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Pravesh Sinde

Others Children

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दरवाजा खुला था, पर उड़ने की हिम्मत मर चुकी थी…

दरवाजा खुला था, पर उड़ने की हिम्मत मर चुकी थी…

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दरवाजा खुला था, पर उड़ने की हिम्मत मर चुकी थी…
अनुशासन के नाम पर बचपन का कत्ल

हमारे आस-पास ऐसे कई लोग होते हैं जो बाहर से मुस्कुराते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर एक ज़िंदा लाश बन चुके होते हैं। मैं यहाँ अपने एक परिचित के वास्तविक जीवन की सच्ची कहानी साझा कर रहा हूँ। बचपन के टॉक्सिक माहौल, 10 साल लंबे खामोश डिप्रेशन, ‘लर्नड हेल्पलेसनेस’ (सीखी हुई लाचारी) और ओसीडी (OCD) के जिस भयानक चक्रव्यूह को उन्होंने झेला है, उसे मैंने काफी करीब से महसूस किया है।

इस लेखन का मकसद उनकी इस अनकही दास्तान को शब्दों में पिरोना है, ताकि दुनिया यह समझ सके कि ‘अनुशासन’ के नाम पर बच्चों का मानसिक कत्ल कैसे होता है। ज़ख्म सिर्फ वो नहीं होते जहाँ से खून बहे। आइए, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनें और चारदीवारी के पीछे दफन इन आवाज़ों को पहचानें।

एक कमरे की खिड़की के पास एक पुराना लकड़ी का पिंजरा रखा था। उसमें एक छोटी चिड़िया रहती थी। सालों से वह उसी पिंजरे में बंद थी। पिंजरे का मालिक रोज़ उसे दाना-पानी देता, और वह बस अंदर बैठकर बाहर की दुनिया को देखती रहती। वह अक्सर सोचती कि काश यह कैद खत्म हो जाए और वह खुले आसमान में पंख फैलाए।

एक दिन, मालिक पिंजरे का दरवाजा ठीक से बंद करना भूल गया। हवा के एक झोंके से पिंजरे का पूरा दरवाजा खुल गया। सामने खुली खिड़की थी और खिड़की के पार अनंत, खूबसूरत नीला आसमान।

उसने देखा। आज उसकी आज़ादी उसके ठीक सामने थी। कोई रोक-टोक नहीं थी। उसने पिंजरे के मुहाने पर आकर बाहर झाँका। लेकिन जैसे ही उसने सामने फैले असीम आसमान को देखा, अचानक उसके दिल में एक अजीब सा डर बैठ गया।

वह सोचने लगी— “क्या मैं इतनी दूर उड़ पाऊँगी? अगर रास्ते में कोई बाज मिल गया तो? अगर मुझे दाना न मिला तो? मैं तो इस छोटे पिंजरे की आदी हो चुकी हूँ।”

वह कई घंटों तक खुले दरवाजे को देखती रही। उसके पंखों में जान तो थी, लेकिन सालों की गुलामी ने उसके मन के हौसले को तोड़ दिया था। सच ही तो था—दरवाजा तो खुला था, पर उड़ने की हिम्मत मर चुकी थी। उसने धीरे से कदम पीछे हटाए और वापस पिंजरे के कोने में जाकर बैठ गई।

यह कहानी किसी काल्पनिक उपन्यास का पन्ना नहीं है, बल्कि हमारे ही समाज की भीड़ में सांस ले रहे एक ऐसे लड़के की हकीकत है, जिसने पैदा होने से लेकर जवानी की दहलीज लांघने तक सिर्फ और सिर्फ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को जिया है।

बाहरी दुनिया के देखने के लिए उस लड़के के पास जीवन की तमाम सुख-सुविधाएं थीं; रहने को छत, पहनने को अच्छे कपड़े और हर भौतिक साधन मौजूद था। लोग समझते थे कि उसे कोई कमी नहीं है, पर आलीशान दीवारों के पीछे का सच कुछ और ही था। भौतिक सुख-सुविधाएं कभी भी मानसिक सुकून का विकल्प नहीं बन सकतीं, और यही उस घर की सबसे बड़ी त्रासदी थी।

जिस उम्र में बच्चों का संसार खिलौनों, मां की लोरियों, और पिता की उंगली पकड़कर चलना होता है, उस उम्र में इस बच्चे का सामना एक खौफनाक और ज़हरीले घरेलू माहौल से हुआ। उसके पिता का स्वभाव बचपन से ही अत्यधिक गुस्सैल और हिंसक था। घर की चारदीवारी के भीतर ऐसा कोई भी दिन नहीं गुज़रता था जब माता-पिता के बीच छोटी-छोटी बात पर चीख-पुकार, गाली-गलौज और मारपीट न होती हो।

इस रोज़-रोज़ के कलह और खौफनाक माहौल को देख-देखकर उस बच्चे का मन अंदर ही अंदर डर से कांपने लगा और उसका पूरा बचपन गहरे दुख के साए में डूब गया। मनोविज्ञान कहता है कि बचपन में रोज़-रोज़ घरेलू हिंसा को देखने से बच्चे का कोमल दिमाग हमेशा ‘क्रोनिक सर्वाइवल मोड’ (Survival Mode) में चला जाता है, जहाँ वह कभी भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पाता और उसका न्यूरोलॉजिकल विकास (Brain Development) बुरी तरह प्रभावित होता है।

घर में अनुशासन के नाम पर उस बच्चे को भी हर छोटी बात पर बेरहमी से डांटा जाता, मारा जाता और भद्दी गालियां दी जाती। जब भी उसने सहमते हुए अपनी बेगुनाही साबित करने या अपनी कोई बात कहने की कोशिश की, तो पिता ने उसे ‘मुँहज़ोरी और बदतमीजी’ का नाम दे दिया और इस बात पर उसकी और ज़्यादा बर्बरता से पिटाई की गई।

उसे कभी भी किसी बात को प्यार या तसल्ली से नहीं समझाया गया, बल्कि जब भी उसने कुछ समझने की कोशिश की, तो उसे सीधे ‘तू पागल है’ कहकर चुप करा दिया गया। पिता ने अपने ही शब्दों के तीखे तीरों से उस बच्चे का आत्मविश्वास बचपन में ही पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया। उसे बार-बार, हर दिन यह अहसास दिलाया गया कि वह जीवन में कभी कुछ नहीं कर सकता, वह पूरी तरह नाकामयाब है और बड़ा होकर भीख मांगेगा।

मनोवैज्ञानिक रूप से, बचपन में माता-पिता द्वारा दी गई यह मौखिक क्रूरता बच्चे के मन में ‘क्रोनिक शेम’ (गहरी आत्म-शर्मिंदगी) और ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ पैदा कर देती है। जब बच्चा अपने ही भगवान स्वरूप पिता से सुनता है कि वह बेकार है, तो उसका सबकॉन्शियस माइंड (अचेतन मन) इसे सच मान लेता है, जिससे उसका पूरा आत्मसम्मान (Self-esteem) वयस्क होने से पहले ही हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है।

जैसे-जैसे कैलेंडर के पन्ने पलटते गए और दिन बढ़ते गए, वह बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा और उसके साथ ही घर के हालात सुधरने की बजाय और ज़्यादा बदतर होते चले गए। अब वह लड़का थोड़ा समझने लगा था, लेकिन उसके पिता का क्रूर स्वभाव वैसा ही बना रहा, बल्कि वक्त के साथ उसमें अंधविश्वास का एक नया ज़हर भी घुल गया।

पिता ज्योतिष और वास्तुशास्त्र के ऐसे कट्टर और सनकी आस्तिक बन चुके थे कि घर के भीतर उन्होंने खौफ का एक नया फरमान जारी कर दिया। उनका नियम था कि इस कमरे में पढ़ाई नहीं करनी है, इस दिशा में मुँह करके खाना नहीं खाना है, और अगर अनजाने में या गलती से भी उस लड़के से इसके विपरीत कोई काम हो जाता, तो पिता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता और वे उसे गालियों और मार से नवाज़ते थे।

मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘टॉक्सिक माइक्रोगेमिंग’ या ‘मानसिक नियंत्रण’ कहा जाता है, जहाँ छोटी से छोटी क्रिया पर पहरा बिठाकर इंसान की स्वतंत्र सोच को पंगु बना दिया जाता है। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह हुआ कि लड़के का दिमाग तार्किक सोच छोड़कर हमेशा अज्ञात खौफ और एंग्जायटी (Anxiety) की चपेट में रहने लगा।

