STORYMIRROR

Mrs. Mangla Borkar

Abstract

3  

Mrs. Mangla Borkar

Abstract

सिगरेट की आदत

सिगरेट की आदत

1 min
210


सिगरेट छीने तन मन धन धुंए की बरसात में

बुझ गया है जीवन भर गई राख फेफड़ों में

ख़राब हुआ जी जनम जनम को लगा लिया

जी सिगरेट की आदत


अब तो खुदा भी ना करे इस बुरी लत से हिफाजत

हिफाजत वह क्यों करे तुमने लगाई

अपनी मर्ज़ी से लत

खुदा की बेशकीमती ज़िन्दगी की लगा दी


दो कौड़ी की क़ीमत 

कीमत लगा के भूल बैठे कितना अहम है

स्वस्थ शरीर

इस धुंए को धो ना पाए नीर और


इलाज का खर्चा ऐसा बने फ़कीर

फकीरी में गँवाई सेहत और गंवाया धन

बुरी लत को बनाके जीवन अब गंवाएंगे तन।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract