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runa rashmi

Abstract

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runa rashmi

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वसंती श्रृंगार

वसंती श्रृंगार

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खिले पुष्प चहुँदिस सुहाने लगे,

सभी के हृदय को लुभाने लगे।

सजी है धरा, है सुवासित पवन,

खिली धूप में मुसकुराता गगन।


जिया में बजे प्रीत की धुन यहाँ,

लगा झूमने और गाने जहाँ।

सलोनी बड़ी पीतवसना धरा,

प्रणय इस जगत में दसोंदिस भरा।


कहें सब कि आई मिलन की घड़ी,

हृदय की लगी आज जुड़ने कड़ी।

सभी प्रेयसी और प्रियतम मिले,

हृदय में उमंगों भरे गुल खिले।


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