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runa rashmi

Others

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वसंती धरा

वसंती धरा

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विविध भाँति के पुष्प खिले हैं, नव किसलय दल आए हैं।

पीत वसन ओढ़े वसुधा में, कितने रंग समाए हैं।


सूखी शाखें हुईं पल्लवित, आम मंजरी आई है।

इससे सुरभित होकर चलती, मंद मंद पुरवाई है।

अरहर, सरसों, सूर्यमुखी सब, खेतों में लहराए हैं,

पीत वसन ओढ़े वसुधा में, कितने रंग समाए हैं।


शीत शिशिर की बीती देखो, मनु कैसा आनंदित है,

उपवन ही बस नहीं मनुज का, हिय भी देखो पुष्पित है।

चहुँ दिस छाई हैं जो खुशियाँ, हर्षित दसो दिशाएँ हैं,

पीत वसन ओढ़े वसुधा में, कितने रंग समाए हैं।


रंगों का मेला है आया, हरित धरा मुसकाई है, 

गुंजन करते भ्रमर पुष्प पर, तितली भी ललचाई हैं।

मिलकर सबने रंग यहाँ ज्यों, फागुन के बिखराए हैं,

पीत वसन ओढ़े वसुधा में, कितने रंग समाए हैं।


विविध भाँति के पुष्प खिले हैं, नव किसलय दल आए हैं।

पीत वसन ओढ़े वसुधा में, कितने रंग समाए हैं।



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