विरह
विरह
ओ सखी….
बादल गरजे
सावन बरसे
मन प्यासा
प्यास का प्यासा।
ओ सखी….
नीम की डाली
नही पड़े झूले
कोई न गाए
सावन के गाने।
ओ सखी….
आम के बाग
कोयल न बोले
नाचे न मोर
खड़ा रे उदास।
ओ सखी….
आये नहीं कागा
न कोई संदेश
मन का पपीहा
प्यासा का प्यासा।
ओ सखी….
कासे कहूँ सजनी
साजन न आये
न पता न ठिकाना
मन में हैं रोना।
ओ सखी….
