STORYMIRROR

Dilip Maurya

Inspirational

3  

Dilip Maurya

Inspirational

उम्मीद...!!!

उम्मीद...!!!

1 min
462

रोज निकलता हूँ

अपने गंतव्य पे,

कुछ अरमानों के साथ।

सोचता हूँ

समेट लूंगा जहान,

पर कुछ ना लगता हाथ।

लड़ता हूँ रोज मैं

अंतर्मन के युद्ध से,

मनुष्य हूँ मैं...

फिर कैसे मान लूँ हार।

ना है उम्मीद किसी से 

ना अनुग्रह किसी से करता हूँ

पल भर में मर जाता हूँ

मैं...पल भर जीता रहता हूँ।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational