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Pravesh Sinde

Others

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प्रकृति की मौन चीख

प्रकृति की मौन चीख

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यह लेख आधुनिकता की अंधी दौड़ में प्रकृति के साथ हो रहे अन्याय का एक आईना है। जहाँ हम विकास के नाम पर जंगलों को कंक्रीट के जंगलों में बदल रहे हैं, वहीं प्रकृति बिना कुछ कहे अपना अस्तित्व खो रही है। वह बोल नहीं सकती, लेकिन बढ़ते तापमान, पिघलते ग्लेशियर और दूषित हवा के रूप में उसकी ‘मौन चीख’ साफ सुनी जा सकती है। यह लेख हमें चेतावनी देता है कि यदि हमने इस खामोश दर्द को समय रहते नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ियों के पास विरासत में केवल एक बीमार और लाचार धरती बचेगी।


मानव सभ्यता के विकास की कहानी असल में प्रकृति के दोहन की कहानी है। आदिम काल से लेकर आधुनिक युग तक, मनुष्य ने जो कुछ भी हासिल किया है, वह सब प्रकृति की कोख से ही निकला है। लेकिन आज इंसान इतना अंधा और स्वार्थी हो चुका है कि वह उस माँ का ही गला घोंट रहा है जिसने उसे पाला-पोसा है। यदि आज प्रकृति के पास इंसानी भाषा होती, यदि उसके पास शब्द होते और वह बोल पाती, तो वह किसी मंच पर खड़े होकर भाषण नहीं देती, बल्कि वह मनुष्य के सामने घुटने टेककर अपनी वेदना रोती, चीखती और फिर एक ऐसी भयानक चेतावनी देती जिसे सुनकर पूरी मानवता कांप उठती। प्रकृति मनुष्य से सीधा संवाद करते हुए सबसे पहले उसके भीतर सोई हुई इंसानियत और कृतज्ञता को झकझोरती। वह मनुष्य को इतिहास के उन पन्नों की याद दिलाती जहाँ भारत की प्राचीन संस्कृति ने सदियों पहले प्रकृति को ईश्वर का दर्जा दिया था और सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था।

प्रकृति मनुष्य की आँखों में आँखें डालकर पूछती कि हे भारतभूमि के मानव, तुम तो उस महान सनातन संस्कृति के वंशज हो जहाँ वेदों और उपनिषदों में पर्यावरण की रक्षा को धर्म का अभिन्न अंग माना गया था। तुम कैसे भूल गए कि तुम्हारी संस्कृति में नदियों को सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि ‘माँ’ कहकर पूजा जाता था। गंगा, यमुना, सरस्वती और नर्मदा जैसी पावन जलधाराओं के तट पर तुम्हारी सभ्यताएं फली-फूलीं, लेकिन आज तुमने उन्हीं जीवनदायिनी नदियों को अपने गंदे नालों, प्लास्टिक और औद्योगिक रसायनों का कचरा पात्र बना दिया है। प्रकृति पूछती कि मैंने तुम्हें सांस लेने के लिए जो ठंडी, शुद्ध और प्राणदायी हवा सौंपी थी, तुमने उसे इस कदर जहरीला क्यों बना दिया। वह कहती कि सुबह की जिस ताजी हवा में कभी ऋषियों के मंत्रोच्चार, चिड़ियों की चहचहाहट और फूलों की महक होती थी, आज उसमें फैक्ट्रियों का काला धुआं, गाड़ियों का जहर और स्मॉग भर चुका है। आज इंसान अपने ही बनाए वायु प्रदूषण के कारण घुट-घुट कर मर रहा है, छोटे-छोटे बच्चे फेफड़ों की बीमारियों के साथ पैदा हो रहे हैं। क्या यही तुम्हारी तरक्की है कि तुम सांस लेने जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी साफ हवा नहीं बचा पाए। मिट्टी की कोख जिसे प्रकृति ने अन्न उपजाने के लिए जीवनदायिनी बनाया था, और जिसे तुम्हारी संस्कृति में ‘धरती माता’ कहकर सुबह उठते ही पैरों से छूने के लिए क्षमा मांगी जाती थी, आज वह प्लास्टिक के अंतहीन मलबे और रसायनों के अत्यधिक उपयोग से बंजर और बेजान हो चुकी है।

पेड़-पौधों और जंगलों के अंधाधुंध कटान पर प्रकृति का दर्द और भी गहरा होता। वह मनुष्य से कहती कि तुम्हारी संस्कृति ने तो बरगद, पीपल, नीम और तुलसी जैसे पौधों में देवताओं का वास देखा था। वेदों में स्पष्ट लिखा गया है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के समान होता है, क्योंकि वह निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करता है। लेकिन आज तुम उन्हीं घने जंगलों को अपनी सुख-सुविधा, कंक्रीट के आलीशान शहरों और चौड़ी सड़कों के लिए बेरहमी से काट रहे हो, जो असल में इस धरती के फेफड़े हैं। जब तुम एक पेड़ काटते हो, तो तुम सिर्फ लकड़ी नहीं काटते, बल्कि तुम आने वाली पीढ़ियों के हिस्से की ऑक्सीजन काटते हो, तुम बादलों को बरसने से रोकते हो और मिट्टी को बहने के लिए छोड़ देते हो। पेड़ प्रकृति के वो रक्षक हैं जो चुपचाप मनुष्य के फैलाए जहर को सोखकर उसे जीवन देते हैं, लेकिन इंसान ने अपने ही रक्षकों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। जंगलों के इस विनाश के कारण आज बेजुबान जीव-जंतुओं पर जो जुल्म हो रहा है, उस पर प्रकृति का आक्रोश फूट पड़ता। वह कहती कि प्राचीन भारत ने तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का नारा दिया था, जिसका अर्थ सिर्फ इंसानों का परिवार नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि के जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों को एक परिवार मानना था। तुम्हारे देवी-देवताओं ने शेर, चूहे, बैल, मोर और गरुड़ जैसे जीवों को अपना वाहन बनाकर यह संदेश दिया था कि प्रकृति का हर जीव पूजनीय है। लेकिन आज इंसान ने अपने स्वार्थ, मनोरंजन, विलासिता और शिकार के लिए इन मासूम जीवों के घरों को उजाड़ दिया है। वन्यजीवों की सैकड़ों प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो चुकी हैं और जो बची हैं, वे भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानी बस्तियों में आने को मजबूर हैं, जहाँ उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता है। प्रकृति चेतावनी देते हुए कहती कि पारिस्थितिकी तंत्र यानी इकोसिस्टम की हर एक छोटी से छोटी कड़ी बेहद महत्वपूर्ण है, और यदि यह चक्र टूटा, तो पूरी खाद्य श्रृंखला बिखर जाएगी और अंततः मनुष्य भूखा मरने पर मजबूर हो जाएगा।

वातावरण में हो रहे बदलावों, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) पर प्रकृति मनुष्य को आईना दिखाती। वह कहती कि प्राचीन ऋषियों ने ‘द्यौ शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथ्वी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः’ का शांति पाठ करके ब्रह्मांड, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल और वनस्पतियों के बीच संतुलन की प्रार्थना की थी। लेकिन तुमने उस संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। आज जो धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसे तुम ग्लोबल वार्मिंग कहते हो, वह असल में मेरा बढ़ता हुआ बुखार है और इस बुखार की वजह तुम्हारी फैक्ट्रियां, तुम्हारी गाड़ियां और तुम्हारा बेलगाम लालच है। ध्रुवों पर जमी सदियों पुरानी बर्फ और बड़े-बड़े ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटीय शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। आज मौसम का चक्र पूरी तरह से टूट चुका है; जब बारिश होनी चाहिए तब सूखा पड़ता है, और जब फसलें पक कर तैयार होती हैं तब भयानक ओलावृष्टि और बिन मौसम की बरसात सब कुछ तबाह कर देती है। भयंकर चक्रवात, जंगलों में लगने वाली भीषण आग, विनाशकारी बाढ़ और जानलेवा लू जैसी आपदाएं कोई प्राकृतिक घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति की बेबसी, उसका रोना और मनुष्य की गलतियों का सीधा परिणाम हैं। प्रकृति इंसान को साफ शब्दों में समझाती कि जब तुम ईशावास्योपनिषद के उस सिद्धांत को भूल गए जिसमें कहा गया था कि इस संसार की हर वस्तु का उपभोग केवल त्याग की भावना से करो और किसी के धन का लालच मत करो, तब तुमने अपने विनाश का रास्ता खुद चुन लिया। जब तुम कुदरत के बनाए संतुलन को बिगाड़ोगे, तो कुदरत का न्याय भी तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा।

