Shyama Rao

Inspirational


3.8  

Shyama Rao

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अजेय

अजेय

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“आप तो बातें करतीं हैं न उस लड़के से, समझाइए न कि अपने धर्म की कोई लड़की ढूँढ ले और खुश रहे l आपकी बात को वो नहीं टालेगाl” मकान मालकिन ने दादी से कहा l दादी ने सर हिला दिया l क्या करती ? आखिर किरायेदार जो थीं l विरोध करें तो खुद पर मुसीबत आ जाती l 

 शिक्षा के नाम पर सिर्फ़ दूसरी कक्षा तक ही तो पढ़ाई हुई दादी की l पढ़तीं भी कैसे ? सात वर्ष की उम्र में ही विवाह हो गया l उन दिनों बालविवाह आम बात थी l पति उम्र में काफ़ी बड़े थे पर सही मायने में संरक्षक थे l उन्हें शेक्सपियर की किताबें पढ़कर सुनाते l खाना बनाना आता नहीं था सो वे स्वयं खाना बनाकर दफ़्तर जाते l 

दादी ने कभी तंगी का रोना नहीं रोया l हालत कैसी भी रही हो , खुश थीं l उन्हें सहगल पसंद था l दादाजी ने एक तस्वीर लाकर दी l दिन-रात साथ में रखतीं l फिर दादाजी को ईर्ष्या होने लगी l पर कुछ न बोलते l उनका बचपना को भी समझते थे l दादी ने भी हर सुख-दुख में खूब साथ दिया l कितना पवित्र था दोनों का प्यार l यही प्यार ही वह कारण था जो वह सबके सामने एक ज़िंदादिल महिला बनीं रहीं l 

बच्चों की मोहल्ले में लड़ाई होती तो तुरंत पहुँच जाती पंचायत करने l मज़ाल थी किसी की जो उनके बेटे-बहू पर ऊँगली उठाए l बहू से उनका अलग ही नाता था l लायब्रेरी की किताबें हों या नई फ़िल्में दोनों की लंबी चर्चा होतीं l रसोई में सब्जी के जल जाने पर ही उनकी चर्चा पर विराम लगता l फिर खाने की मेज़ पर बहू को बच्चों के तानों से बचाने की जिम्मेदारी भी लग जाती l  

घर ही क्या मोहल्ले में भी सबकी दादी थी l इसलिए तो मकान मालकिन अपनी समस्या लेकर आई थीं l उनकी बेटी ने एक मुसलमान लड़के से विवाह कर लिया था l अब दादी क्या करतीं ? दबी आवाज में समझाने का प्रयत्न किया l “आप तो भाग्यशाली हो कि इतना शरीफ दामाद मिला है l आजकल तो ढूँढने पर भी इतना अच्छा बंदा न मिले l”

 “वह तो राजी न होंगे”- अब मकान मालकिन ने अपने पति का हवाला दे दिया l 

उधर बेटी -दामाद भी रास्ते में दादी को पकड़ लिया l बाकायदा पैर छुआ और कहने लगे - “अब आप ही हमारी शादी को बचाइए दादी l हम अलग नहीं हो सकते l पिताजी को मनाइए l” वैसे दादी उनके प्रेम की पींगें बढ़ते देख चुकी थीं, मज़े भी लेती थीं l परंतु अब वह भावुक हो गईं l उन्हें खूब आशीर्वाद दिया l कहने लगीं - जब तक मैं हूँ आपको किसी से डरने की जरूरत नहीं l “हमेशा जहाँ जाओ,साथ में रहना l” सलाह मान ली गई l 

इधर वे मकान मालकिन से कहने लगी - “मैंने तो खूब समझाया दोनों मान ही नहीं रहे l” फिर दादी दोनों पक्षों के बीच संवाद का माध्यम बन गईं l अपनी ओर से दोनों के बीच सामंजस्य बैठाने की पूरी कोशिश में लग गईं l अब बहू भी समझाती कि गैरों के मामलों में न पड़े , घर में भी बेटियाँ हैं l 

खैर, नवजोड़े के परिवार में नया सदस्य आने की खबर से माहौल संभल गया l दोनों पक्षों में मिलाप हो गया और दादी को इसका भरपूर श्रेय मिला l 

उन्हें अशिक्षित कहना तो उचित न होगा l आधुनिक विचारों की थीं l कई भाषाएँ पढ़ लेती थीं l अपने अपाहिज बेटे के लिए चिंतित तो थीं पर कभी जतलाया नहीं l अपने दुख भूलकर दूसरों में खुशियाँ बाँटी और अपना जीवन सार्थक बनाया l अजेय थीं वह l 

 


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