STORYMIRROR

Babita patil

Abstract Fantasy

3  

Babita patil

Abstract Fantasy

टपका

टपका

1 min
137

टपक टपक बूंदें उसकी 

गिरी मेरे आंगन में 

भीग गई मेरी छत

खुले आंगन में


कही से टपका आया

कही बर्तन में समाया

कहीं गिलास तो 

कही कटोरी रखता 

खुली छत में


टपका आज गिरा है

मेरे आंगन में। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Babita patil

टपका

टपका

1 min पढ़ें

मैं

मैं

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract