रावण मन का मारो ( विजयदशमी)
रावण मन का मारो ( विजयदशमी)
अनंत युगों से आज तक रावण को हम मारते आये ।
पर हकीकत में हम अपने ही पाप बुराई से हारते आये ।।
सांकेतिक पुतले का दहन कर हम खुद को राम समझते आये ।
पर स्वयं के अंदर के रावण का दमन कर राम को जगा नही पाए ।।
काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर घृणा ईर्ष्या द्वेष एवं भय ।
इन बुराइयों से हम भरे पड़े और हमारा जीवन है अंधकारमय ।।
दशानन तो अपनी दसों बुराई को हमेशा रखा जग के सन्मुख ।
पर हम तो एक चेहरे के अंदर छुपा कर रखते है सभी मुख ।।
लगाया नही कभी रावण ने अपने मुख पर कभी कोई मुखौटा ।
पर आज का मानव बाहर से हीरा बनता और मन से है खोटा ।।
रावण जैसे प्रकांड विद्वान की भी " मैं "' ने कैसी दुर्गति की ।
इस अहंकार ने युंगो से न जाने कितनों की ही मति हर ली ।।
रावण की लंका में रहकर भी माँ सीता सुरक्षित रही ।
और इस युग की बेटी, नारी अपने ही घर में सुरक्षित नहीं ।।
रावण की व्यथा यही युगों से जलता आ रहा पापी हाथ से ।
जलाते हो मुझे तुम क्यों ? तुम हो क्या पावन प्रभु राम से ।।
ये रावण का अटूट संकल्प था जो पराई स्त्री का किया नही स्पर्श ।
वरना लंका में अकेली रहने वाली माता सीता का क्या होता हश्र ।।
अरे रावण का पुतला दहन करने वाले मूर्ख , नादान मनुष्य ।
आगामी चौवीसी में तीर्थंकर रूप में उनका उज्जवल भविष्य ।।
तब नतमस्तक होगा पूरे चौदह राजलोक का हर एक जीव ।
अष्टापद पर्वत पर अगाध भक्ति से डालीं तीर्थंकर की नींव ।।
भटकेंगे नरक से चौदह भव जिस सीता के लिए हुई रामायण ।
वही सीता का जीव गणधर हो कर बनेंगे कर्तव्य परायण ।।
रावण के दहन का हक है केवल मर्यादा पुरुषोत्तम राम का ।
बाकी रावण वहीं दहन कर जिनका व्यवहार हो राम सा ।।
