तर्क-वितर्क और मंजिल
तर्क-वितर्क और मंजिल
हौंसला और मंजिल एक दिन, आपस में दोनों उलझ पड़े
पा सके न मुझे जीवन में, चाहे रख लो अरमान बड़े||
हर मार्ग पर रुकावट डालूँ, दे लो तुम इम्तिहान बड़े
ध्येय से तुझको पीछे धकेलूँ, बुद्धिमान रहो तुम बढ़े-चढ़े||
हौंसलों ने जवाब कहा, मंजिल तेरे है महल बड़े
शानौ-शौकत तुम जीवन लाती, बलिदान भी लेती बड़े-बड़े||
औकात दिखा दूँ में भी लेकिन, जब मुझ जैसों से पाला पड़े
गर्व को तेरे चकना चूर मैं कर दूँ, जब हौंसलों संग इंसान लड़े||
पैरों में गिरकर माफी मांगे, तब मंजिलों की न एक चले
त्याग सुख-सुविधा इस जीवन की, कड़ी मेहनत के साथ लड़े||
अच्छे-अच्छों को धूल चटा दे, हौंसले संग जब उड़ान भरे
सफलता ढूंढती अपना बसेरा, बुद्धि-हौंसले जब साथ लड़े||
