लम्हे जिंदगी के
लम्हे जिंदगी के
वो जेठ की कड़कती दोपहरी थी, जब मेरे पति एक अजीब सी खबर ले कर आए, जिसने मुझे काफी असहज और असमंजस में डाल दिया।दरअसल उनका कोई जिग्री दोस्त हमारे साथ कुछ दिनों के लिए रहने आ रहा था। अपने दोस्त से मिलने की खुशी में वो तो झूम रहे थे, पर मेरा दिमाग न जाने क्या क्या सोच कर दही हुआ जा रहा था। हमारी नई नई शादी थी, इनको किसी बात में ना भी नहीं कर सकती थी,सो मैं खुश होने का नाटक कर दी। पर उस दिन के बाद मेरा दिमाग नित नए नए ख्यालों के बुलबुलों से रोज गरम हो रहा था,चिंता सता रही थी, की हमारी नूतन वैवाहिक जीवन में खलल न पड़ जाए,साथ ही घर की साफ सफाई का काम कितना बढ़ जायेगा, ऊपर से घर का बजट भी कहीं गड़बड़ा न जाए। दिल तो यही चाह रहा था की किसी तरह उसका आना ही कैंसल हो जाए पर.....
खैर सोचते सोचते वो दिन भी आ गया, जब वो महानुभाव घर पधार ही गए। रोहित, लंबा चौड़ा कद काठी,वैसे तो सांवला था पर तीखे नैन नक्श, आकर्षक व्यक्तित्व उम्र यही कोई 25 साल का होगा।आते ही उसने मुझे भाबी और मेरे पति को भैया कह कर प्रणाम किया।काफी संस्कारी बंदा लगा। खैर मैंने भी अपने मन में चल रहे ख्यालों को दबा कर उसका स्वागत किया। पर खुराफाती मन कही योजना बना रहा था की कैसे उसे जल्द ही वापिस भिजवाए।
रोहित, बहुत ही मिलनसार और खूसमीजाज था, अक्सर घर के कामों मे भी मेरी मदद कर दिया करता था।वो किसी समर ट्रेनिंग का कोर्स मैनेजमेंट में करने के लिए आया था। सो एक दिन मैंने तय किया की इस कोर्स से उसका रुझान कहीं और बदल दूं तो वो यहां से शायद खुद ही चला जाए। मैंने उसे बहुत समझाया की इस तरह छोटी मोटी कोर्स कर कोई लाभ नहीं,ये सिर्फ समय और पैसों की बरबादी ही है, और चलो करना ही था तो किसी प्रतिष्ठित संस्थान जैसे IBM कोलकाता या दिल्ली से करते... पर मेरी बात को बीच में ही काटते हुए उसने कहा, भले ही मैंने गलत संस्थान या गलत जगह का चुनाव किया होगा, पर मुझे यकीन है की मैंने ग्रीष्म अवकाश बिताने के लिए घर अच्छा ही चुना है भाभी जी, चटखारे लेते हुए उसने कहा और मैं आगे कुछ ना कह सकी।
वो अपने नित प्रतिदिन के कार्यों में काफी अनुशासित था, हर काम सलीके से करता, जिसकी वजह से उसके खिलाफ कुछ एसी बात भी न मिली की मैं अपने पति को कुछ शिकायत करती ।फिर क्या मुझे थोड़े आड़े टेढ़े चाल चलने पड़े, हालांकि मैं ऐसा चाहती तो ना थी पर क्या करती जैसे बीन शक्कर या कम शक्कर वाली चाय देना, बीन तेल बिन मसाले वाला खाना खिलाना इत्यादि। परंतु आश्चर्य की बात तो ये थी की रोहित बिना कुछ कहे मैं जो देती वो खुशी खुशी खा लेता था।
मेरी हर भरसक प्रयास नाकामयाब रही और धीरे धीरे दिन बीतते चले गए ,तभी एक दिन रोहित ने बताया कि उसका कोर्स अब पूरा हो चुका है, और वो कल वापिस जाने वाला है। उस पल को ऐसे लगा जैसे तप रही धरती पे बारिश की बूंदें गिरी हो ,मेरा मन खुशी से बल्लियों नाचने लगा।
