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Siddhartha Tiwari

Tragedy


4  

Siddhartha Tiwari

Tragedy


छुट्टे

छुट्टे

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बूढ़े निताई का बदन कल से ही दुःख रहा है। पता नहीं क्या हो गया है। घर बैठे रहा भी तो नहीं जाता। कुछ पैसे मिल जायेंगे तो नन्दिनी को आज भात के साथ आलू चोखा भी खिला पायेगा, यही सोचकर हाथरिक्शा लेकर वह सुबह-सुबह निकल पड़ा। ये नौ बरस की लड़की साक्षात् दुर्गा है, कुछ नहीं मांगती। चुपचाप अपने महीन हाथो से तेंदू पत्तों को गोल घुमाकर बीड़ी बनाती रहती। सुबह से शाम तक में अँगुलियों के पोर-पोर दुखने लगते और पीठ अकड़ जाती तब जाकर तीस रुपये मिलते हैं। निताई चाह कर भी कोई मदद नहीं कर पाता, बुढ़ापे की काँपती उँगलियाँ और किचमिचाती आँख इस बारीक़ काम के लिए नहीं थी। आज हफ्ते भर की बारिस के चलते माल की किल्लत हो गयी है।


टांगो की जगह हड्डियां और हाथ में उभरी नसें। मैला पाजामा और शरीर पर गमझा। इस टोटो के ज़माने में कौन इस सत्तर साल के बूढ़े के चरमराते रिक्शे पर बैठेगा।


लोपामुद्रा का पूरा शरीर पसीने से भर गया है। अभी-अभी मनसा माँ के मंदिर प्रांगड़ से भीड़ में रास्ता बनाते हुए बाहर निकली है वो। चलो पाठा की बलि अच्छे से चढ़ गयी। पूरे बारह हज़ार में वह पाठा आया था। माँ ने ज़रूर ही उसकी पूजा को स्वीकार कर लिया होगा। बहुत खुश है वो। आज तो भात के साथ सरसो डालकर मांस पकाएगी। नालिकुल से उसके भाई का परिवार भी आया है। पर अब चला नहीं जाता। घुटने दुखने लगे थे। डॉक्टर नें वजन तीस किलो कम करने को कहा है। ये मुए टोटो वाले आज ज़्यादा रेट मांग रहे हैं। राज स्वीट्स तक साठ रुपये।


निताई सड़क के किनारे एक अश्लील फिल्म के पोस्टर से पटे दीवाल के पास अपना रिक्शा टिका कर बीड़ी पीते हुए सवारी का इंतज़ार कर रहा था। लोपा के पति ने सड़क के दूसरे किनारे से चिल्लाते हुए पूछा-"ऐ रिक्शा, राज स्वीट्स चलोगे।" निताई ने हाँ में सर हिलाया, गमझे से सीट को झाड़ा। लोपा के पति ने पूछा-"कितना लोगे।" , "पच्चीस रुपये"-निताई ने कहा, हालाँकि वो एक सवारी का भाड़ा था। लोपा बोल उठी-"माँ रे माँ! कितना लूटते हो तुम लोग। अभी कल ही तो पंद्रह रुपये में गयी थी।" निताई का शरीर एड़ी से माथे तक जल उठा। "बैठिये", उसनें कहा। लोपा और उसके पति सीट पर बैठे और बेटी दोनों के पैरों पर।


राज स्वीट्स के पास निताई गमछे से मुँह पोछते हुए उतरा। लोपा ने पर्स खोलकर उसे सौ रुपये दिए। "छुट्टे दीजिये, मेरे पास नहीं हैं", निताई ने कहा। लोपा के पति ने बटुआ खोला पर वहां भी छुट्टे नहीं थे। पचास, सौ, पाँच सौ के नोट थे। बड़ी मुश्किल हुई। राज स्वीट्स की दुकान अभी बंद है। और इतनी सुबह बोहनी के टाइम छुट्टे कोई नहीं देगा। फूलवाले ने भी इंकार कर दिया। लोपा बोली..."जल्दी करो रे बाबा, देखो छुट्टे होंगे, तुम लोग देना नहीं चाहते।" निताई ने अपने मैले पाजामे की दोनों जेबें बाहर निकाल कर दिखा दीं। लोपा के पति ने लोपा के कान के पास जाकर धीरे से कुछ कहा पर लोपा भड़क उठी। उसने अपना पर्स टटोला, उसमे सिक्कों में छः रुपये मिले। लोपा ने उन्हें निताई की तरफ बढ़ाते हुए कहा-"लो इन्हें, गलती तुम्हारी है।" और पति तथा बेटी के साथ तुरंत आगे की ओर बढ़ गयी। निताई वहीँ धम्म से नीचे बैठ गया। 


लालटू की चाय दुकान खुल गयी है। एक-दो कुत्ते इधर-उधर फेंके गए पैकेट में अपनी नाक घुसेड़ रहे थे। निताई ने तीन रुपये की एक छोटी भाड़ वाली चाय पी। तीन दिन बाद मिली ये चाय ने उस बूढ़े के चेहरे की शिकन को कुछ कम किया। निताई एक बीड़ी जलाकर यूँही इधर-उधर हर आते-जाते लोगों में सवारी देख रहा था। चाय दुकान के बगल में ही कूड़े के पास गत्ते के बिस्तर पर एक बुढ़िया अभी-अभी सोकर उठी थी, दोनों हाथों से अपने बाल खुजा रही थी। निताई की नजर उसपर पड़ी। वो थोड़ी देर तक उस बूढी को देखता रहा। फिर वह चाय की दुकान से तीन रुपये का पार्ले-जी का एक पैकेट लेकर बुढ़िया के गत्ते पर रख दिया। बुढ़िया ने उसपर गालियों की बौछार कर दी। सोच रही थी, शायद यह भी गत्ते खीचने वाला है। उसके पोपले मुँह पर गालियां देते समय की भाव-भंगिमा देखकर निताई हँस पड़ा। लालटू ने बूढी के पचके हुए जस्ता के काले गिलास को धोकर उसमे थोड़ी चाय उड़ेल दी।


नंदनी और निताई माड़-भात खाकर सोने का उपक्रम कर रहे हैं। निताई को ज्वर हो गया है। नंदिनी उसके सर को दबा रही है। दबाते हुए उसने खिड़की से देखते हुए कहा, "मनसा माँ के मेले में बड़ी रौनक है।" निताई ने आँख मूंदकर करवट बदलते हुए बोला," हाँ इस बरस भीड़ बहुत ज़्यादा है।"


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