहीं आ सकती हैं, तुम ज्यादा जरुरी सामान लिख कर दो|फिर रत्ना ने लिस्ट की लंबाई कम कर दी।

प्रकाश बाबू सरकारी दफ्तर में क्लर्क हैं। वेतन से महीना आराम से गुजर जाता था और कभी कभार सौ पचास बच भी जाते थे। पर इस माह ऐसा नहीं हुआ। उल्टा खर्चा और बढ गया। उनकी माँ गॉव से अपना इलाज कराने शहर में उनके पास आ गई थी। बुढापे में बिमारी यानी ज्यादा खर्च , पंद्रह -सोलह दिन रहने के बाद दवाई कुछ शहरी सामान एवं फिर आने के आश्वासन के साथ गॉव के लिए आज हीं सुबह ट्रेन से निकली हैं।

दफ्तर में भी प्रकाश बाबू खोय खोय रहे। शाम को राशन की दुकान पर जा कर सामान लिया। पुरे एक सौ पॉच रूपये लग गए यानी अब सिर्फ 95 रूपये हीं बचे।

और इतनी सारी जरूरतें! कौन सी जरूरत पहले पूरी करें इसी उधेड़बुन में थे कि एक धक्का लगा और इसी के साथ उनकी चप्पल जो जाने कब से रिटायरमेंट मॉग रही थी, टूट गई। प्रकाश बाबू ने इधर उधर नजर दौड़ाई ,सड़क के दुसरे किनारे पर एक मोची बैठा था।

चप्पल सिलने के बाद मोची ने चार रूपये मांगे। प्रकाश बाबू झुंझलाए, इतनी सी सिलाई के चार रूपये ! खैर, जैसे हीं उन्होने कुर्ते की जेब में हाथ डाला पुरी हथेली कुर्ते से बाहर आ गई |.बात साफ थी, कोई उनकी जेब काट गया था। मोची भी सारी बात समझ गया था, बोला जाओ बाबू जी फिर कभी रुपये दे देना ,बाजार में थोडा ध्यान से चलना चाहिए। प्रकाश बाबू घर आ गए , हाथ मुंह धो कर आराम कुर्सी पर बैठ गए , रत्ना जब चाय लेकर पहुँची तो देखा प्रकाश बाबू नींद में खो चुके हैं |बहुत दिनों बाद उन्हें चिंतामुक्त गहरी नींद आई | जेबकतरा उनके रुपयों के साथ साथ शायद उनकी चिंता भी ले कर दूर चला गया था।


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