अगली सुबह,रोहित रोज के मुकाबले कुछ देर से उठा। मैं सब्जियां काट रही थी सो उसने खुद ही हम दोनों के लिए चाय बना लिया और मेरे सामने आ कर बैठ गया।इससे पहले की मैं कोई बात शुरू करती औपचारिकता के लिए ही ,वैसे ही उसने बताना शुरू किया की बीती रात मेरे पति और वो देर रात तक बातचीत करते रहे,साथ में शराब का जाम और बचपन, गाँव, पुरानी यादों में वो कैसे खो से गए थे, मैं सुन बस मुस्कुरा रही थी।तभी उसने आंह भरते हुए कहा,"आज जाने का दिन भी आ गया, पता है मैंने भैया से आपके और मेरे बीच चल रहे प्यार के बारे में भी बता दिया,की आप मुझसे कितना प्यार करती हो।"सुन जैसे मुझे 440 वोल्ट का झटका सा लगा, "क्या! तुम पगला गए हो, तुमने ये कैसे....।"इससे आगे कुछ बोले बिना मैं दौड़ पड़ी अपने पति को फोन करने,ऐसे लगा जैसे सब खत्म हो गया हो। रो रो कर मेरा बुरा हाल था,फोन पर भी कुछ ठीक से न कह पाई, कुछ समझ ही नहीं आ रहा था की वो मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे, मैं उन्हे कैसे क्या बोलूंगी।मेरा वैवाहिक जीवन खत्म,ये सोच मेरी तो पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई जैसे।
आधे घण्टे में मेरे पति भी अपना सारा काम काज छोड़ घर भी आ गए। वो थे भी तो शुरू से "caring" पति। इससे पहले की वो मुझसे कुछ पूछते तब तक, रोहित अपना बैग लेकर आ गया। मेरे पति ने उससे पूछा की वो तो शाम को जाने वाला था, फिर अभी क्यों?रोहित ने बताया कि रास्ते में उसे कुछ काम है,इसलिए वो अभी ही निकल रहा है, और आगे बढ़ कर उसने मेरे पति को गले लगा लिया," भैया,आप दोनों की बहुत याद आयेगी ,ये छुट्टियां मुझे हमेशा याद रहेगी,खास कर भाई -बहन का प्यार, जो मैंने और भाभी ने आपस में इन दिनों में साझा किया वो। मेरी कोई बहन नहीं थी पर यहां आकर वो कमी भी पूरी हो गई। उन्होंने मेरा बहुत ख्याल रखा बिलकुल घर जैसा। पता नहीं भाभी को कैसे पता चला की मुझे रक्तचाप की समस्या है जिसके कारण उन्होंने मेरे खाने पीने का विशेष ध्यान रखा बिलकुल बड़ी दीदी की तरह।" ये सब सुन कर मैं दंग ही रह गई।मन में मिश्रित भाव आ रहे थे उस पल, खुशी भी थी, दुःख भी था, ग्लानि भी और अफसोस भी।आंखो में आंसू थे, होंठ में सॉरी पर कह कुछ ना पाई। रोहित ने आगे बढ़ मेरे पांव छुए आशीष लेने के लिए। उसने कहा," आज से मैं आपको भाभी नहीं दीदी कहूंगा"। मैं भी मुस्कुरा कर उससे कह पड़ी ,"अगली बार फिर जरूर आना।"
अलविदा कह कर वो अपने घर को रवाना हुआ, मेरे पति भी उससे बात करते हुए संग ही ऑफिस को निकल पड़े। मैं घर में अकेली सोचती ही रह गई,एक पल में क्या था और दूजे पल क्या...अक्सर हम जो सोचते है वो सही हो, वो जरूरी नहीं। रोहित ने जो मज़ाक किया था, उससे कहीं बुरा तो वो था जो मैंने उसके साथ किया, पर फिर भी जाते जाते उसने जो प्यार- सम्मान मुझे दिया उसकी तो मैं हकदार भी नही थी। मन ही मन में मैंने उससे माफी मांग ली, और फिर कभी किसी के साथ ऐसा व्यवहार न करूंगी ऐसा ठान लिया। मेरे पति भी काम के उलझन में मुझसे पूछना भूल ही गए की मैंने उन्हें सुबह फोन क्यों किया, और मैंने भी इस बात को किसी को न बताना ही उचित समझा। उसके बाद सच में मेरे और रोहित के बीच एक प्यारा सा भाई बहन वाला रिश्ता बन गया, वो अक्सर हमारे साथ समय बिताने आ जाया करता था। अपने मन की हर बात बताता था, हालांकि मैं अक्सर जानने की कोशिश करती रहती की क्या रोहित को सच का पता था या नहीं ,पर उसने मुझे कभी कुछ पता चलने ही नहीं दिया।
ये लम्हा मेरी जिंदगी का यादगार है,जिसे मैं कभी भूल न पाई।इस पल में जो मैंने सीखा जो मैने पाया, वो दोनो ही मेरे लिए अनमोल रहे।
