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Dr. Akansha Rupa chachra

Inspirational

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Dr. Akansha Rupa chachra

Inspirational

रावण मन का मारो ( विजयदशमी)

रावण मन का मारो ( विजयदशमी)

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अनंत युगों से आज तक रावण को हम मारते आये ।

पर हकीकत में हम अपने ही पाप बुराई से हारते आये ।।

सांकेतिक पुतले का दहन कर हम खुद को राम समझते आये ।

पर स्वयं के अंदर के रावण का दमन कर राम को जगा नही पाए ।।

काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर घृणा ईर्ष्या द्वेष एवं भय ।

इन बुराइयों से हम भरे पड़े और हमारा जीवन है अंधकारमय ।।

दशानन तो अपनी दसों बुराई को हमेशा रखा जग के सन्मुख ।

पर हम तो एक चेहरे के अंदर छुपा कर रखते है सभी मुख ।।

लगाया नही कभी रावण ने अपने मुख पर कभी कोई मुखौटा ।

पर आज का मानव बाहर से हीरा बनता और मन से है खोटा ।।

रावण जैसे प्रकांड विद्वान की भी " मैं "' ने कैसी दुर्गति की ।

इस अहंकार ने युंगो से न जाने कितनों की ही मति हर ली ।।

रावण की लंका में रहकर भी माँ सीता सुरक्षित रही ।

और इस युग की बेटी, नारी अपने ही घर में सुरक्षित नहीं ।।

रावण की व्यथा यही युगों से जलता आ रहा पापी हाथ से ।

जलाते हो मुझे तुम क्यों ? तुम हो क्या पावन प्रभु राम से ।।

ये रावण का अटूट संकल्प था जो पराई स्त्री का किया नही स्पर्श ।

वरना लंका में अकेली रहने वाली माता सीता का क्या होता हश्र ।।

अरे रावण का पुतला दहन करने वाले मूर्ख , नादान मनुष्य ।

आगामी चौवीसी में तीर्थंकर रूप में उनका उज्जवल भविष्य ।।

तब नतमस्तक होगा पूरे चौदह राजलोक का हर एक जीव ।

अष्टापद पर्वत पर अगाध भक्ति से डालीं तीर्थंकर की नींव ।।

भटकेंगे नरक से चौदह भव जिस सीता के लिए हुई रामायण ।

वही सीता का जीव गणधर हो कर बनेंगे कर्तव्य परायण ।।

रावण के दहन का हक है केवल मर्यादा पुरुषोत्तम राम का ।

बाकी रावण वहीं दहन कर जिनका व्यवहार हो राम सा ।।



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