STORYMIRROR

Ruchika kumari

Abstract

3  

Ruchika kumari

Abstract

सपनों की हलचल

सपनों की हलचल

1 min
295

गुजरे कुछ पल वो निगाहों में

मैंने कैद कर रख लिए 


अब आंखें बंद कभी करूंगा

तो भी तुम्हें ही देखूंगा

 

सपनों की हलचल से फिर

हमारी बेकरारी अब नहीं 


अब फिर से मैं अकेला हूं

खुद का रास्ता देख रहा हूँ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract