सुबह हमारी अब रक़ीब सी हैं
सुबह हमारी अब रक़ीब सी हैं
ज़रा हिम्मत की होती तो आज मुक़द्दर ही कुछ और होता,
एक तरफा मोहब्बत भी कुछ अजीब सी हैं,
हर सुबह हमारी अब रक़ीब सी हैंI
यूँ तो हमेशा ही काबिलियत की कमी थी,
शायद इस लिए ज़िंदगी सालों से थमी थी,
फिर तू आई और तेरा एहसास हुआ,
अब जाकर मुक़द्दर पर तोड़ा विश्वास हुआ।
बड़ा गुरूर था तुझे मुझपर,
फिर भी मैं बिना लड़े ही हार गया,
शायद बाबा के आँखों में एक कतरे ने मेरा ज़मीर ही मार दिया।
हर वादा हर सपना, ज़िन्दा लाश रह गया;
अब कुछ नहीं बस मैं और मेरा काश रह गयाI
आज मलीन है मन मेरा और राख ही राख है,
फिर भी न जाने क्यों तेरा एहसास पाक है।
कर्म है मेरे या शायद तेरे महादेव का श्राप है,
अब चाहत तो दूर, ज़हन में तेरा ज़िकर भी पाप है।
बड़ा अफ़सोस और शायद खुदा को भी खेद है,
जब हर कण में वो है तो फिर क्यों ये वर्ण-जाति का भेद है।
एक तरफा मोहब्बत भी कुछ अजीब सी हैं,
हर सुबह हमारी अब रक़ीब सी हैं,
ज़रा हिम्मत की होती तो आज मुक़द्दर ही कुछ और होता।

