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Pranali Suryawanshi

Abstract

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Pranali Suryawanshi

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वह रेत थी

वह रेत थी

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ख़त्म थी,

तरस रही 

वह रेत थी

तू कुछ यूँ 

सूखे रेगिस्तान में 

पानी सा 

बरसा 

बंजर उम्मीदें थी।


तुने जगाया 

सैलाब है

हवा का झोंका नहीं,

तुफान भी नहीं,

तू कुछ और ही है।


कि इंसान 

बस 

कुछ बूंदें 

ही लेके 

बैठी हूँ,

तुझे समुन्दर भी दूँ 

कम लगे। 


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