श्रृंगार-रस नीरस हो चला
श्रृंगार-रस नीरस हो चला
नीला आकाश श्वेत हो चला है,
हरियाली की चादर उड़ने लगी है,
मौसम भी रंग बदल रहा है,
जबसे प्रेम जीवन से ओझल हो चला।
संबंध जर्जर हो चला है,
फसलों का सिलसिला है,
कभी जो चेहरा मुस्कुराता था,
आज वो शांत हो चला है।
हां, अब काजल अच्छा नहीं लगता,
न ही लाली अच्छी लगती है,
गायब है वो हसी,
जो मेरे होठों पर अच्छी लगती है।
ये सच है,
श्रृंगार रस नीरस हो चला है।