उसका आत्मसम्मान तब तार-तार होता, जब पिता उसके दोस्तों के सामने या भरे बाज़ार में छोटी सी बात पर उसे सरेआम जलील कर देते। किससे दोस्ती करनी है और किनसे नहीं, खाने-पीने में क्या खाना है और क्या नहीं, यहाँ तक कि पानी खड़े होकर पीना है या बैठकर, यह सब भी पिता की सनक तय करती थी।

ज़िंदगी में कुछ भी नया सीखने की प्रक्रिया में अगर उस लड़के से ज़रा सी भी चूक या गलती हो जाती, तो उसे समझाने या सिखाने की बजाय सीधा मारा जाता था। मनोवैज्ञानिक रूप से जब गलती करने पर सिर्फ क्रूर सजा मिलती है, तो दिमाग में ‘फियर ऑफ फेलियर’ (असफलता का खौफ) इतना बढ़ जाता है कि इंसान नए अवसरों को आजमाना ही छोड़ देता है। यही कारण था कि उस लड़के ने नए ज़ख्मों के डर से ज़िंदगी में कुछ भी नया सीखना या किसी भी चीज़ की कोशिश करना ही हमेशा के लिए बंद कर दिया।

जब घर के भीतर होने वाली इस भयानक मारपीट और गाली-गलौज की आवाजें दीवारों को चीरकर मोहल्ले और आजू-बाजू के घरों तक जाने लगीं, तो वह लड़का एक आत्मघाती शर्मिंदगी से भर गया। उसे लगने लगा कि अगर वह घर से बाहर कदम रखेगा, तो पड़ोस के लोग उसे ही देखेंगे, उस पर उंगलियां उठाएंगे और उसका मज़ाक उड़ाएंगे।

इसी लोकलाज और गहरे डर के मारे उसने उस दिन घर से बाहर निकलना बिल्कुल बंद कर दिया जिस दिन घर में क्लेश होता था। धीरे-धीरे यह मानसिक प्रताड़ना इतनी बढ़ गई कि वह लड़का गहरे डिप्रेशन के दलदल में धंसता चला गया और सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उस दौर में उसे खुद भी यह पता नहीं चला कि वह कब इस मानसिक बीमारी की चपेट में आ चुका है।

मनोविज्ञान में इसे ‘खामोश डिप्रेशन’ या ‘सोशल आइसोलेशन’ कहते हैं, जहाँ व्यक्ति समाज से पूरी तरह कट जाता है क्योंकि उसका भरोसा हर इंसान से उठ चुका होता है। ज़िंदगी के सबसे अनमोल और कीमती दस साल उसने डिप्रेशन के उसी भयानक, काले और सन्नाटे से भरे साए में गुज़ार दिए। उसने पूरी तरह से घर से बाहर निकलना छोड़ दिया था, मेहमानों को देखकर छिप जाना और दोस्तों के फोन की रिंगटोन सुनकर सहम जाना—यह सब इस बात का मनोवैज्ञानिक प्रमाण था कि उसका दिमाग ‘पैनिक अटैक’ (Panic Attacks) और ‘अगोराफोबिया’ (घर से बाहर निकलने का डर) का शिकार हो चुका था।

वह अंदर से इस कदर टूट चुका था कि चाहकर भी किसी काम में उसका मन नहीं लगता था, वह कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाता था और हर नाकाम कोशिश के बाद गहरी निराशा में डूब जाता था। किसी भी काम में थोड़ी सी भी मुश्किल या रुकावट आते ही वह तुरंत हार मान लेता था और धीरे-धीरे उसकी मानसिक दशा इतनी बिगड़ गई कि हर छोटी-बड़ी समस्या का एकमात्र समाधान उसे सिर्फ अपनी मौत में ही दिखाई देने लगा था।

बरसों के इस टॉर्चर के कारण उसके दिमाग में ‘कॉग्निटिव फटीग’ (Cognitive Fatigue – मानसिक थकान) हो चुकी थी, जिससे सोचने-समझने की शक्ति पूरी तरह धुंधली हो गई थी। जब भी वह अपने हमउम्र दोस्तों को ज़िंदगी में अच्छी नौकरियों और खुशहाल परिवारों के साथ सेटल होते देखता और खुद को इस नरक में अकेला पीछे छूट गया पाता, तो इस ‘सोशल कंपैरिजन’ (सामाजिक तुलना) ने उसके अवसाद को और गहरा कर दिया, जिससे उसका अस्तित्व पूरी तरह शून्य महसूस होने लगा।

यह मानसिक अवसाद दिन-ब-दिन और खतरनाक होता गया और उसके दिमाग में चौबीसों घंटे सिर्फ मरने के ही ख्याल आते रहते थे। खुदकुशी की हिम्मत न होने के कारण अब वह सड़क किनारे खड़े होकर रोज़ यह सोचने लगा था कि काश कोई सच्चा एक्सीडेंट हो जाए, ताकि इस जिल्लत से उसे हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए।

वह एक दिन इसी आत्मघाती सोच में डूबा सड़क किनारे खड़ा था, तभी अचानक एक तेज़ रफ्तार कार ने उसके सामने एक बेज़ुबान कुत्ते को ज़ोरदार टक्कर मार दी। उस हादसे की वो खौफनाक आवाज़ और बेज़ुबान की दर्दनाक चीख ने पूरे माहौल को हिलाकर रख दिया। मौत के उस साक्षात, डरावने मंज़र को इतने करीब से देखकर वह लड़का अंदर तक थर-थर कांप उठा।

मनोविज्ञान के अनुसार, कभी-कभी कोई बाहरी गहरा झटका या खौफनाक मंज़र इंसान के सुप्त पड़े ‘लाइफ इंस्टिंक्ट’ (जीने की मूल प्रवृत्ति) को अचानक जगा देता है। मौत की उस भयानक हकीकत को देखकर उसके अचेतन मन को समझ आया कि वह असल में मरना नहीं चाहता, बल्कि वह सिर्फ उस ‘दर्द’ को ख़त्म करना चाहता है। इसी कारण, खुद को ख़त्म करने के उस आत्मघाती विचार ने उसी पल दम तोड़ दिया।

लेकिन, कहानी यहाँ ख़त्म नहीं हुई; मौत का ख्याल तो चला गया, लेकिन घर का माहौल वैसा ही रहा। डिप्रेशन का कोई इलाज न मिलने के कारण बरसों से अंदर दबा हुआ उसका सारा दर्द, अपमान और लाचारी अब एक भयानक और आक्रामक गुस्से के रूप में बाहर आने लगी। मनोविज्ञान में इसे ‘ट्रॉमा रिस्पांस’ या ‘रिएक्टिव अग्रेशन’ कहा जाता है; जब मन बरसों तक बिना किसी गलती के जुल्म सहता है, तो एक समय बाद वह खुद की रक्षा करने के लिए आक्रामक हो जाता है। अब वह लड़का खुद चीजें तोड़ने लगा, चीखने लगा और वही गालियां देने लगा जो उसने बचपन से अपने घर में सुनी थीं। यह गुस्सा असल में उसकी आत्मा की लाचार चीख थी।

इस पूरे मानसिक हमले के कारण उसकी स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि डिप्रेशन और गुस्से के साथ-साथ अब उसे ओसीडी (OCD – ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर) नाम की एक और गंभीर बीमारी ने घेर लिया। उसका अपना ही दिमाग अब उसका सबसे बड़ा अत्याचारी बन चुका था। वह बार-बार एक ही चीज़ को दोहराने के अंतहीन चक्रव्यूह में फँस गया था; वह दिन में दर्जनों बार अपने हाथ धोता, अपने कपड़ों को बार-बार धोता रहता।

मनोविज्ञान के मुताबिक, जब इंसान का अपनी बाहरी परिस्थितियों और जिंदगी पर कोई नियंत्रण नहीं रहता, तो उसका दिमाग आंतरिक बेचैनी को शांत करने के लिए साफ-सफाई जैसी चीजों पर अत्यधिक नियंत्रण (Control) स्थापित करने की कोशिश करता है, जिसे ‘कम्पल्शन’ कहते हैं। जब वह मन की शांति के लिए मंदिर जाता, तो वहाँ भी उसके दिमाग में बेहद बुरे और डरावने ख्याल आने लगते। इसे ‘इंट्रूसिव थॉट्स’ (Intrusive Thoughts) कहते हैं, जो ओसीडी का एक गंभीर लक्षण हैं।

इन अनचाहे विचारों ने उसे गहरे गिल्ट और आत्म-ग्लानि के ऐसे नरक में ढकेल दिया जहाँ वह खुद को ही पापी समझने लगा। इतने सारे मानसिक रोगों के चक्रव्यूह में फँसने के बाद, एक दिन जब उसकी मानसिक स्थिति पूरी तरह चरमरा चुकी थी, तब अचानक उसके भीतर बरसों से सोई हुई ज़िंदगी की आख़िरी बची हुई इच्छाशक्ति ने ज़ोर मारा।

उसके मन में एक अनजान सी तड़प जागी कि आखिर उसके साथ ये सब अजीब और डरावनी चीजें क्यों हो रही हैं? उसने हिम्मत जुटाई, अपना फोन उठाया और गूगल पर सर्च किया। इंटरनेट पर डॉक्टरों के लेख पढ़ते ही उसे पहली बार मनोवैज्ञानिक जागरूकता (Mental Health Awareness) मिली। उसे समझ आया कि वह कोई पागल नहीं है, बल्कि वह गंभीर मानसिक बीमारियों से जूझ रहा है। इस पहचान ने उसके मन से “पागलपन का कलंक” हटा दिया।

इसके बाद उसे एक रिहैबिलीटेशन सेंटर ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों की सही देखरेख, थेरेपी और दवाओं की मदद से छह महीने में उसकी मानसिक स्थिति में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक सुधार आया; उसके दिमाग से वो सारे डरावने विचार ख़त्म हो गए और उसका मन पूरी तरह शांत हो गया।

लेकिन रिहैब की उस सुरक्षित दुनिया से बाहर आने के बाद असली और कड़वी चुनौती उसका इंतज़ार कर रही थी। वह लड़का तो ठीक होकर लौटा था, लेकिन उसके घर का माहौल और उसके पिता का स्वभाव रत्ती भर भी नहीं बदला था। एक मानसिक मरीज के पूरी तरह ठीक होने के लिए जिस ‘सेफ एनवायरनमेंट’ की ज़रूरत होती है, वो उसे नहीं मिला।

हालाँकि अब घर में पुरानी शारीरिक मारपीट तो नहीं होती थी, लेकिन पिता की हरकतें जैसे हर छोटी-छोटी बात पर टोकना, अपनी मनमर्जी चलाना और उसकी हर सांस पर पहरा रखना बदस्तूर जारी रहा। मनोविज्ञान में इसे ‘इमोशनल एंड साइकोलॉजिकल अब्यूज’ (Psychological Abuse) कहते हैं, जो कि शारीरिक मार से भी ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि इसके ज़ख्म दिखाई नहीं देते।

लगातार मिलने वाली इस मानसिक टोक-टाक ने उसके दिमाग को फिर से थका दिया और वह दोबारा डिप्रेशन के चक्रव्यूह में गिर गया। आज हालात यह हैं कि कई बार उसके मन में यह ख्याल आता है कि वह इस घर को हमेशा के लिए छोड़ दे और कहीं दूर चला जाए, लेकिन बचपन से लेकर आज तक जिस बेरहमी से उसका आत्मविश्वास तोड़ा गया है, उसकी वजह से उसके भीतर ‘लर्नड हेल्पलेसनेस’ (Learned Helplessness – सीखी हुई लाचारी) की स्थिति पैदा हो चुकी है।

यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहाँ इंसान को लगने लगता है कि सामने दरवाज़ा खुला होने पर भी वह कभी इस कैद से आज़ाद नहीं हो सकता या बाहर की दुनिया को संभाल नहीं पाएगा। वह शांत तो हो चुका है, लेकिन ज़िंदगी में आगे नहीं बढ़ पा रहा है। अपनी आँखों के सामने अपने साथियों को बहुत आगे निकलते देखना और खुद को इस असफल जीवन में फँसा पाना उसे रोज़ तोड़ता है। सच तो यह है कि वह लड़का अब जीवन जी नहीं रहा है, बल्कि इस पिंजरे में घुट-घुट कर सिर्फ अपने दिन काट रहा है…

दुनिया के नाम संदेश
यह कहानी सिर्फ एक लड़के की आपबीती नहीं है, बल्कि यह दुनिया के उन लाखों बच्चों और वयस्कों का एक अदृश्य और कड़वा सच है जो अपने ही घरों के भीतर मानसिक तौर पर रोज़ कत्ल किए जाते हैं।

समाज को यह समझना होगा कि किसी बच्चे को महंगी सुख-सुविधाएं, बड़ा घर या अच्छे साधन दे देने से वह खुश नहीं हो जाता। आत्मा को तृप्त करने के लिए प्यार, सम्मान और मानसिक सुरक्षा की ज़रूरत होती है, जो उसे कभी नहीं मिली।

दुनिया के नाम आज एक ही संदेश है कि अनुशासन और अच्छी परवरिश के नाम पर बच्चों को मारना, गाली देना और उन्हें मानसिक रूप से अपने नियंत्रण में रखना कोई सुधार नहीं है; यह पैरेंटल अब्यूज है, जो एक हँसते-खेलते बच्चे के भविष्य को बचपन में ही ज़िंदा दफ़न कर देता है। आपके द्वारा बोले गए कड़वे शब्द बच्चे के आत्मविश्वास की नींव को हमेशा के लिए हिला देते हैं।

इस बात को गहराई से समझिए कि ज़ख्म सिर्फ वो नहीं होते जहाँ से खून बहे; मानसिक बीमारियां जैसे डिप्रेशन, एंग्जायटी और ओसीडी कोई नाटक, बहाना या पागलपन नहीं हैं, बल्कि ये बाकायदा किसी शारीरिक बीमारी की तरह ही सच और दर्दनाक हैं।

अगर आपके आस-पास कोई इंसान अजीब व्यवहार कर रहा है, गुस्सा कर रहा है या खुद को कमरे में बंद कर चुका है, तो उसे ‘नाकामयाब’ या ‘पागल’ का टैग देने के बजाय एक इंसानी हमदर्दी के साथ उसकी मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश कीजिए और उसे डॉक्टर के पास ले जाइए।

एक इंसान दुनिया की हर जंग को जीत सकता है, बशर्ते जब वह शाम को थका-हारा हुआ घर लौटे, तो उसे उस घर के भीतर सुकून, प्यार और सुरक्षा का अहसास मिले। जिस घर में मानसिक शांति नहीं होती, वहाँ कभी सपनों का जन्म नहीं होता, वहाँ सिर्फ और सिर्फ बीमारियों का जन्म होता है।

पूरी दुनिया को आज मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना पड़ेगा और किसी के शरीर के घाव देखने से पहले, उसके मन के उन अदृश्य ज़ख्मों को टटोलना होगा जो बिना आवाज़ के चिल्ला-चिल्लाकर मदद की भीख मांग रहे हैं।

और सबसे जरूरी बात

अगर तुम वो बेटा या बेटी हो जो ये सब झेल रहे हो, तो याद रखनाः तुममें कोई कमी नहीं है। कमी उस परवरिश में थी।

मदद माँगना कमज़ोरी नहीं है। थैरेपिस्ट के पास जाना, दोस्त से बात करना, घर छोड़ देना अगर ज़रूरी हो — ये सब गुनाह नहीं है। तुम्हारी ज़िंदगी उनकी इज्जत से बड़ी है।

दरवाज़ा खुला है, उड़ने की हिम्मत भले मर गई हो, पर साँसें अभी बाकी हैं और जहाँ साँस है, वहाँ वापसी मुमकिन है।

याद रखिए, नालायक बच्चे पैदा नहीं होते, उन्हें गढ़ा जाता है। एक-एक ताने से। एक-एक गाली से और परवाह के नाम पर की गई एक-एक ज़्यादती से।

और याद रखिए, जो माँ-बाप अपने बच्चे की बर्बादी के बाद भी समाज में इज्जत से घूमते हैं, असली कलंक वो हैं। कलयुगी औलाद वो नहीं जो आवाज़ उठाए, कलयुगी माँ-बाप वो हैं जो अपनी औलाद को जीते-जी मार दे।

इस लेख से क्या लगता है माता पिता भगवान का रूप होते है। कितना सच है?

“माता-पिता भगवान का रूप होते हैं” — हाँ, होते हैं। पर सिर्फ वो, जो घर को मंदिर बनाते हैं, श्मशान नहीं।

क्योंकि भगवान बनने का हक़ सिर्फ उन्हें है जो किसी की दुनिया उजाड़ते नहीं, बसाते हैं।


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