STORYMIRROR

Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational Thriller

4  

Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational Thriller

रिश्ता संयोग वाला

रिश्ता संयोग वाला

18 mins
418

रिश्ता एक ऐसा चीज है, जिसको निभाने मे अगर कोई चूक हो जाये तो,जीवन भर उसकी पवित्रता में एक गाठ सा बन जाता है। ....फिर ये गाठ अनश्वर अविनाशी और अमिट हो जाता है।फिर सारे प्रयत्न बेकार हो जाते है...संबंध स्याह बन जाता है।.….रिश्ता विश्वास का दूसरा नाम है।संबंध मधुर हो तो रिश्ते मजबूत होते है...रिश्ते निभाने में थोड़ी सी लापरवाही जीवन भर उस रिश्ते को कसैला बना देता है....सच्चा प्यार एक बार होता है...दो बार होता है...या बार बार होता है...यह एक रहस्य है...यह उस समय के परिस्थितियों पर निर्भर करता है।...प्रेम मरुस्थल को भी हरा भरा कर देता है। अभागे के भाग्य को चमका देता है।

सुनीता बेहद खुश थीं ..खुश भी क्यों ना हो ? ढेर सारी शादियां कटने के बाद तो जाकर...शादी ठीक हुई थी। वो भी सरकारी अधिकारी से ...अविनाश नाम था। ... खूबसरत चेहरा लंबा स्मार्ट बिल्कुल हीरो की तरह।... सुनीता फोटो देखते–देखते मंत्रमुग्ध हो जाती थीं।और अपने पुराने ख्यालों में खो जाती थी।.....

सुबीर ने जब उसे धोखा दिया तो सुनीता पूरी तरह से टूट सी गई थी।.. उसे जीने की इच्छा ही खत्म हो गई थी।..वो धीरे– धीरे अवसाद में जाने लगी....

सुनीता कॉलेज से छुट्टी के बाद अपनी सहेली कृतिका के साथ घर आ रही थी ..तभी सुनीता की सहेली कृतिका, सुनीता से बोली,"सुनीता हमें मां के लिए चूड़ी बिंदी और सिंदूर लेना हैं।....कल हरितालिका तीज है..."

सुनीता बोली,"ठीक है चलो मै भी अपने मां के लिए चूड़ी और बिंदी लूंगी।"

दोनों ही, पलक सुहाग स्टोर' में चली गई।... दुकानदार से बिंदी और सिंदूर मांगकर पसंद करने लगी..

अचानक सी सुनीता की नजर दुकानदार पर पड़ी, दुकानदार उसे अजीब नजरो से देख रहा थासुनीता झेप गई, उसका दिल तेजी से धड़कने लगा... वह कृतिका से बोलीं,"कृतिका जल्दी चलो। "

कृतिका को कुछ समझ में नहीं आया, सुनीता ऐसा क्यों कह रही थीं ?,"रुको,सुनीता अभी तो आई हूं समान तो ले ले।... तुमको भी तो लेना था समान, एकाएक क्या हो गया?....मै कुछ समझी नहीं ?

" जल्दी चलो...!"सुनीता झल्लाते हुए बोली"

दुकानदार अभी भी सुनीता को अपलक निहार रहा था।... सुनीता बेहद डरी हुई थी। वह जल्द से जल्द अपने घर पहुंचना चाहती थी। वो कृतिका पर गुस्सा भी हो रही थी। गुस्से में सुनीता बोली,"आज पूरा दुकान ही खरीद लोगी क्या ?"

कृतिका लापरवाही से बोली,"तुमको भी तो लेने थे सामान तुम क्यों नहीं ले रही हो ..?"

"न ना ना मुझे पसंद नहीं है,मैं किसी और के दुकान पर सामान ले लूंगी ....तुम जल्दी चलो"

सुनीता की घबराहट देखकर कृतिका भी जल्दीजल्दी समान ली, और पैसा देकर दुकान से दोनों बाहर निकल गई।

कृतिका पूछी,"सुनीता आखिर बात क्या थी।..एकाएक इतनी असहज हो गई?"

अभी दूसरे दुकान पर चले। मैं भी अपना सारा सामान ले लू।.... कल मै तुम्हें बताऊंगी।

" नहीं मुझे अभी बताओ..." कृतिका, जिद करने लगी।

सुनीता बोली," वो दुकानदार मुझे घूर रहा था...मै खुद को असहज महसूस कर रही थी।"

" उसको तुम देख ही क्यों रहीं थीं?"कृतिका सुनीता से पूछी।

सुनीता बोली,"मैं भला उसको क्यों देखू ... वही लगातार मुझे घूर रहा था,...."

"घूरने देती तुम अपना काम करती।" कृतिका बोली।

कृतिका की बात को सुनीता बुरा मान गई,वह बोली, "ऐसा नहीं हो सकता मुझसे।.…. मैं असहज हो गई थी.... मुझे ये सब पसंद नहीं है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, मैं क्या करू, मै वहां से निकल जाना ही उचित समझी।"

कृतिका हल्की सास छोड़ते हुए बोली "ठीक है चलो अपना समान दूसरी दुकान पर ले लो और जल्दी चलते हैं हम दोनों अपने –अपने घर।"

सुनीता भी अपना सामान ले ली, दोनों अपने अपने घर चली गई।

सुनीता कृतिका के घर से बेहद गुस्से में निकली,"थोड़ा देर इंतजार तो कर सकती थी।... अब अकेले कॉलेज जाना पड़ेगा।"

कॉलेज काफी दूर था रास्ता सुनसान रहता हैं। बस्तियां ना के बराबर है। जहां कभी भी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। सोच कर सुनीता का दिल धड़कने लगा।.. मगर करें तो क्या करें जाना तो पड़ेगा हीं, कॉलेज में टेस्ट चल रहा है। नहीं तो किसी भी हालत में आज कॉलेज नहीं जाती। वो मन मारकर कॉलेज की ओर चल पड़ी। कुछ देर के बाद हीं वो सुनसान रास्ता आ गया। जिससे उसको डर लगता था।... वह धड़कते दिल से तेज कदमों से आगे बढ़ रही थी। उसे महसूस हुआ कि, उसके पीछे से तेज गति से कोई आ रहा है। उसके पांव फूलने लगे। डर के मारे उसकी हालत खराब हो गई। वो किसी तरह हिम्मत जुटाकर पीछे देखी। यह तो वही दुकानदार था, जो उसे घूर रहा था.. वो पास आने की कोशिश कर रहा था, सुनीता दूर जाने की कोशिश कर रही थी।दोनों कोशिश लगातार तेज करते जाते। अंततः उस लड़के को सफलता मिल गई, वो सुनीता के सामने आकर खड़ा हो गया। सुनीता ठिठक गई

सुनीता गुस्से में बोली, "मेरा रास्ता छोड़ो कॉलेज की देर हो रही है।"

वह लड़का बोला मैं," तुम्हारा समय जाया नहीं करूंगा.. बस 10 सेकेंड मुझे समय दे दो। "

"कॉलेज के लिए लेट हो रही है....मेरा रास्ता छोड़ो।"सुनीता दुबारा बोली।

वो लड़का बोला,"ठीक है, मैं कल आऊंगा।"

वह लड़का यह कहते हुए चला गया। सुनीता जल्दीजल्दी पैर बढ़ाते हुए कॉलेज पहुंची।

सुनीता इतनी डर गई थी,की उसे कॉलेज जाने में भी डर लग रहा था। उस लड़के से डर के मारे कॉलेज छोड़ दे ये भी तो उचित नहीं।....वो मन हीं मन दृढ़ संकल्प की डर को छोड़ना पड़ेगा।...डर का सामना करना पड़ेगा।...वो निर्णय ले चुकी थी.. दृढ़ निर्णय में काफी ताकत होती है। अब वो कृतिका के घर भी नहीं जाएगी।बल्कि वो अपने घर से सीधे कॉलेज जाएगी। और रास्ते में जो भी समस्याएं आएगी, उसका वो डट कर मुकाबला करेगी।

रोज की तरह सुनीता कॉलेज जा रही थी। तभी पीछे से आकर वो लड़का उसका रास्ता रोक लिया।

सुनीता गुस्से में उस लड़के के तरफ देखी। लड़का ढीठ की तरह उसके तरफ बढ़ने लगा।

'सट् अप' तेज आवाज में उस लड़के को बोली।

लड़का उसके बातों को नजरअंदाज करते हुए उसके करीब आतें गया,और नजदीक आकर खड़ा हो गया। सुनीता ने आव ना देखा ताव और तुरंत एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दी। वो लड़का पलट कर चला गया।

सुनीता उस दिन के बाद खुद को काफी मजबूत कर ली थी, डर को खत्म करने का प्रयास कर रही थी, और अकेले ही कॉलेज जाने लगी। उसके भीतर आत्मविश्वास का संचार हो चुका था वह लड़ सकती थी वह किसी से भीड़ सकती थी।

कृतिका एक दिन कॉलेज में उससे पूछी," सुनीता!अब मेरे घर क्यों नहीं आती हो, कॉलेज साथ चलने के लिए ..... मुझे अकेले कॉलेज आना पड़ता है... तुम साथ होती थी, तो कॉलेज का रास्ता आसानी से कट जाता था... पता ही नहीं चल पाता था। बातचीत करते जाते थे और बातचीत करते आ जाते थे।.... पता नहीं क्यों बदली बदली सी लग रही हो सुनीता।"

" .........."

सुनीता कृतिका के बातों का जवाब नहीं दि।

शादी का समय नजदीक आते जा रहा था। सुनीता के घर शादी की तैयारी जोरों पे चल रहीं थी। लेकिन सुनीता का कॉलेज जाना बंद नहीं हुआ था।वह हर रोज कॉलेज जाती।...और हर रोज वो लड़का उसे चोर निगाहों से दूर से हीं निहारता था।

एक दिन सुनीता के दिमाग में पता नहीं कौन सी बात आई वह लड़के को अपने पास बुलाई और बोली, "पता नहीं इतना कीमती समय हमारे लिए क्यों आप जाया करते हैं.... हो सकता है, आप मुझसे प्यार करते हों लेकिन मैं आपसे प्यार नहीं करती, मैं किसी और से प्यार करती थी। और वहां से मुझे धोखा मिल गया। प्यार कभी भी दोबारा नहीं होता। मैं अंदर ही अंदर टूट चुकी हूं। मेरी शादी भी ठीक हो गई है। कृपा करके आप अपना काम करिए मेरे पीछे मत पड़िए, मैं आपसे क्षमा चाहती हूं।"

सुनीता की बात को सुनकर, वो लड़का बोला,"क्या हम आपका दोस्त भी नहीं बन सकते ?...मेरा नाम मनोज है .....मेरा दोस्ती बिना स्वार्थ वाला होगा।"

सुनीता उस लड़के के बात का जवाब नहीं दी।

" ..............।"

वो लड़का सुनीता के जवाब का इंतजार नहीं किया, वो मौन सहमति मान लिया।...सुनीता आगे बढ़ गई।....कुछ देर बाद पीछे मुड़कर देखी तो, वो लड़का उसे अपलक

निहार रहा है...सुनीता लौटकर आई और उससे उसका मोबाइल नम्बर मांगते हुए बोली,"दोस्ती ईमानदारी से निभाना अब मेरा पीछा मत करना...अपनी शादी में मैं तुम्हे बलाऊंगी.....जरूर आना।"

वो लड़का खुश हो गया,और सुनीता को अपना मोबाईल नम्बर देकर चला गया।

ट्री .... ट्री.... ट्रिंग ..ट्रिंग....मनोज ने फोन उठाया,

"हैलो कौन ?"

उधर से आवाज आई, "मैं सुनीता बोल रही हूं,इसी मंगलवार को मेरी शादी है, समय से आ जाना।"

फोन कट गया।

मनोज उसी नंबर पर फोन किया,उधर से सुनीता फोन उठाई,मनोज बोला,"मैडम कहां आना है।...पता भी तो बताईए,"

उधर से आवाज आई,"क्या ये तुम्हारा व्हाट्स एप नंबर है ?"

मनोज बोला,"हां "

"ठीक है मैं इसी नंबर पर कार्ड भेज दूंगी।"

उधर से आवाज आई,और फोन कट गया।

कुछ हीं देर बाद मनोज के व्हाट्स एप पर सुनीता के शादी का कार्ड आ गया।

शहनाई बज रही थी।.... सारे रस्म शादी की अदा की जा रही थी.... बारात आने का इंतजार हो रहा ....बारात आने में काफी लेट हो रहा था। बारातियों को लोग फोन कर रहे थे, लेकिन कोई भी फोन उठा नहीं रहा था....कुछ देर बाद दूल्हे के पिता का फोन आया। "बारात नहीं आएगी....लड़का किसी लड़की के साथ मंदिर में शादी कर लिया है।"

इतना सुनते हीं सुनीता के पिता पछाड़ खाकर गिर पड़े।

वहीं पर मनोज पहुंच गया। और सुनीता के पिता के माथे पर पानी मारा। सुनीता के पिता होश में आए।और रोने लगे,"अब क्या होगा?....."

लोगो की भीड़ जमा हो गई थी। मनोज सुनीता के पिता को ढांढस बंधा रहा था।

सुनीता के पिता ने मनोज से परिचय पूछा,"बेटा तुम कौन हो मुझे पता नहीं है..."

मनोज बोला," अंकल,मैं एक अभागा लड़का हूं...मेरे माता पिता एक एक्सिडेंट में चल बसे....मैं अनाथ हूं...मेन मार्केट में मेरी दुकान है,जिसका नाम ' पलक सुहाग स्टोर' है।...."

मनोज अपने बारे में बता हीं रहा था, की तभी वहां पर सुनीता आ गई।...उसे बारात न आने की सूचना मिली। वो अपने पिता को ढांढस बंधाने लगी। लेकिन ढांढस बंधाने से क्या, जाने वाली इज्जत लौटकर आ जाएगी ?... पूरे जीवन भर की कमाई, जो बेटी के शादी के लिए पाई पाई जूटाकर रखे थे, क्या वो लौट आएगा ?....नहीं .. ऐसा नहीं हो पाएगा।...सब बर्बाद हो गया।

सारा खुशी का माहौल गमगीन हो गया था,...शहनाई बंद हो गई थी।...एक अजीब तरह की शांति हो चुकी थी।सुनीता को तो ' काटो तो खून नहीं ' वाला हाल हो गया था।....... वो सोच रही थी, अविनाश ने जो किया ठीक नहीं किया।

मनोज सुनीता के पिता से बोला,"अंकल!...अगर आप अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में देना चाहेंगे, तो मैं तैयार हूं।.."

मनोज की बात सुनते हीं सुनीता के पिता, मनोज को अपलक निहारने लगे।

कुछ देर बाद बोले,"बेटा मै तैयार हूं।....तुम एक बार और सोच लो....यह बंधन जन्म जन्मांतर का होता है... पलभर में इसका निर्णय नहीं लिया जाता है।"

मनोज बोला,"अंकल मैं ये काफी सोच समझ कर निर्णय लिया है।...आप सुनीता से मंतव्य ले लिजिए... क्या मैं उसके लिए उपर्युक्त हूं?"

मनोज की बात सुनकर,सुनीता 'हां' में सर हिलाई।

सुनीता के पिताजी सुनीता के 'हां' में सर हिलाते हीं खुशी से झूम उठे। ....

शहनाई पुनः गूंजने लगी....मनोज दूल्हा बन गया।... जयमाल के स्टेज पर सुनीता, मनोज के गले में जयमाला डाली। जयमाल स्टेज पर सुनीता के साथ कृतिका भी थी।

वो मुस्कुराते हुए सुनीता से बोली,"इस शादी का मिडिएटर मैं हूं।"

सुनीता मुस्कुरा दी,मनोज भी मुस्कुराने लगा।

शादी की सारी रस्में पंडित जी करने लगें...सिंदूरदान हुआ ... अंततः शादी सम्पन्न हुई।

सुहाग सेज पर सुनीता बैठी थी। मनोज आया और बोला, सुनीता तुमको हमसे संयोग ने मिलाया है...मेरे दुकान पर तुम्हारा आना...मुझे पहली नजर में प्यार हो जाना...फिर कॉलेज जाते समय रोज हीं तुमको देखना... तुम्हें देखने के बाद दिल को काफी राहत और सुकून पहुंचना...फिर तुमसे दोस्ती...जो की प्रेम के गर्भ से पैदा लिया था।...और..तुम्हारे शादी के दिन बारात न आना।...और आज हमदोनों को पति पत्नी के रूप में

मिलना।......मुझे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है। ...मेरी दुनियां उजड़ सी गई थी।...मेरा कोई नहीं था।लेकिन आज तुम मिल गई। मुझे सबकुछ मिल गया। तुम मेरे लिए सर्वस्व हो।.. मेरी कोशिश रहेगी की तुमको मैं हमेशा खुश रखू।...

मनोज की बात सुनकर सुनीता बोली,"मेरी भी यही कोशिश रहेगी की मैं पत्नी धर्म पूरी ईमानदारी और तन्मयता से निभाऊं।....यह रिश्ते की मर्यादा बनी रहें।"

मनोज बोला," मैं भी जी जान लगा दूंगा इस रिश्ते के कर्तव्यों का निर्वहन करने में।"

मनोज और सुनीता दोनों एक दूजे के आंखो में झांकने लगे।

रिश्ता एक ऐसा चीज है, जिसको निभाने मे अगर कोई चूक हो जाये तो,जीवन भर उसकी पवित्रता में एक गाठ सा बन जाता है। ....फिर ये गाठ अनश्वर अविनाशी और अमिट हो जाता है।फिर सारे प्रयत्न बेकार हो जाते है...संबंध स्याह बन जाता है।.….रिश्ता विश्वास का दूसरा नाम है।संबंध मधुर हो तो रिश्ते मजबूत होते है...रिश्ते निभाने में थोड़ी सी लापरवाही जीवन भर उस रिश्ते को कसैला बना देता है....सच्चा प्यार एक बार होता है...दो बार होता है...या बार बार होता है...यह एक रहस्य है...यह उस समय के परिस्थितियों पर निर्भर करता है।...प्रेम मरुस्थल को भी हरा भरा कर देता है। अभागे के भाग्य को चमका देता है।

सुनीता बेहद खुश थीं ..खुश भी क्यों ना हो ? ढेर सारी शादियां कटने के बाद तो जाकर...शादी ठीक हुई थी। वो भी सरकारी अधिकारी से ...अविनाश नाम था। ... खूबसरत चेहरा लंबा स्मार्ट बिल्कुल हीरो की तरह।... सुनीता फोटो देखते–देखते मंत्रमुग्ध हो जाती थीं।और अपने पुराने ख्यालों में खो जाती थी।.....

।सुबीर ने जब उसे धोखा दिया तो सुनीता पूरी तरह से टूट सी गई थी।.. उसे जीने की इच्छा ही खत्म हो गई थी।..वो धीरे– धीरे अवसाद में जाने लगी....

। सुनीता कॉलेज से छुट्टी के बाद अपनी सहेली कृतिका के साथ घर आ रही थी ..तभी सुनीता की सहेली कृतिका, सुनीता से बोली,"सुनीता हमें मां के लिए चूड़ी बिंदी और सिंदूर लेना हैं।....कल हरितालिका तीज है..."

सुनीता बोली,"ठीक है चलो मै भी अपने मां के लिए चूड़ी और बिंदी लूंगी।"

। दोनों ही, पलक सुहाग स्टोर' में चली गई।... दुकानदार से बिंदी और सिंदूर मांगकर पसंद करने लगी..

अचानक सी सुनीता की नजर दुकानदार पर पड़ी, दुकानदार उसे अजीब नजरो से देख रहा थासुनीता झेप गई, उसका दिल तेजी से धड़कने लगा... वह कृतिका से बोलीं,"कृतिका जल्दी चलो। "

 कृतिका को कुछ समझ में नहीं आया, सुनीता ऐसा क्यों कह रही थीं ?,"रुको,सुनीता अभी तो आई हूं समान तो ले ले।... तुमको भी तो लेना था समान, एकाएक क्या हो गया?....मै कुछ समझी नहीं?

" जल्दी चलो...!"सुनीता झल्लाते हुए बोली"

दुकानदार अभी भी सुनीता को अपलक निहार रहा था।... सुनीता बेहद डरी हुई थी। वह जल्द से जल्द अपने घर पहुंचना चाहती थी। वो कृतिका पर गुस्सा भी हो रही थी। गुस्से में सुनीता बोली,"आज पूरा दुकान ही खरीद लोगी क्या ?"

 कृतिका लापरवाही से बोली,"तुमको भी तो लेने थे सामान तुम क्यों नहीं ले रही हो ..?"

।"न ना ना मुझे पसंद नहीं है,मैं किसी और के दुकान पर सामान ले लूंगी ....तुम जल्दी चलो"

सुनीता की घबराहट देखकर कृतिका भी जल्दीजल्दी समान ली, और पैसा देकर दुकान से दोनों बाहर निकल गई।

।कृतिका पूछी,"सुनीता आखिर बात क्या थी।..एकाएक इतनी असहज हो गई?"

। अभी दूसरे दुकान पर चले। मैं भी अपना सारा सामान ले लू।.... कल मै तुम्हें बताऊंगी।

।।। " नहीं मुझे अभी बताओ..." कृतिका, जिद करने लगी।

सुनीता बोली," वो दुकानदार मुझे घूर रहा था...मै खुद को असहज महसूस कर रही थी।"

" उसको तुम देख ही क्यों रहीं थीं?"कृतिका सुनीता से पूछी।

सुनीता बोली,"मैं भला उसको क्यों देखू ... वही लगातार मुझे घूर रहा था,...."

"घूरने देती तुम अपना काम करती।" कृतिका बोली।

।कृतिका की बात को सुनीता बुरा मान गई,वह बोली, "ऐसा नहीं हो सकता मुझसे।.…. मैं असहज हो गई थी.... मुझे ये सब पसंद नहीं है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, मैं क्या करू, मै वहां से निकल जाना ही उचित समझी।"

कृतिका हल्की सास छोड़ते हुए बोली "ठीक है चलो अपना समान दूसरी दुकान पर ले लो और जल्दी चलते हैं हम दोनों अपने –अपने घर।"

।सुनीता भी अपना सामान ले ली, दोनों अपने अपने घर चली गई।

 सुनीता कृतिका के घर से बेहद गुस्से में निकली,"थोड़ा देर इंतजार तो कर सकती थी।... अब अकेले कॉलेज जाना पड़ेगा।"

कॉलेज काफी दूर था रास्ता सुनसान रहता हैं। बस्तियां ना के बराबर है। जहां कभी भी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। सोच कर सुनीता का दिल धड़कने लगा।.. मगर करें तो क्या करें जाना तो पड़ेगा हीं, कॉलेज में टेस्ट चल रहा है। नहीं तो किसी भी हालत में आज कॉलेज नहीं जाती। वो मन मारकर कॉलेज की ओर चल पड़ी। कुछ देर के बाद हीं वो सुनसान रास्ता आ गया । जिससे उसको डर लगता था।... वह धड़कते दिल से तेज कदमों से आगे बढ़ रही थी। उसे महसूस हुआ कि, उसके पीछे से तेज गति से कोई आ रहा है। उसके पांव फूलने लगे। डर के मारे उसकी हालत खराब हो गई। वो किसी तरह हिम्मत जुटाकर पीछे देखी। यह तो वही दुकानदार था, जो उसे घूर रहा था.. वो पास आने की कोशिश कर रहा था, सुनीता दूर जाने की कोशिश कर रही थी।दोनों कोशिश लगातार तेज करते जाते। अंततः उस लड़के को सफलता मिल गई, वो सुनीता के सामने आकर खड़ा हो गया। सुनीता ठिठक गई

।सुनीता गुस्से में बोली, "मेरा रास्ता छोड़ो कॉलेज की देर हो रही है।"

वह लड़का बोला मैं," तुम्हारा समय जाया नहीं करूंगा.. बस 10 सेकेंड मुझे समय दे दो। "

।"कॉलेज के लिए लेट हो रही है....मेरा रास्ता छोड़ो।"सुनीता दुबारा बोली।

 वो लड़का बोला,"ठीक है, मैं कल आऊंगा।"

 वह लड़का यह कहते हुए चला गया। सुनीता जल्दीजल्दी पैर बढ़ाते हुए कॉलेज पहुंची।

।सुनीता इतनी डर गई थी,की उसे कॉलेज जाने में भी डर लग रहा था। उस लड़के से डर के मारे कॉलेज छोड़ दे ये भी तो उचित नहीं।....वो मन हीं मन दृढ़ संकल्प की डर को छोड़ना पड़ेगा।...डर का सामना करना पड़ेगा।...वो निर्णय ले चुकी थी.. दृढ़ निर्णय में काफी ताकत होती है। अब वो कृतिका के घर भी नहीं जाएगी।बल्कि वो अपने घर से सीधे कॉलेज जाएगी। और रास्ते में जो भी समस्याएं आएगी, उसका वो डट कर मुकाबला करेगी।

।।रोज की तरह सुनीता कॉलेज जा रही थी। तभी पीछे से आकर वो लड़का उसका रास्ता रोक लिया।

।।सुनीता गुस्से में उस लड़के के तरफ देखी। लड़का ढीठ की तरह उसके तरफ बढ़ने लगा। 

 'सट् अप'तेज आवाज में उस लड़के को बोली।

।लड़का उसके बातों को नजरअंदाज करते हुए उसके करीब आतें गया,और नजदीक आकर खड़ा हो गया। सुनीता ने आव ना देखा ताव और तुरंत एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दी। वो लड़का पलट कर चला गया।

।।सुनीता उस दिन के बाद खुद को काफी मजबूत कर ली थी, डर को खत्म करने का प्रयास कर रही थी, और अकेले ही कॉलेज जाने लगी। उसके भीतर आत्मविश्वास का संचार हो चुका था वह लड़ सकती थी वह किसी से भीड़ सकती थी।

।।कृतिका एक दिन कॉलेज में उससे पूछी," सुनीता!अब मेरे घर क्यों नहीं आती हो, कॉलेज साथ चलने के लिए ..... मुझे अकेले कॉलेज आना पड़ता है... तुम साथ होती थी, तो कॉलेज का रास्ता आसानी से कट जाता था... पता ही नहीं चल पाता था। बातचीत करते जाते थे और बातचीत करते आ जाते थे।.... पता नहीं क्यों बदली बदली सी लग रही हो सुनीता।"

।। " .........."

 सुनीता कृतिका के बातों का जवाब नहीं दि।

शादी का समय नजदीक आते जा रहा था। सुनीता के घर शादी की तैयारी जोरों पे चल रहीं थी। लेकिन सुनीता का कॉलेज जाना बंद नहीं हुआ था।वह हर रोज कॉलेज जाती।...और हर रोज वो लड़का उसे चोर निगाहों से दूर से हीं निहारता था।

।।एक दिन सुनीता के दिमाग में पता नहीं कौन सी बात आई वह लड़के को अपने पास बुलाई और बोली, "पता नहीं इतना कीमती समय हमारे लिए क्यों आप जाया करते हैं.... हो सकता है, आप मुझसे प्यार करते हों लेकिन मैं आपसे प्यार नहीं करती, मैं किसी और से प्यार करती थी। और वहां से मुझे धोखा मिल गया। प्यार कभी भी दोबारा नहीं होता। मैं अंदर ही अंदर टूट चुकी हूं। मेरी शादी भी ठीक हो गई है। कृपा करके आप अपना काम करिए मेरे पीछे मत पड़िए, मैं आपसे क्षमा चाहती हूं।"

।। सुनीता की बात को सुनकर, वो लड़का बोला,"क्या हम आपका दोस्त भी नहीं बन सकते ?...मेरा नाम मनोज है .....मेरा दोस्ती बिना स्वार्थ वाला होगा।"

।।सुनीता उस लड़के के बात का जवाब नहीं दी।

 " ..............।"

 वो लड़का सुनीता के जवाब का इंतजार नहीं किया, वो मौन सहमति मान लिया।...सुनीता आगे बढ़ गई।....कुछ देर बाद पीछे मुड़कर देखी तो, वो लड़का उसे अपलक

निहार रहा है...सुनीता लौटकर आई और उससे उसका मोबाइल नम्बर मांगते हुए बोली,"दोस्ती ईमानदारी से निभाना अब मेरा पीछा मत करना...अपनी शादी में मैं तुम्हे बलाऊंगी.....जरूर आना।"

।वो लड़का खुश हो गया,और सुनीता को अपना मोबाईल नम्बर देकर चला गया।


ट्री .... ट्री.... ट्रिंग ..ट्रिंग....मनोज ने फोन उठाया,।।

"हैलो कौन ?"

 उधर से आवाज आई, "मैं सुनीता बोल रही हूं,इसी मंगलवार को मेरी शादी है, समय से आ जाना।"

।फोन कट गया।

मनोज उसी नंबर पर फोन किया,उधर से सुनीता फोन उठाई,मनोज बोला,"मैडम कहां आना है।...पता भी तो बताईए,"

उधर से आवाज आई,"क्या ये तुम्हारा व्हाट्स एप नंबर है ?"

। मनोज बोला,"हां "

।"ठीक है मैं इसी नंबर पर कार्ड भेज दूंगी।"

।उधर से आवाज आई,और फोन कट गया।

कुछ हीं देर बाद मनोज के व्हाट्स एप पर सुनीता के शादी का कार्ड आ गया।

।शहनाई बज रही थी।.... सारे रस्म शादी की अदा की जा रही थी.... बारात आने का इंतजार हो रहा ....बारात आने में काफी लेट हो रहा था। बारातियों को लोग फोन कर रहे थे, लेकिन कोई भी फोन उठा नहीं रहा था....कुछ देर बाद दूल्हे के पिता का फोन आया। "बारात नहीं आएगी....लड़का किसी लड़की के साथ मंदिर में शादी कर लिया है।"

 इतना सुनते हीं सुनीता के पिता पछाड़ खाकर गिर पड़े।

वहीं पर मनोज पहुंच गया। और सुनीता के पिता के माथे पर पानी मारा। सुनीता के पिता होश में आए।और रोने लगे,"अब क्या होगा?....."

लोगो की भीड़ जमा हो गई थी। मनोज सुनीता के पिता को ढांढस बंधा रहा था।

।सुनीता के पिता ने मनोज से परिचय पूछा,"बेटा तुम कौन हो मुझे पता नहीं है..."

मनोज बोला," अंकल,मैं एक अभागा लड़का हूं...मेरे माता पिता एक एक्सिडेंट में चल बसे....मैं अनाथ हूं...मेन मार्केट में मेरी दुकान है,जिसका नाम ' पलक सुहाग स्टोर' है।...."

 मनोज अपने बारे में बता हीं रहा था, की तभी वहां पर सुनीता आ गई।...उसे बारात न आने की सूचना मिली। वो अपने पिता को ढांढस बंधाने लगी। लेकिन ढांढस बंधाने से क्या, जाने वाली इज्जत लौटकर आ जाएगी ?... पूरे जीवन भर की कमाई, जो बेटी के शादी के लिए पाई पाई जूटाकर रखे थे, क्या वो लौट आएगा ?....नहीं .. ऐसा नहीं हो पाएगा।...सब बर्बाद हो गया।

सारा खुशी का माहौल गमगीन हो गया था,...शहनाई बंद हो गई थी।...एक अजीब तरह की शांति हो चुकी थी।सुनीता को तो ' काटो तो खून नहीं ' वाला हाल हो गया था।....... वो सोच रही थी, अविनाश ने जो किया ठीक नहीं किया।।

।।मनोज सुनीता के पिता से बोला,"अंकल!...अगर आप अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में देना चाहेंगे, तो मैं तैयार हूं।.."

 मनोज की बात सुनते हीं सुनीता के पिता, मनोज को अपलक निहारने लगे।

 कुछ देर बाद बोले,"बेटा मै तैयार हूं।....तुम एक बार और सोच लो....यह बंधन जन्म जन्मांतर का होता है... पलभर में इसका निर्णय नहीं लिया जाता है।"

 मनोज बोला,"अंकल मैं ये काफी सोच समझ कर निर्णय लिया है।...आप सुनीता से मंतव्य ले लिजिए... क्या मैं उसके लिए उपर्युक्त हूं?"

मनोज की बात सुनकर,सुनीता 'हां' में सर हिलाई।

सुनीता के पिताजी सुनीता के 'हां' में सर हिलाते हीं खुशी से झूम उठे। ....

।शहनाई पुनः गूंजने लगी....मनोज दूल्हा बन गया।... जयमाल के स्टेज पर सुनीता, मनोज के गले में जयमाला डाली। जयमाल स्टेज पर सुनीता के साथ कृतिका भी थी।

वो मुस्कुराते हुए सुनीता से बोली,"इस शादी का मिडिएटर मैं हूं।"

।सुनीता मुस्कुरा दी,मनोज भी मुस्कुराने लगा।

शादी की सारी रस्में पंडित जी करने लगें...सिंदूरदान हुआ ... अंततः शादी सम्पन्न हुई।

सुहाग सेज पर सुनीता बैठी थी। मनोज आया और बोला, सुनीता तुमको हमसे संयोग ने मिलाया है...मेरे दुकान पर तुम्हारा आना...मुझे पहली नजर में प्यार हो जाना...फिर कॉलेज जाते समय रोज हीं तुमको देखना... तुम्हें देखने के बाद दिल को काफी राहत और सुकून पहुंचना...फिर तुमसे दोस्ती...जो की प्रेम के गर्भ से पैदा लिया था।...और..तुम्हारे शादी के दिन बारात न आना।...और आज हमदोनों को पति पत्नी के रूप में

मिलना।......मुझे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है। ...मेरी दुनियां उजड़ सी गई थी।...मेरा कोई नहीं था।लेकिन आज तुम मिल गई। मुझे सबकुछ मिल गया। तुम मेरे लिए सर्वस्व हो।.. मेरी कोशिश रहेगी की तुमको मैं हमेशा खुश रखू।...

 मनोज की बात सुनकर सुनीता बोली,"मेरी भी यही कोशिश रहेगी की मैं पत्नी धर्म पूरी ईमानदारी और तन्मयता से निभाऊं।....यह रिश्ते की मर्यादा बनी रहें।"

मनोज बोला," मैं भी जी जान लगा दूंगा इस रिश्ते के कर्तव्यों का निर्वहन करने में।"

मनोज और सुनीता दोनों एक दूजे के आंखो में झांकने लगे।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract