अगर जानवर बोल पाते...?
अगर जानवर बोल पाते...?
अगर जानवर इंसानी भाषा में अपनी बात कह पाते, तो यह दुनिया पूरी तरह से बदल जाती और वह हर एक पल जो आज हमारे लिए सामान्य है, एक गहरे नैतिक संकट में बदल जाता। कल्पना कीजिए कि जिस समय कोई कसाई किसी जानवर पर कुल्हाड़ी उठाता और वह जानवर चीखने के बजाय साफ़ शब्दों में अपनी जान की भीख माँगता या अपने बच्चों का ज़िक्र करता, तो शायद ही कोई इंसान उसे मारने की हिम्मत जुटा पाता। मांस उद्योग और कसाई खाने एक ही दिन में बंद हो जाते क्योंकि तब जीव केवल ‘भोजन’नहीं, बल्कि संवाद करने वाले ‘व्यक्तित्व’ बन जाते। हमारी थाली में रखा हर निवाला हमसे सवाल करता, जिससे पूरी मानव सभ्यता एक गहरे अपराधबोध और शर्मिंदगी के साए में आ जाती।
जानवर बोल पाते, तो वे इंसान की आस्था को आईना दिखाते। इंसान के ‘विश्वास’ और ‘ईश्वर की परिभाषा’ पर सवाल उठाते। वे सवाल करते कि सृष्टि का रचयिता अपनी ही संतान के खून से कैसे खुश हो सकता है? वे इंसान को समझाते कि सच्चा धर्म करुणा में है, हिंसा में नहीं। उनकी दलील होती कि मनुष्य को अपने अहंकार और बुराइयों की बलि देनी चाहिए, न कि एक बेज़ुबान मासूम की। उनकी आवाज़ ‘पवित्रता’ के नाम पर किए जाने वाले क्रूर पाखंड को खत्म कर देती और धर्म को सही मायने में अहिंसक और आध्यात्मिक बना देती।
शहरों के बीच बने चिड़ियाघर और सर्कस जैसे मनोरंजन के केंद्र जेलों की तरह लगने लगते, जहाँ पिंजरों में कैद जीव हर पर्यटक से अपनी आज़ादी की गुहार लगाते और अपनी उदासी का विस्तार से वर्णन करते। तब हम उन्हें मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बंधक बनाए गए निर्दोष कैदी समझते। कानून की किताबों को रातों-रात बदलना पड़ता, जहाँ पशु अधिकारों को मानवाधिकारों के बराबर का दर्जा देना अनिवार्य हो जाता। अदालतों में गवाह के तौर पर जानवर मौजूद होते और इंसानों द्वारा किए गए हर छोटे-बड़े अत्याचार का हिसाब माँगा जाता।
जंगली जानवर हमें उन जंगलों और नदियों की बर्बादी की वो दर्दनाक दास्तां सुनाते जिसे हमने विकास के नाम पर उजाड़ दिया है। वे हमें याद दिलाते कि हमने उनके घर छीनकर उन्हें बेघर कर दिया है और अब वे हमसे बस इतनी सी जगह माँग रहे हैं जहाँ वे शांति से सांस ले सकें। अंततः, जीवों की आवाज़ हमें यह एहसास कराती कि इंसान इस धरती का मालिक नहीं, बल्कि एक ऐसा हिस्सा है जिसने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया है। उनकी आवाज़ हमें और अधिक संवेदनशील, करुणामयी और वास्तव में ‘इंसान’ बनाने का काम करती, जहाँ संवाद केवल शब्दों का नहीं बल्कि आत्माओं का होता।
अगर जानवर बोल पाते, तो वे इंसान के बनाए कानूनों को सरासर अन्यायपूर्ण और पक्षपाती ठहराते। वे तर्क देते कि प्रकृति का कानून हर जीव को समान रूप से स्वतंत्र पैदा करता है, लेकिन इंसान ने अपने स्वार्थ के लिए उन्हें ‘संपत्ति’ या ‘वस्तु’ घोषित कर दिया है। वे इंसान को चुनौती देते कि जिस जीवन को वह स्वयं रच नहीं सकता, उसे कानून की आड़ में छीनने का उसे कोई नैतिक अधिकार नहीं है। तुम्हारे कानून में इंसान की हत्या पाप है, लेकिन हमारी हत्या व्यापार? यह न्याय नहीं, केवल तुम्हारी ताक़त का प्रदर्शन है। उनके अनुसार, प्रकृति का नियम केवल ‘ज़रूरत’ और ‘संतुलन’ पर चलता है, जबकि