स्क्रीन का कोहरा
स्क्रीन का कोहरा
कागज़ की वह सोंधी महक
अब पाँच इंच के काँच में सिमट कर रह गई है।
हज़ारों 'फ्रेंड्स' की चमकीली भीड़ में भी
इंसान अकेला खड़ा है,
जैसे किसी अनजान हाइवे पर खोया हुआ मुसाफ़िर।
रिश्तों की गर्माहट अब नापी जाती है
लाइक्स, व्यूज़ और कमेंट्स के ठंडे एल्गोरिदम से।
हम सब दौड़ रहे हैं एक अंतहीन रील के पीछे,
जहाँ हर भावना सिर्फ पंद्रह सेकंड की मोहताज है।
यह कैसा समय है,
जहाँ सब कुछ 'लाइव' है—
सिवाय उस ज़िंदगी के,
जो हमारी आँखों के सामने चुपचाप गुज़र रही है।
