छाते वाला बूढ़ा
छाते वाला बूढ़ा
वो भी क्या दिन थे जब हम छोटे थे और हमारी दादी नानी हमें नित नई नई कहानियां सुना कर सुलाया करती थी, कभी राजा रानी की कहानी तो कभी परियों की।
बचपन आज टैब और मोबाइल में बीतता है पर जो बचपन अपने ग्रैंडपेरेंट्स के साथ बीते उसकी तो कोई तुलना ही नहीं। वह एहसास आज इस भागदौड़ भरे जीवन में किसी वरदान सा लगता है जो आज शहरीकरण में कहीं लुप्त ही हो गया है।
वह दूध सी सफेद उनके बाल, गालों में गड्ढे, आंखों में चश्मा, चेहरे की झुर्रियों में झांकता उनका अनुभव, हर दर्द की दवा थी उनके पास, झट आंचल में छुपा पोंछ देती आंसू, सुना लोकगीत या कहानी कोई हंसा देती थी हमारी दादी नानी।
ऐसी ही एक कहानी याद आ रही है जो आज शेयर कर रही हूं ताकि फिर कोई बचपन इसका रसपान कर सकें।
तो कहानी का शीर्षक है छाते वाला बूढ़ा।
एक बार की बात है किसी गांव में एक छोटे से झोपड़े में एक बूढ़ा रहता था। यह किसी को नहीं पता था की उसके परिजन कहां थे पर उसके झोपड़े की हालत देख कर लगता था कि वह बरसों से अकेला ही है। जगह-जगह से उसका झोपड़ा टूटा फूटा था, पास थी उसके बस एक हांडी , एक खाट और उसका प्यार छाता।उसी हांडी में थोड़ा कुछ बना लिया करता और खुद तो कम ही खाता पर बाकी अपने बेजुबान मित्रों के लिए रख देता। उसके झोपड़े में कुत्ते, बिल्ली , पंछी आकर हर रोज खाना खाते। रात को बूढ़ा अपनी खाट पर अपना छाता खोल कर उसके अंदर ही सोता क्योंकि रात को यदि बारिश होती तो उसके टूटे-फूटे झोपड़े में बारिश की बूंदे रिसने लगती थी। बूढ़े को अपने छाते से बड़ा प्यार था , वह जहां भी जाता अपना छाता साथ लेकर जाता। वैसे लोग उसके छाते का खूब मजाक बनाते क्योंकि उसका छाता किसी सातवें अजूबे से कम न था। बारंबार फटने के कारण बूढ़े ने अपने छाते को जगह-जगह से सिल रखा था।कहीं रंगीन कपड़ो का टुकड़ा तो कहीं छोटी-छोटी लैस तो कहीं पारदर्शी नग लगे हुए थे। दर्जी की दुकान और जनरल स्टोर द्वारा फेंके गए कटपीस और सजावटी उपकरण को समेट बूढ़ा अपने छाते के लिए ले आया करता था।
वैसे कई भले लोगों ने बूढ़े को नया छाता भी देना चाहा पर उसे तो उसका छाता ही प्रिय था शायद किसी की याद बसी थी उस छाते में। बच्चे उसके छाते को देखकर खूब हंसते थे और तब खिलखिलाते बच्चों को देखकर बूढ़े को बड़ा आनंद आता और वह भी उसके साथ खूब हंसता। बच्चे उसे छाते वाला दादू कहकर बुलाते। उन बच्चों के अभिभावक या कोई भी बड़ा उसे कुछ भी देता पैसे या कोई खाने की चीज तो वह उसे सहज मना कर देता पर जब कोई बच्चा उन्हें बिस्कुट, चॉकलेट, पराठे आदि देता तो वह उनका प्रेम अस्वीकार न करता। इस प्रकार व आसपास इलाके में खूब जाने पहचाने जाते थे। यूंही एक बार की बात है दूर राज्य के किसी राजा को छाते वाले बूढ़े के बारे में पता चला तो राजा ने उन्हें तुरंत बुलवा भेजा।
दरअसल राजा की सबसे छोटी बेटी जो महज 8 साल की थी परंतु हर समय उदास रहती थी। हर भरसक प्रयास के बाद भी राजा उसके होठों में मुस्कान ला पाने में असमर्थ रह चुके थे।तो राजा ने अपनी बेटी को छाते वाले बूढ़े से मिलाना चाहा। राजा के महल में आते ही बूढ़े ने उन्हें प्रणाम किया और उसे बुलवाने का कारण जानना चाहा परंतु राजा ने उसे पहले जलपान ग्रहण करने का आग्रह किया।बूढ़ा थोड़ा झिझक रहा था पर तभी राजा की बेटियों ने आग्रह किया, " आइए ना दादू "इस पर बूढ़ा मना न कर पाया। सामने छोटे-छोटे टेबल पर व्यंजन सजे हुए थे- मिठाई , फल, पूरी, सब्जी , खीर , रबड़ी इत्यादि। राजा भी अपनी तीनों बेटियों के साथ खाने के लिए बैठ गए। तभी बूढ़ा हर बार की तरह अपना छाता खोल कर उसकी छांव के नीचे बैठ कर खाने के लिए तैयार हुआ। छाते को देखते ही राजा की छोटी बेटी किलकारी मार कर हंसने लगी और हमेशा की तरह बूढ़ा भी साथ में हंसने लगा, साथ में राजा की दोनो बेटियां भी अपनी बहन को देख खिलखिला रही थी।अपनी बेटियों को यूं हंसता देख, भावविभोर हो राजा भी हंसने लगे। फिर राजा ने बूढ़े को खूब-खूब आभार प्रकट कर उसे उन्हें यहां बुलाने का कारण बताया। बूढ़ा अल्पाहार कर जाने को तैयार हुआ पर राजा ने उन्हें इनाम देने की इच्छा प्रकट की जिसे बूढ़े ने सहज अस्वीकार कर कहा, "बिटिया की मुस्कुराहट का मैं तुच्छ माध्यम बना , इससे बड़ी बात मेरे लिए और कुछ नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए राजन।"तभी राजा की छोटी बेटी अपने खेल खिलौने से कुछ सजावटी उपकरण ला बूढ़े को देती है, "यह लीजिए दादू आपके छाते को इससे सजाना।" बूढ़ा उसे मुस्कुरा कर स्वीकार कर लेता है।
उस दिन महल में जो कुछ भी हुआ उसे एक स्वर्ण परी ने देख लिया था। वह बूढ़े की सच्चाई और अच्छाई से बहुत प्रभावित हुई और दिल से बूढ़े की कुछ मदद करना चाह रही थी। फिर क्या था वह परी बूढ़े के झोपड़े में पहुंच गई और उसने अपनी जादू की छड़ी घुमा कर बूढ़े के झोपड़े की काया ही पलट दी।
उसने झोपड़े को बाहर से वैसा ही छोड़ दिया ताकि किसी को शक ना हो पर अंदर से उसने झोपड़े को महल की तरह सुसज्जित कर दिया। खाट की जगह सुंदर गद्देदार नर्म पलंग लगा दी, पास ही बूढ़े के लिए कुछ नए वस्त्र और एक नया छाता भी रख दिया। एक कोने में अन्न के भंडार और नए बर्तन वगैरह रख दिए, कुछ सजावट से घर को बिल्कुल नया कर परी खुश हो रही थी की यह सब देख कर बूढ़ा कितना खुश हो जाएगा। परी बूढ़े की खुशी देखना चाहती थी सो वह वहीं घर में ही छुप गई। शाम को बूढ़ा थका हारा अपने झोपड़े में आता है पर भीतर जाते ही वह चौक जाता है, पहले तो उसे लगा कि वह गलती से कहीं और आ गया है। पर दो-तीन बार अंदर बाहर कर पाता है कि यह बाहर से तो उसका ही झोपड़ा है परंतु अंदर से नहीं, अंततः दुखी मन से बूढ़ा घर के बाहर जाकर बैठ जाता है। परी यह सब देख रही थी पर बूढ़े को निराश पा वह उसके सामने आकर पूछती है, " क्या हुआ बाबा, आप अंदर क्यों नहीं जा रहे ?" बूढ़े ने कहा "यह मेरा घर नहीं है। " पर परी कहती है "यह आपका ही घर है जिसे मैंने अपने जादू से सुंदर बना दिया है बस।"
बूढ़ा कहता है, " परी रानी मुझे यह सब नहीं चाहिए, ईश्वर ने मुझे जो दिया है मैं उसी में खुश और संतुष्ट हूं, कृपया मेरे घर को पहले वाला झोपड़ा बना दीजिए।"
परी आत्मविभोर हो कहती है, "ठीक है बाबा जिसमें आपकी खुशी। "और फिर परी के जाते ही बूढ़ा अपने घर के अंदर सब कुछ पहले जैसा पाता है और फिर चैन से सो जाता है।
तो बच्चों हमें भी छाते वाले बूढ़े की तरह ज्यादा की लालच न कर , जो है उसी में खुश और संतुष्ट रहना चाहिए। ईश्वर ने हमें जो दिया है उसका सम्मान करना चाहिए क्योंकि आपके पास जो है वह कितनों के पास नहीं होता, यह सदैव याद रखना। दादी द्वारा दी गई कहानी के आधार पर सीख !