इंसानी कानून ‘लालच’ और ‘क्रूर व्यापार’ को संरक्षण देता है। वे न्याय के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाते कि क्यों एक मनुष्य की हत्या अपराध है, जबकि करोड़ों बेगुनाह जीवों की हत्या को कानूनी और औद्योगिक रूप दिया गया है। अंततः, वे चेतावनी देते कि इंसान ने प्रकृति के सर्वोच्च नियमों का उल्लंघन करके खुद के विनाश की नींव रखी है, क्योंकि जब प्रकृति का न्याय शुरू होगा, तो इंसान का बनाया कोई भी कृत्रिम कानून उसे बचा नहीं पाएगा।
ऐसी परिस्थिति में इंसान एक अभूतपूर्व मानसिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजरता। सबसे पहले तो मानव जाति के भीतर एक बहुत बड़ा विभाजन पैदा होता। समाज का एक बड़ा हिस्सा, जो संवेनशील है, तुरंत शाकाहार अपना लेता और जानवरों की मुक्ति के लिए आंदोलनों पर उतर आता। वहीं, दूसरी ओर वे लोग होते जिनका व्यापार और जीवन पूरी तरह पशु उत्पादों पर टिका है, वे शायद इसे एक ‘तकनीकी समस्या’ या ‘प्रकृति का दोष’ बताकर अपने स्वार्थ को सही ठहराने की कोशिश करते। इंसान को अपनी पूरी जीवनशैली (Lifestyle) बदलनी पड़ती। चमड़े के जूते, रेशमी कपड़े और डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल करना भारी नैतिक दबाव का कारण बनता क्योंकि अब वह वस्तु नहीं, बल्कि किसी बोल सकने वाले जीव का हिस्सा होती। मनोवैज्ञानिक रूप से इंसान भारी तनाव और अपराधबोध (Guilt) में जीने लगता। जब गलियों में घूमते जानवर अपनी भूख या बीमारी का हाल शब्दों में सुनाते, तो उन्हें नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन हो जाता।
तथ्यात्मक रूप से देखा जाए तो जानवरों पर होने वाले अत्याचार की सबसे बड़ी वजह उनका ‘मूक’ (बोल न पाना) होना ही है। उनकी बेजुबानी इंसान को एक ऐसा ‘हथियार’ दे देती है जिसका इस्तेमाल वह अपनी क्रूरता और लालच को छिपाने के लिए करता है। इंसान जानवरों पर अत्याचार इसलिए कर पाता है क्योंकि वे अपना दर्द शब्दों में बयान नहीं कर सकते, वे अपनी रक्षा के लिए अदालतों में अर्जी नहीं लगा सकते और न ही वे इंसानी समाज के खिलाफ कोई संगठित विद्रोह कर सकते हैं। उनकी चीखें और छटपटाहट इंसान को सुनाई तो देती है, लेकिन वह उन्हें ‘भाषा’ नहीं मानता, इसलिए उन्हें अनसुना करना आसान हो जाता है। अगर जानवर आज बोलने लगते और अपनी पीड़ा को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते, तो इंसान के पास अपनी क्रूरता के लिए कोई तर्क नहीं बचता। तब उन्हें काटना या कैद करना ‘भोजन’ या ‘व्यापार’ नहीं, बल्कि ‘अपराध’ और ‘पाप’ की श्रेणी में आ जाता।
अंततः, जानवरों की खामोशी ने ही इंसान को यह झूठा भ्रम दिया है कि वह इस धरती का इकलौता मालिक है और बाकी सब उसके उपभोग के लिए हैं। उनकी बेजुबानी का फायदा उठाकर इंसान ने न केवल उनके शरीर को, बल्कि उनकी आत्मा और आजादी को भी गुलाम बना लिया है।
एक आदर्श इंसान के तौर पर जानवरों के प्रति हमारी जिम्मेदारी बहुआयामी है। यदि हम इसे पूर्णता में समझें, तो हमें हर स्तर पर निम्नलिखित बदलाव और कार्य करने चाहिए:
इंसानियत और संवेदनशीलता के तौर पर
सबसे बुनियादी व्यवहार यह होना चाहिए कि हम उन्हें ‘वस्तु’के बजाय ‘प्राण’ समझें। इंसानियत का तकाजा है कि हम उनके सह-अस्तित्व को स्वीकार करें, यानी यह धरती जितनी हमारी है, उतनी ही उनकी भी है। हमें अपने दैनिक जीवन में ‘करुणा’ को प्राथमिकता देनी चाहिए। व्यावहारिक स्तर पर एक संवेदनशील व्यक्ति को ‘जीओ और जीने दो’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए। हम अपने भोजन, पहनावे और जीवनशैली से ऐसी चीजों को कम या खत्म कर सकते हैं जिनके पीछे किसी जीव की चीख या खून छिपा हो। सड़कों पर रहने वाले जीवों के लिए भोजन और पानी का प्रबंध करना, घायल पशुओं का उपचार कराना या बस उनके प्रति हिंसक न होना भी बड़ी मानवता है। हमें अपनी जीवनशैली को ऐसा बनाना चाहिए जिससे किसी जीव को कष्ट न हो।
कानूनी और सामाजिक कर्तव्य के रूप में
एक नागरिक के तौर पर हमें पशु अधिकारों के कानूनों का सम्मान करना चाहिए और उनके उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि संविधान के तहत भी जीवों के प्रति दया रखना हमारा मौलिक कर्तव्य है। हमें उन उद्योगों और उत्पादों का बहिष्कार करना चाहिए जो जानवरों पर क्रूरता (जैसे लैब टेस्टिंग या फैक्ट्री फार्मिंग) पर आधारित हैं। समाज में पशु क्रूरता के खिलाफ जागरूकता फैलाना और एक न्यायपूर्ण तंत्र की मांग करना हमारा कानूनी दायित्व है।
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से
तमाम धर्मों का मूल सार ‘अहिंसा’ और ‘दया’ है। आध्यात्मिक तौर पर हमें ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ (सभी जीवों में अपनी ही आत्मा देखना) के सिद्धांत को जीना चाहिए। धर्म हमें सिखाता है कि बलि या हिंसा कभी परमात्मा की राह नहीं हो सकती। सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति वही है जो हर जीव में ईश्वर का अंश देखता है और उनकी सेवा को ही अपनी पूजा मानता है। हमें धर्म के नाम पर होने वाली कुरीतियों को त्यागकर प्रेम के मार्ग को चुनना चाहिए।
महापुरुषों के वचन और दर्शन के तौर पर
महात्मा गांधी ने कहा था कि “किसी राष्ट्र की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।” बुद्ध और महावीर के दर्शन हमें सिखाते हैं कि ‘जीओ और जीने दो।’ महापुरुषों के अनुसार, ज्ञान का अर्थ ही यह है कि आप दूसरों के दुख को महसूस कर सकें। हमें इन महान विचारों को केवल किताबों तक सीमित न रखकर अपने आचरण में उतारना चाहिए।
वैज्ञानिक और पारिस्थितिक नजरिए से
विज्ञान कहता है कि पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) का हर जीव एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि हम जानवरों पर क्रूरता करते हैं या उनकी प्रजातियों को नष्ट करते हैं, तो हम अंततः अपने ही विनाश का कारण बनते हैं। पर्यावरण के संतुलन के लिए जीवों का स्वतंत्र रहना अनिवार्य है। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध है कि जानवर दर्द और भावनाएं महसूस करते हैं, इसलिए उन्हें यातना देना तर्कहीन और विकास विरोधी है।
निष्कर्ष
एक आदर्श इंसान वह है जो अपनी बुद्धि और शक्ति का उपयोग निर्बलों के शोषण के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा के लिए करता है। हमें अपनी थाली से लेकर अपनी सोच तक, हर जगह ‘अहिंसा’ को स्थान देना चाहिए।
संक्षेप में, उनके साथ हमारा व्यवहार वैसा ही होना चाहिए जैसा हम खुद के लिए चाहते हैं— स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान से भरा हुआ।
