STORYMIRROR

Dharmesh Solanki

Abstract

4  

Dharmesh Solanki

Abstract

रात की रौशनी

रात की रौशनी

1 min
851

रात की रौशनी को भूल जाना है

मुझे दिन के अब बहुत काम आना है


सभी दंगे फसादों को मिटा कर ही

खुदा को अब यहाँ वापस बुलाना है


कहीं मायूस पड़ा है बरसों से जो

उसी चेहरे को फिर जगमगाना है


खिलौना नहीं हूँ मैं जो तोड़ देगी

टूटा दिल ले के कुछ कर दिखाना है


कलाकारी तो बाद में भी दिखेगी

भूल मत ख़ुद को इंसान बनाना है


हसीं है ये राह बेहद इन सफ़र की

मुझे इन सफ़र‌ में ही ठहर जाना है


कमानी नहीं मुझ को दौलत जहाँ में

मुझे तो बस अपना नाम कमाना है


भले शैतान हम सब को जला डाले

हमें बस अपना ईमान बचाना है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract