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Davinder Dhar

Tragedy

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Davinder Dhar

Tragedy

,साम्राज्य के बचे अवशेष

,साम्राज्य के बचे अवशेष

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यह भूभाग है जहां आज भी

समता युद्ध जारी है

उस सल्तनत के विरुद्ध 

जिसके साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबा

अगर कुछ डूबा तो मानवता का अस्तित्व 

अगर कुछ खत्म हुआ है तो

 मानवाधिकार का बचा हुआ अंश

चारों और फैला समुद्र और पृथ्वी का

 यह हिस्सा कटा रहा सभ्य समाज से पृथक

बात पुरानी है लेकिन दर्ज है कि

सिर्फ कुछ गोरे समुद्र में बैठ कर 

इस टापू तक पंहुचने का रास्ता 

खोज निकाले मानचित्र बना लिया

विश्व में जहां भी रास्ता बना 

मष्तिष्क में बारूद भरे हुए 

वे घूमते चले गये 

रानी मधुमक्खी को संभाले 

जिधर से गुज़र गये थे 

वही रास्ता बनता चला गया

वो बस्ती रही हो या विरान जंगल 

विरोध का कहीं विरोध ही नहीं

रानी मक्खी कहीं नहीं गई

छीके का मक्खन अपने आप

उसके मुंह में जाता रहा

दूूजे की ज़मीन पर भी

अपनी नगरी बसाने और सभ्यता को

कोहलू का बैल बनाने

हर तरह के तेल को अपनी बोतल में

पूरी की पूरी भरने का मज़ा 

दूसरे की लकड़ी से अपना अलाव 

सेकने का आनंद तो स्वभाव में रहा।

हमारी कहानी भी ऐसी ही है

यद्यपि हम उनकी सरजमीं से दूर

किसी दूसरे भूभाग में बस रहे थे।

अपनी ही ज़मीन पर काले

आदिवासी कहलाने का जो पुरस्कार 

बांंटा गया था आज भी उसी पुरस्कार 

के बचे हुए दंश को अगली पीढ़ी 

को छोड़कर जा रहे है

क्योंकि हम काले आदिवासी

ऐब्रुजनल* ही तो हैं

 विश्व में विद्यमान हम कालखंड में

कभी नहीं बंटे,हम सदैव एक थे

खंडित कर दिये गये सब

बंट गई जमीन भी,इसी बंदर बांट में

सब कुछ बंदरगाहें उठा कर ले गयीं

मूल निवासी थे हम

अपने खून से सींची धरती पर

काले,जंगली,बनवारी आदिमानव 

आज भी बने हुए हैं हम अश्वेेतआदिवासी।

आवाज को उठाने का अर्थ रहा 

दूर किसी टापू पे समुद्र किनारे

बियावान रेतीले पहाडों पर

एक जेल विरान सी

यही है वह सैलुलर जेल

वही है काला पानी 

हर रास्ते पर बना कर रख दिया

पोर्टब्लेयर हो या तस्मेनिया'

जिसे हम आप भी धन लूटा कर

देखने का शौक रखते हैं

हम आज भी विश्व के सबसे पुराने 

प्रजातंत्र की संसद में श्वेत नस्लवादी हैं

आज भी कायम है वह

स्वार्थ भरी श्वेत नस्लीय सर्वोच्चता ने

कुछ सुविधों के मानिंद 

बना दिया मुट्ठी, अस्तित्व नपुंसक 

हम आजाद कहलाए ढूंढ़ते अपनी अस्मिता

उसी संविधान में, उसी संसद में उसी रंग में

देश बना हमारा सत्ता आप की

स्त्रोत हमारा धरती आप की हुई

हर स्वतंत्रता दिवस पर अवकाश का आनंद लेते 

इस पोस्टर को चिपका कर काम चला लेते

" गोरो इस बात को मत भूलो,

 तुम्हारी सफलता के लिए 

  हमारा लहू पिया गया है।"



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