बाऊजी ने कहा था-भाग १८
बाऊजी ने कहा था-भाग १८
कभी कभी बाऊजी के साथ हम सब शुक्रताल ज़ाया करते थे, गंगा स्नान के लिये। वहॉं आकर्षण की दो मुख्य चीज़ें थीं - गंगा का किनारा और शुकदेव जी का टीला।
शुकदेव जी का टीला वह जगह थी,जहॉं राजा परीक्षित को श्री व्यासदेव के वीतराग पुत्र शुकदेव जी ने श्रीमद्भागवत जी की अमृत कथा सात दिनों तक सुनाई थी। राजा परीक्षित को तक्षक नाग द्वारा काटे जाने का शाप एक अनजाने में किये अपराध के लिये शमीक ऋषि के पुत्र शृंगी ऋषि ने दिया था। तभी गंगा किनारे यह कथा सुनाई गई थी। उस समय वह टीला कच्चा था और उसके ऊपर प्राचीन वट वृक्ष था और मन्दिर था। यह वटवृक्ष व मन्दिर अभी भी है ।टीले के ऊपर तक जाने के लिये सीढ़ियॉं बनीं थीं जो तब कच्ची थीं, मिट्टी की थीं, सीमेण्ट से पक्की तो बाद में बनी। टीला भी बाद में पक्का हुआ और अब तो वहॉं काफ़ी निर्माण हो गया है, जो तब नहीं था। इस जगह का बड़ा ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व है।
टीले के ऊपर दर्शन के लिये हम सब रोज़ ही ज़ाया करते थे। हम सब बच्चे और मॉं व चाची जी साथ होती थीं, जो धीरे- धीरे चढ़ती थीं, पर हम सब उछलते कूदते जल्दी जल्दी चढ़ जाते थे, वह भी सीढ़ियों से नहीं, बल्कि सीढ़ियों के बग़ल से। ऊपर जाकर हम देखते की मॉं, चाची जी धीरे धीरे हॉंफते हुए आ रही हैं, सॉंस फूल रहा है। हम सब तीन - चार बार ऊपर चढ़कर उतर भी आते थे, पर उनके लिये एक बार चढ़ना भी भारी होता था। तब हमको समझ नहीं आता कि बड़े लोगों को सीढ़ियॉं चढ़ना इतना मुश्किल क्यों होता है।
गंगा किनारे हमारा डेरा लगता था। वहॉं से टीला भी पास था और गंगा जी के भी दर्शन भी होते रहते थे। डेरा बहुत बड़ा और आरामदायक होता था। उनमें कितने ही कमरे होते थे। सबके ठहरने की व्यवस्था थी। ज़मीन पर पुआल बिछाकर गद्दे लगाकर चादर बिछा दी जाती थी। एक बड़ा सा हॉल सा कमरा था, जहॉं सब मिल बैठकर गपशप करते रह सकते थे। खाना बनाने के लिये रसोई की अलग जगह थी। हमारा रसोइया व सेवक गण साथ चलते थे, इसलिये किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी। सबका अवकाश का समय रहता था। रोज़ सुबह जाकर स्नान कर आते थे। पीने के लिये गंगाजल था। तब गंगा का नीर निर्मल हुआ करता था, पीने लायक़ था।
एक बार बाऊजी एक बस में सब नज़दीकी रिश्तेदारों को भी लेकर शुक्रताल गये। साथ में हमारी छोटी माँजी और बड़ी मॉंजी भी गईं। सभी लोग डेरे में ठहरे। यह बहुत बड़ा तम्बू था, जिसे हम डेरा कहते थे।
जीजी ने सबके खूब फ़ोटो खींचे थे गंगा में नहाते हुए, बैलगाड़ी में बैठे हुए, हाथी पर बैठे हुए। वहॉं जाकर हम लोग बैलगाड़ी में बैठकर भी घूमे थे ।हाथी पर चढ़ने का भी आनन्द लिया था। फ़ोटो खींचने में जीजी निष्णात थीं। उनके पास बॉक्स कैमरा था,जो भैया ने उन्हें उपहार में दिया था। तब वह केवल पॉंच रुपये का आया था। पर फ़ोटो उससे बहुत अच्छे आते थे।
उस दिन बड़ी मॉंजी व छोटी मॉंजी भी गंगा नहाने गईं थीं।उन्होंने गंगा स्नान किया। फिर हुआ कि वे थोड़ी देर नाव पर बैठकर गंगा में नौका विहार करेंगी और जल चढ़ायेंगी व पूजा करेंगी। । घाट पर बहुत सी नावें थी। एक अच्छी सी नाव देखकर ठीक करी और दोनों मॉंजी उसमें बैठीं। उनके साथ दो- चार और भी जन बैठे होंगे पर अब उनका ख़्याल नहीं है।
वे लोग नौका में कुछ दूर तक गंगा में गए, जल चढ़ाया, पूजा की,फिर लौटने लगे। हम सब किनारे पर खड़े हुए देख रहे थे। किनारे पर आकर नाव लगने वाली थी, पर एकाएक न जाने क्या हुआ कि फिर नाव गंगा में बह चली। मल्लाह नाव किनारे लाने की कोशिश कर रहे थे, पर सफल नहीं हो पा रहे थे। गंगा की तेज धार थी। नाव किनारे आते -आते गंगा की धारा में दूर चली गई। हम सब किनारे पर खड़े रोने रोने को हो रहे थे। बाऊजी भी चिन्ताग्रस्त हो रहे थे, पर हम लोगों को समझा भी रहे थे कि "नाव लौट आयेगी, मॉंजी ठीक हैं।"
नाव को लौटाने में दोनों मल्लाहों को काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी, पर नाव डेढ़ -एक घंटे में लौटा ली गई, किनारे आकर लग गई। हम सबकी जान में जान आई। वह डेढ़ घंटा बड़ा लम्बा युग लगा। ख़ुशी से ऑंखों में ऑंसू छलक आये। भगवान् को सबने बहुत बहुत धन्यवाद दिया, भगवान् ने बहुत रक्षा करी।
उस दिन गंगा में नाव का बहना स्मृति में अंकित हो गया। कभी कभी अचानक ऐसा घट जाता है, जिसकी कल्पना भी नहीं होती और भुलाये नहीं भूलता। पर दोनों मॉंजी का भगवान् की कृपा पर असीम विश्वास था। वे निश्चिन्त मन से राम नाम जप रहीं थीं। ईश्वर पर असीम विश्वास सब कठिनाइयों में भी शक्ति देता है, मन का संतुलन बना रहता है। शुक्रताल में बाऊजी के बाद से जाना एक तरह से समाप्त ही हो गया अब उसकी यादें ही स्मृति में हैं । कभी कभी बाद में गये भी हैं तो टीले का दर्शन कर और गंगा का दर्शन कर लौट आये हैं।
