अर्थ
अर्थ
कितना सार्थक रहा, शिक्षित होना ? आज ऐसे प्रश्न मन में उठ ही नहीं रहे, मन को इतना भारी कर रहे हैं कि साँस लेना मुश्किल हो रहा है।इस भारी मन से विनीता, अपने भाई के पास आकर बैठ जाती है।
विनीता और उसके भाई की कोई ख़ास बात नहीं हुआ करती थी। बचपन की कुछ यादों को छोड़ उनके पास बात करने को कभी भी कुछ नहीं हुआ करता था। आशु, विनीता से कोई चार- पाँच साल छोटा था। आशु पढ़ाई में बहुत अच्छा था। पिता के स्वर्गवास के बाद आशु अपने आप में रहने लगा था। विनीता भी कुछ सालों बाद विवाह बंधन में बंध अपने ससुराल जा, वहाँ की हो के रह गई थी।
विनीता के पति ज्ञानेश्वर बहुत ही शालीन व्यक्ति थे। परन्तु विनीता के मायके को लेकर उनका नीरस व्यवहार, विनीता को बहुत खलता था।वहीं आशु भी ज्ञानेश्वर के शुष्क व्यवहार को देखते हुए, बहन के घर ना के बराबर ही आता था। समय यूँ ही व्यतीत हो रहा था कि एक दिन माँ कीं चिट्ठी आती हैं की आशु लखनऊ में शिक्षा विभाग में बड़ा अफ़सर हो गया है। विनीता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा जैसे पिता के जाने के बाद जिन ख़ुशियों ने घर से मुँह मोड़ लिया था, वो अब वापस आ गईं हैं। कुछ दिनों बाद खबर आई की माँ बहुत बीमार हैं।
विनीता बिना देरी किये मायके के लिए निकल पड़ी, उसकी कितनी इच्छा थी कि ज्ञानेश्वर भी उसके साथ चले परन्तु वह स्टेशन तक छोड़ वापस आ गये।आज बिमार माँ के पास केवल ये भाई बहन ही थे। कल माँ डिस्चार्ज होने वाली हैं, नर्स डिस्चार्ज समरी दे गई है।आशु जैसे ही आया, विनीता ने उसे बिल दे दिया।
अब माँ के स्वास्थ्य में सुधार है, पिछले बीस दिनों से वह यहाँ है।कितना ही तो खर्च हुआ होगा। पर, वह आशु का ज़रा सा हाथ ना बँटा सकी। माँ ने,उसमें और आशु में कभी कोई भेद नहीं किया, पर आज उसे अपने पर बहुत ग्लानि हो रही थी, वह आज बस बेटी बनी बैठी है।अपनी पढ़ाई पर हुए माँ के खर्च का ये ऋण उतारा था उसने।एक अपराधी सा भाव उसे जकड़ रहा था कि इतने में आशु बोल पड़ा " दीदी कितना अच्छा है कि आप हो, नहीं तो मैं माँ को अकेले कैसे सम्भाल पाता "? उसके इन शब्दों में विनीता में नये प्राण फूंके। अब वह भी अपनी शिक्षा का सदुपयोग करेगी, जिससे उसे अपने अपनों के लिये करने में सोचना ना पड़े।