अपने इस लंबे और दर्दभरे वक्तव्य के अंत में प्रकृति मानवता को एक अंतिम और सबसे क्रूर सच्चाई से रूबरू कराती। वह कहती कि हे मनुष्य! अपने भ्रम और अहंकार से बाहर निकलो। तुम सोचते हो कि तुम ‘पर्यावरण बचाओ’ के नारे लगाकर मुझ पर कोई एहसान कर रहे हो, तो तुम पूरी तरह गलत हो। यह धरती करोड़ों साल पुरानी है; यहाँ डायनासोर जैसे महाशक्तिशाली जीव भी आए और जब उन्होंने प्रकृति के नियमों को चुनौती दी, तो वे इतिहास के पन्नों में दफन हो गए, लेकिन यह पृथ्वी बची रही। यदि आज इंसान इस धरती से पूरी तरह समाप्त हो जाए, तो कुछ ही सालों में नदियां फिर से साफ हो जाएंगी, हवा शुद्ध हो जाएगी, जंगल दोबारा लहलहा उठेंगे और जीव-जंतु खुशहाल हो जाएंगे। प्रकृति मनुष्य के बिना बहुत खूबसूरती से फल-फूल सकती है, लेकिन मनुष्य प्रकृति के बिना, हवा के एक झोंके और पानी की एक बूंद के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। इसलिए पर्यावरण को बचाना प्रकृति पर एहसान नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा खुद के अस्तित्व को बचाने की आखिरी भीख है। संभलने का समय अब खत्म हो रहा है, यदि आज भी इंसान ने प्राचीन भारतीय संस्कृति के उन मूल्यों को दोबारा नहीं अपनाया जहाँ ‘प्रकृति का दोहन’ करने की अनुमति थी, ‘शोषण’ करने की नहीं, तो वह दिन दूर नहीं जब मानव जाति का अंत निश्चित है। यदि आज भी इंसान ने अपनी जीवनशैली नहीं बदली, अपने लालच को कम नहीं किया और पेड़ों को लगाना व सहेजना शुरू नहीं किया, तो इतिहास में मनुष्य का नाम भी वैसे ही दर्ज होगा जैसे आज डायनासोर का है।

लेकिन केवल आंसू बहाने और खोखली चिंता जताने से यह संकट दूर नहीं होगा। प्रकृति हमसे कोई असंभव बलिदान नहीं मांगती, वह तो बस हमारी आदतों में छोटे और जिम्मेदार बदलाव चाहती है। हम अपने दैनिक जीवन में कुछ बेहद आसान और व्यावहारिक कदम उठाकर इस मरती हुई पृथ्वी को नया जीवन दे सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि हमें पृथ्वी को दोबारा हरा-भरा बनाना होगा। संकल्प लें कि हर व्यक्ति अपने जीवन के हर विशेष अवसर पर, जैसे जन्मदिन, शादी की सालगिरह या किसी प्रियजन की याद में कम से कम एक पौधा जरूर लगाएगा और केवल लगाएगा ही नहीं, बल्कि उसके बड़ा होने तक एक बच्चे की तरह उसकी देखभाल भी करेगा। अपने घरों के आसपास, छतों पर या बालकनी में छोटे-छोटे पौधे लगाएं और वहां पक्षियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करें। कूड़े को सड़क या नालियों में फेंकने के बजाय सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग करें ताकि उसका सही तरीके से निपटारा हो सके। जब भी संभव हो, छोटी दूरियों के लिए पैदल चलें या साइकिल का उपयोग करें और लंबी दूरी के लिए सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करें, जिससे ईंधन की खपत और वायु प्रदूषण दोनों कम हो सकें। याद रखिए, बदलाव कभी किसी बड़ी क्रांति से नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के छोटे-छोटे ईमानदार प्रयासों से आता है। जब तक हर नागरिक इस धरती को अपना असली घर नहीं मानेगा, तब तक नीतियां और कानून बेकार साबित होंगे। आज ही यह कसम उठाएं कि हम प्रकृति के शोषक नहीं, बल्कि उसके रक्षक बनेंगे, क्योंकि प्रकृति बचेगी, तभी हमारा कल बचेगा। 


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