STORYMIRROR

Lokesh Gulyani

Abstract

4  

Lokesh Gulyani

Abstract

तितली

तितली

1 min
325

तितली हूँ मैं ख्वाबों की,

उड़ती थी मैं ख्यालों में।

कभी खुले आसमानों में,

और कभी बंद तालों में।

तितली हूँ मैं खवाबों की....


खुशबू न बची थी गुलों में,

हवा भी दम घोंटती थी।

मांगती थी रहम बाग़बान से,

पर मुझमें ही कोई कमी थी।

तितली हूँ मैं खवाबों की....


मौसम ने पलटा खाया,

पंखों ने भी दम दिखाया।

उड़ी मैं कुछ पल ज़ोर से,

आ गिरी क़दमों में फिर शोर से।

तितली हूँ मैं खवाबों की....


अंधेरों से दोस्ती है मेरी,

रोशनी से डर लगता है।

जो भी हाथ बढ़ते हैं मेरी ओर,

उन सायों से डर लगता है।

तितली हूँ मैं खवाबों की....


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Lokesh Gulyani

तितली

तितली

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract