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Manas Jeengar

Inspirational

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Manas Jeengar

Inspirational

सैनिक हूँ

सैनिक हूँ

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सैनिक हूँ . बेशक लड़ सकता हूँ . 

मैं चन्दन सी माड्डठ्ठी पर,

 एक नहीं सो-सो बार मर सकता हूँ

दुश्मन बाहरी हो अगर, ईंट से ईंट बजा आए

, हाल ऐसा करे जन्मो जन्म आँख न दिखाए, 

में खड़ा दिन रात हूँ . की कोई बाहरी परिन्दा पर न मार पाये।

 मेरी आंखें भी जब नम हो जाए,

 भीतर से ही जब मज़हबी दंगों की आवाज आए।


में मौत हथेली पर ले, कफन सर बान्ध, बेपरवाह निकल पड़ा 

की कोई बाहरी हवा, भीतर का सद्भाव न बिगाड़ जाए। 

में भी रो पडता, सुनता जब आग तो भीतर से ही कोई सुलगाए, अपनो को ही अपनों से लड़ाये


में विचार करूँ उन भोलो का, 

जो सोच रहे, मेरा वतन विशव गुरु कहलाए गा,

 अगर चलता रहा ऐसा ही, 

तो वो दिन दूर नहीं, गुरु विश्व हमारा बन जाएगा।


लगता है भीतर के गधारी ने, 

इस माड्ठी की परिपाटी को तोड़ डाला,

 भारत की गंगा जमुना तहजीब को

 मज़हबी धाराओं में मोड डाला है, 

मेभी इन सब से काफी हद तक टूटा हूँ , 

सच कह तो मैं अपने भीतर के नेतृत्व से रूठा हूँ . 

यही करे आग में घी का काम, 

वोटों के खातिर मज़हबी दंगों को पहुँचाए अपने अंजाम।


इस कारण मैंने भी सोचा, मैं भी छोड़ आऊँ सरहदों को, 

आ के मैं भी खुश हो जाऊँ ईद, दीवाली, होली से,

 मैं भी परहेज कर लूँ बन्दूक की गोली से, 

क्योंकि लोगों ने तो सोच लिया, सैनिक है तो शहादत की आदत है,


लेकिन क्या पता उन लोगों को इसके परे भी बाकी मेरी जिन्दगात है।


लेकिन सैनिक हूँ सो, 

अपनों के खातिर मौत का कफन सर पर ओढ़ा है,

 क्या पता सर का कफन कब लाल हो जाए, 

घर के कर्धन कब टूट जाए, 

आँगन की तुलसी कब रूठ जाए।


छोड़ो सब, मुझे फिर विचार आया अपना फर्ज फिर याद आया, सैनिक हूँ , बेशक लड़ सकता हूँ , 

इस माड्ठी पर जन्मा हूँ , इस माठ्ठी पर मर सकता हूँ ।


                            


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