अच्छाई से अच्छाई
अच्छाई से अच्छाई
अच्छाई से अच्छाई आती है। यह अनुभव से पता चलता है। एक बार स्वयं सब्ज़ी ख़रीदने गई। कार से गई थी। कार बाहर सड़क पर लगी दी। और पैदल सब्ज़ी बाज़ार में गई। दुकान से सामान ख़रीदा, सब्ज़ी ली, पैसे दिये।सब्ज़ी वाले ने ग़लती से कुछ पैसे ज़्यादा लौटा दिये। मैंने उसे बारह रुपये लौटाते हुए कहा-“ तुमने ज़्यादा पैसे दे दिये थे, वापिस लो।”
वह खुश हुआ, उसने पैसे ले लिये। मैं अपनी ईमानदारी पर मन ही मन प्रसन्न हो गर्वित हो रही थी कि मैंने उसके अतिरिक्त पैसे वापिस कर दिए।
उसके बाद मैंने एक दो दुकान से और कुछ सामान ख़रीदा । और लौटकर कार की तरफ़ जाने लगी।
थोड़ी देर में मैंने देखा कि एक छोटा लड़का दौड़ता हुआ पीछे- पीछे आ रहा था ,वह कार तक आ गया।
मैंने पूछा-“ क्या बात है।”
वह बोला-“ आपने मेरी दुकान पर सौ का नोट दिया था, यह पैसे वापिस लेना भूल गये। देने आया हूँ। यह लीजिये पचास रुपये।”
वह गरीब लड़का पैसे लौटाने , वह भी पचास रुपये ,इतनी दूर चलकर दौड़ता हुआ कार तक आया था। मैं अवाक् रह गई। कुछ कहते नहीं बना।
“अरे ! तुम दौड़ते हुए आये पैसा देने” यह कहकर उसके हाथ से पैसे लिये और चुपचाप कार में बैठ गई।
मैं सब्जी वाले को बारह रुपये लौटाकर गर्वित हो रही थी, कि अच्छा काम किया, पर उस लड़के के सामने छोटी पड़ गई। वह बेचारा पीछे- पीछे दौड़ता हुआ पैसे लौटाने आया अपनी ईमानदारी के कारण । वह नहीं भी लौटा सकता था। मैं तो भूल ही चुकी थी।
कभी भी अपने अच्छे काम का घमण्ड मत करो, यह सबक़ मिला। आप ही नहीं और लोग भी अच्छा काम कर सकते हैं और करते हैं।
