STORYMIRROR

Mahavir Uttranchali

Abstract

3  

Mahavir Uttranchali

Abstract

वीरवर

वीरवर

1 min
230

धन्य हमारी मातृभूमि

धन्य हमारे वीरवर

लौट आये कालमुख से

शत्रू की छाती चीरकर।।


बढ़ चले विजयनाद करते

काल को परास्त कर।

रीढ़ शत्रू का तोड़ आये

वज्र मुश्त प्रहार कर।।


पीछे न हट सके वो पग

जब काल का प्रण किया।

रणबांकुरों ने ऐसे हँसके

मृत्यु का वरण किया।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract