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असफलता का मानदंड

असफलता का मानदंड

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"तुम नहीं समझोगे !

तुम नहीं समझ सकते !

तुम कैसे समझ सकते हो जब आज तक अपनी पूरी ज़िंदगी में तुमने असफलता नहीं देखी !

तुम हमेशा ही अच्छे अंको से पास/उत्तीर्ण हुए हो,

तुम क्या जानो असफलता का दर्द !"

किसी के मुख से निकले ये शब्द उसके मन को अंदर ही अंदर कचोट रहे थे जैसे किसी ने दिल पे वार किया हो।

दिल पर बातों से लगे आघातों ने अश्रुओं को आँखों से चेहरे पर लाने में समय नहीं लिया। अब मन में लगातार सवाल उठ रहे थे, मस्तिष्क अनेकानेक प्रश्नों से क्रीड़ा कर रहा था।

मानो हज़ारो सवाल किसी ने एक साथ पूछ लिए हो और एक का भी जवाब नहीं।

फिर अचानक प्रश्नों से भरे मन ने एक अावाज़ दी कि असफलता का मापदंड केवल शिक्षा में उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण होने से नहीं मापा जा सकता।

असफलता ज़िंदगी के किसी भी पड़ाव, किसी भी हिस्से में कभी भी दस्तक दे सकती है।

जैसे कि किसी एक का अपने किसी नज़दीकी को खो देना और उस दुःख पे काबू न कर पाना।

जैसे कि किसी का अपनी माँ को खुश करने के लिए जीना पर माँ के चेहरे पे हसीं न होना या फिर कोई और...।

ये सब भी असफलता है जो शिक्षा में मिली असफलता से कहीं अधिक बड़ी और व्यापक है।

तो क्या इन असफलताओं का कोई दर्द नहीं, कोई मोल नहीं ?

क्या यह कहना उचित है कि तुम नहीं समझ सकते क्योंकि तुमने शिक्षा में असफलता नहीं देखी...?


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